क्या भाजपा का नया फ्रीबीज फार्मूला हिट होगा?

मुफ्त की रेवडियों या फ्रीबीज के लिये भाजपा ने एक वैकल्पिक नीति लागू करने की बात कही है। विष से औषधि बनाने की उसकी यह कीमियागीरी कितनी कामयाब होगी यह तो वक्त और भविष्य का चुनावी चलन बतायेगा पर सैद्धांतिक और व्यावहारिक तौर पर परखें तो उसकी नीति पार्टी, देश, समाज और राज्यों की आर्थिकी के लिये बहुत फायदेमंद दिखती है।

चुनाव के दौरान मतदाताओं को प्रभावित करने के लिये मुफ्त की रेवड़ियां यानी फ्रीबीज पर लगाम कसने के नजरिये से भाजपा ने जो नीतिगत निर्णय लिया है, यदि वह व्यावहारिक स्तर पर लागू हो जाए तो यह एक बेहद क्रांतिकारी कदम साबित होगा। सच तो यह है कि लोक कल्याण के नाम पर मताखेट और जनता के धनाहरण करने वाली ये घोषणाएं दूरगामी विसंगतियां पैदा करने वाली होती हैं।

ऐसी योजनाएं देश व राज्य की उत्पादकता को हतोत्साहित तथा अधिसंख्य देशवासियों की आत्मनिर्भरता और आत्मसम्मान को नुकसान पहुंचाने वाली हैं। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया रिपोर्ट, स्टेट फाइनांस: ए रिस्क एनालिसिस बताती है कि इसके चलते तमाम राज्य वित्तीय संकट की ओर बढ चले हैं। फ्रीबीज का सियासी चलन ऐसा ही चलता रहा तो कुछ बरसों में केंद्र नहीं तो तमाम राज्य सरकारें अवश्य राजस्व घाटे के घटाटोप में डूब जाएंगी।

विकास ठप्प हो जाएगा। मुफ्त की बिजली हो या गैस सिलेंडर, लोग कुछ ज्यादा ही दरियादिली से फूंकते हैं। इससे परोक्षत: पर्यावरण प्रभावित होता है। ऐसे में पार्टी ने फ्रीबीज की जगह उसका जो यह वैकल्पिक मॉडल तैयार किया है, सराहनीय है। खास तौर पर तब जबकि इस चलन के खिलाफ सबसे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ही दो साल पहले विरोध के स्वर बुलंद किए थे, सुप्रीम कोर्ट ने भी इसको लेकर प्रतिकूल टिप्पणियां की थीं और प्रधानमंत्री ने आश्वासन दिया था कि वे इस बारे में कुछ ठोस करेंगे।

भाजपा का नया फ्रीबीज मॉडल: विकास और स्वाभिमान

अब दो वर्षों के भीतर भाजपा ने इसका वैकल्पिक मॉडल पेश कर दिया है। नीति कुछ इस तरह की है कि रेवडियां मुफ्त की नहीं लगेंगी, यह आभास रहेगा कि इनका मकसद वोट खरीदना नहीं बल्कि देश समाज का विकास, वंचितों का सबलीकरण है। इन चुनावी  रेवडियों का न्यूनतम मूल्य जनता भी चुकाएगी जिससे उनका स्वाभिमान भी बचेगा और सरकारों की राजस्व हानि भी।  

यह मॉडल राजनीतिक लाभ के लिये लोक-लुभावन चुनावी घोषणाओं से पार्टियों को वंचित भी नहीं करता है और इसके दुष्परिणामों को भी सीमित करता है। इससे राज्यों का सकल घरेलू उत्पाद बढेगा, वे भारी कर्ज से भी बचेंगे, विकास बाधित नहीं होगा। कुल मिलाकर यह विचार विष से औषधि बनाने सरीखा है। एक राजनीतिक कुप्रथा को जनहितकारी बनाने का यह अभियान देश के सामाजिक आर्थिक भविष्य को तो बदलेगा ही, राजनीतिक चाल-चलन और रणनीतियों पर भी व्यापक प्रभाव डालेगा।

एकबारगी यह लग सकता है कि स्वयं भाजपा चुनावों के दौरान चुनावी लाभ के लिये मतदाताओं को रेवड़ियां बांटने में कोई कोर कसर नहीं उठा रखती है, उसको इसका लाभ भी मिला है फिर वह ऐसा कैसे कर सकती है। बात सच है, पर यह भी सत्य है कि फ्रीबीज का विकल्प लाने से पहले भाजपा ने इसके सियासी नफा नुकसान को बखूबी तौल लिया है। इसमें देश समाज और राजनीति के साथ-साथ उसका भी दूरगामी दलगत लाभ निहित है।

भाजपा की फ्रीबीज रणनीति और जनता की प्रतिक्रिया

भाजपा के इस सुविचारित पहल से उसकी साख और बढेगी, कई दूसरे दूरगामी लाभ होंगे। पहली बात विपक्षी पार्टियों के पास इसकी कोई तुरंत काट नहीं होगी, जहां उनकी सरकारें नहीं होंगी वहां उन्हें इस तरह की घोषणाएं कर मतदाता को प्रभावित कर उनको पटाना कठिन होगा, जहां सरकारें होंगी वहां उनको इससे बेहतर नीति बनानी और अपनानी होंगी।

जनता को साफ तौर पर प्रभावित करने वाली बहुत सकारात्मक और सुविचारित योजनाएं ईमानदारी से लागू करनी पड़ेंगी। केंद्र के सहयोग के किंचित अभाव में यह कवायद उनके लिए मुश्किल होगी। देशवासी स्वाभिमानी हैं। वे रियायत चहते हैं, मुफ्तखोरी नहीं। एक व्यापक सर्वेक्षण में आधे से अधिक जनता ने मुफ्त की रेवड़ियों को गैरज़रूरी बताया, 78 फीसद ने इसे वोट हथियाने की चाल और 61 प्रतिशत लोग इसके वित्तीय दुष्परिणामों को लेकर चिंतित दिखे।

धनी वर्ग का तकरीबन 85 फीसद फ्रीबीज से सहमत नहीं दिखता तो 46 प्रतिशत गरीब भी चाहता है कि मुफ्त का माल या सुविधा देने की बजाय उसको इन्हें खुद हासिल करने के लिये सक्षम बनाया जाये। आमजन का बड़ा हिस्सा मानता है कि हमारे टैक्स के पैसों से दूसरों को सुविधाएं दी जा रही हैं। भाजपा जानती है कि गरीब लाभार्थी मतदाताओं का एक बेहद छोटा हिस्सा विरोध में खिसकता भी है तो बहुत बड़ा हिस्सा जो समय के साथ-साथ किंचित कारणों से क्षरित हो रहा हो वह उसके पक्ष में मजबूत भी होगा।

भाजपा का वैकल्पिक फ्रीबीज मॉडल और चुनावी रणनीति

फ्रीबीज की वैकल्पिक योजनाएं देश को कितनी सबल बना रही हैं, यह दर्शाने वाले आंकड़े दर्शा कर लोगों को भाजपा के प्रति भरोसा और पुख्ता किया जा सकेगा। इन परिस्थितियों में भाजपा विपक्षियों पर अजेय चुनावी बढत बना सकेगी। बीते दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान फ्रीबीज का वैकल्पिक मॉडल लागू करने से बचने वाली भाजपा अब इसकी शुरुआत 2026 में असम के विधानसभा चुनावों से करेगी। पार्टी अपने इस दांव को ठहरकर और पूरी तैयारी तथा गंभीरता से खेलना चाहती है।

हालांकि बिहार विधानसभा चुनाव इसी साल हैं लेकिन वह अपने पत्ते इसी साल नहीं खोलना चाहता क्योंकि उसका विचार है कि वह यह व्यवस्था उन्हीं राज्यों में लागू करेगी, जहां उसकी सरकार है या वह जहां अपने दम पर चुनाव लड़ने वाली हो। यह सियासी समझ के अनुसार बिल्कुल ठीक है। यदि सरकारें नौकरी सृजित नहीं कर पा रहीं, लोगों को काम और आमदनी का जरिया नहीं मुहैया कर पा रहीं, औपचारिक सामाजिक सुरक्षा नहीं दे पातीं, शासकीय प्रबंधन में अकुशल हैं तो दुबारा सत्ता पाने के लिए फ्रीबीज सबसे मुफीद उपाय है।

फ्रीबीज, महिला, किसानों को मुफ्त की सुविधाएं और धन बांटना जिस तरह सत्ता प्राप्ति में सहायक बन रहा है उसे देखकर लगता नहीं कि यह प्रवृत्ति इतनी जल्दी बदल जाएगी। फ्रीबीज के फायदे भी दिखे हैं, बिहार और पश्चिम बंगाल में स्कूली छात्राओं को मुफ्त साइकिल के चलते नामांकन बढा और ड्राप आउट दर घटा ।

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वैकल्पिक फ्रीबीज मॉडल: उद्यमशीलता को बढ़ावा

समाज के गरीब और हाशिये पर स्थित वर्गों को खाद्य, शिक्षा, स्वास्थ्य,बिजली, पानी, स्कूल यूऩिफॉर्म, पाठ्यपुस्तक, बीमा जैसी बुनियादी सुविधाओं के चलते निर्धनता अनुपात कम हुआ है। लोक कल्याणकारी योजनाओं, सब्सिडी और फ्रीबीज के बीच अंतर समझना जरूरी है। सब्सिडी हर बार अनुचित नहीं होती यहां तक कि नागरिकों की उद्यमशीलता को खत्म कर देने वाला फ्रीबीज भी यदि सुविचारित तौर पर सशर्त दी जाएं तो ये आय असमानता को कम कर सकती है।

फ्रीबीज के नये भाजपाई मॉडल में छोटे-मोटे दुकानदार, रेस्टोरेंट चलाने वाले निम्न आय वर्गीय परिवार, पिछड़े, दलित और समाज के जरूरतमंद तबकों के लोगों को सरकार सालाना एकमुश्त राशि देकर उद्यमशील बनाएगी, ताकि राज्य की जीडीपी बढ़े। मुफ्त या सब्सिडी वाली बिजली देने की बजाए सोलर लाइट लगवाने को प्रेरित कर, छूट दी जायेगी। मुफ्त यात्रा सुविधा की बजाए पात्र लोगों को अहस्तांतरणीय पास दिया जायेगा। सरकार की ओर से स्कूटी, लैपटॉप जैसी चीजें दी जाएंगी लेकिन मुफ्त की बजाए, एक रुपये महीने जैसे मामूली किराये या किस्त पर।

सबब यह कि सरकार जो पैसा लोकलुभाऊ योजनाओं में लगाएगी उसका अर्थिक उद्देश्य होगा कि नागरिक उद्यमशील बनें, स्वरोजगार बढे, वे मुख्यधारा का हिस्सा बनकर देश के आर्थिक विकास में सहयोग दें, स्वाभिमानी महसूस करें, लाभार्थी नहीं। अगली साल जब यह वैकल्पिक नीति सतह पर आयेगी सरकार कुछ और भी योजनाओं पर काम कर चुकी होगी। यदि सरकार वाकई गंभीर है और उसकी वैकल्पिक फ्रीबीज का मॉडल महज जुमला नहीं है तो यह एक अच्छा विचार है जिसको लागू करना देशहित में होगा।    

-(संजय श्रीवास्तव)

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