क्या ट्रंप की शांति के नोबेल की लालसा पूरी हो पाएगी?

ट्रंप ने हाल के समय में कई जगहों पर संघर्षरत देशों के बीच संघर्ष समाप्त करने में पहल की बातें कही हैं। फिर चाहे वो रूस-पोन के बीच काफी समय से चला आ रहा युद्ध हो, हाल ही में हुए भारत-पाकिस्तान संघर्ष की बात हो अथवा कांगो और रवांडा के बीच संघर्ष को रोकने लिए अद्भुत संधि कराने की बात हो। सच तो यह है कि ट्रंप नोबेल शांति पुरस्कार की लालसा को काफी अरसे से अपने जेहन में पाले हुए हैं, लेकिन वैश्विक घटनाक्रम के मद्देनजर उनकी लालसा पूरी होती दिखलाई नहीं पड़ रही है।

आज जब पूरी दुनिया ग्लोबल वार्मिंग, युद्धों के कारण आर्थिक अस्थिरता, महंगाई आदि के लगातार उथल-पुथल से जूझ रही है, हाल ही में ईरान और इजराइल एक बार फिर आमने-सामने थे, हालांकि अब दोनों में युद्धविराम हो गया है, पूरी दुनिया पर तीसरे विश्व युद्ध का खतरा मंडराने लगा है। कहना ग़लत नहीं होगा कि दोनों ईरान और इजराइल के बीच युद्ध का कारण केवल और केवल ईरान के परमाणु परीक्षण की कोशिश ही नहीं थी, बल्कि ईरान-इजराइल की लड़ाई के पीछे धार्मिक वैमनस्य, राजनीतिक प्रभुत्व की जंग, परमाणु हथियारों का डर और फिलिस्तीन का संघर्ष जैसे कई कारण हैं।

बहरहाल, पाकिस्तान ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप को नोबेल शांति पुरस्कार-2026 के लिए नामांकित करने का फैसला किया है, लेकिन पाकिस्तान के इस फैसले के कुछ समय बाद ही ट्रंप ने ईरान के परमाणु संयंत्रों पर हमला कर दिया। दरअसल, पाकिस्तान द्वारा हमले से एक दिन पहले अमेरिका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप को शांति का नोबेल पुरस्कार देने की आधिकारिक स़िफारिश के पीछे यह तर्क दिया गया कि ट्रंप ने भारत-पाकिस्तान संघर्ष के दौरान निर्णायक कूटनीति दिखाते हुए अहम नेतृत्व दिखाया, जिससे युद्ध के मुहाने पर खड़े दोनों देशों के बीच शांति स्थापित हुई।

दूसरे शब्दों में कहें तो पिछले दिनों ट्रंप ने पाकिस्तान के कथित फील्ड मार्शल आसिम मुनीर को दावत पर बुलाया था और उसके तीन दिन बाद ही पाकिस्तान सरकार ने यह बात कही कि भारत के साथ संघर्ष में ट्रंप का हस्तक्षेप एक वास्तविक शांतिदूत के रूप में उनकी भूमिका और बातचीत के माध्यम से संघर्ष समाधान के प्रति उनकी प्रतिबद्धता का प्रमाण है। अब यहां यक्ष प्रश्न यह उठता है कि आखिर पाकिस्तान, अमेरिका का इतना पक्षधर क्यों बना हुआ है कि उसने डोनल्ड ट्रंप को शांति का नोबेल दिलाने के संदर्भ में उसे नॉमिनेट किया है?

पाकिस्तान की ट्रंप पर निर्भरता की वजहें

यह बहुत आश्चर्यचकित करने वाली बात नहीं है कि आतंकियों को पालने वाले पाकिस्तान ने ट्रंप को शांति के नोबेल पुरस्कार के लिए नॉमिनेट किया है। दरअसल, पाकिस्तान ट्रंप की नजर में हीरो बनना चाहता है। आपको बताता चलूं कि अमेरिका लंबे समय से पाकिस्तान का साथ देते आया है, लेकिन राष्ट्रपति जो बाइडन के कार्यकाल में अमेरिका-पाकिस्तान के बीच दूरियां काफी बढ़ गई थीं।

पाकिस्तान की हरकतों से आजिज आकर जो बाइडन के कार्यकाल में अमेरिका ने पाकिस्तान पर नकेल कस दी थी। इसलिए एक बार फिर से अमेरिका की नजदीकी हासिल करने के लिए पाकिस्तान ने ट्रंप का नाम नॉमिनेट किया है। दूसरी बात यह है कि पाकिस्तान पिछले काफी समय से बुरी तरह से कंगाली से जूझ रहा है और पाकिस्तान को उम्मीद है कि अमेरिका उसे आर्थिक संकट से उबारेगा। पाकिस्तान को यह भी लगता है कि अमेरिका कश्मीर मुद्दे पर भी उसका साथ देगा। पाकिस्तान को यह भी उम्मीद है कि अमेरिका की सहायता से उसका हथियारों का संकट भी काफी हद तक दूर हो सकेगा।

इतना ही नहीं पाकिस्तान को जंग में भी अमेरिका से साथ की उम्मीद है। यही सब कारण हैं कि पाकिस्तान ट्रंप को शांति के नोबेल से नवाजे जाने की वकालत कर रहा है। हालांकि, इधर डोनल्ड ट्रंप ने यह बात कही है कि वह कुछ भी कर लें उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार नहीं मिलेगा। ट्रंप पिछले दिनों भारत-पाकिस्तान संघर्ष के बाद कई दफा दावा कर चुके हैं कि उन्होंने ही दोनों पड़ोसी देशों (भारत और पाकिस्तान) के बीच संघर्ष रुकवाया था।

नोबेल शांति पुरस्कार की चयन प्रक्रिया

हालांकि, भारत सरकार ने उनके इस दावे को सिरे से खारिज कर दिया था और भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने यह बात कही थी कि भारत ने न तो कभी मध्यस्थता स्वीकार की थी, न करता है, और न ही कभी करेगा। बहरहाल, आपको बताता चलूं कि शांति का नोबेल पुरस्कार दुनिया का सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार है और इसे हर साल उन लोगों को दिया जाता है, जिन्होंने राष्ट्रों के बीच भाईचारे के लिए, स्थाई सेनाओं के उन्मूलन या कमी के लिए और शांति सम्मेलनों के आयोजन और प्रचार के लिए सबसे अधिक या सबसे अच्छा काम किया है।

गौरतलब है कि इसके विजेता या विजेताओं का नाम नॉर्वेजियन नोबेल समिति द्वारा चुना जाता है तथा इस पुरस्कार के लिए शांति में अहम योगदान देने वाले किसी भी व्यक्ति, संगठन अथवा आंदोलन को नॉमिनेट किया जा सकता है। जहां तक नोमिनेशन की बात है तो नोबेल शांति पुरस्कार के लिए हर कोई किसी को भी नॉमिनेट नहीं कर सकता है। वास्तव में किसी देश के प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, कैबिनेट मंत्री या राष्ट्रीय सभा के सदस्य किसी को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नॉमिनेट कर सकते हैं।

इनके अलावा नीदरलैंड के हेग में स्थित अंतरराष्ट्रीय न्यायालय, हेग में स्थित स्थायी मध्यस्थता न्यायालय के सदस्य, एलइंस्टीट्यूट डी ड्रोइट इंटरनेशनल के सदस्य, महिला अंतरराष्ट्रीय लीग के अंतरराष्ट्रीय बोर्ड के सदस्य, विश्वविद्यालयों के प्रोफेसर, रेक्टर और निदेशक के साथ ही शांति अनुसंधान संस्थान और विदेश नीति संस्थान के निदेशक भी इस पुरस्कार के लिए किसी को नॉमिनेट कर सकते हैं।

ट्रंप की नोबेल शांति पुरस्कार की मुश्किल राह

नोबेल शांति पुरस्कार प्राप्त लोग, नोबेल शांति पुरस्कार प्राप्त संगठन के मुख्य निदेशक, नॉर्वेजियन नोबेल समिति के सदस्य, नॉर्वेजियन नोबेल समिति के पूर्व सलाहकार आदि के पास भी नॉमिनेशन का अधिकार होता है। आपको बताता चलूं कि 10 दिसंबर को यह पुरस्कार दिया जाता है। बहरहाल, ट्रंप ने हाल के समय में कई जगहों पर संघर्षरत देशों के बीच संघर्ष समाप्त करने में पहल की बातें कही हैं।

फिर चाहे वो रूस-पोन के बीच काफी समय से चला आ रहा युद्ध हो, हाल ही में हुए भारत-पाकिस्तान संघर्ष की बात हो अथवा कांगो और रवांडा के बीच संघर्ष को रोकने लिए अद्भुत संधि कराने की बात हो। सच तो यह है कि ट्रंप नोबेल शांति पुरस्कार की लालसा को काफी अरसे से अपने जेहन में पाले हुए हैं, लेकिन वैश्विक घटनाक्रम के मद्देनजर उनकी लालसा पूरी होती दिखलाई नहीं पड़ रही है।

दूसरे शब्दों में कहें तो डोनल्ड ट्रंप का नाम पाकिस्तान ने साल 2026 के नोबेल शांति पुरस्कार के लिए भले ही नॉमिनेट कर दिया है पर उनके लिए यह पुरस्कार पाना आसान नहीं है। सबसे पहले तो पाकिस्तान जैसे देश की ओर से नॉमिनेट किया जाना ही संदेह पैदा करता है,क्योंकि पाकिस्तान खुद आतंकवाद को बढ़ावा देता है। भारत-पाकिस्तान संघर्ष में भी पाकिस्तान की गुहार पर भारत ने संघर्ष विराम किया था, न कि ट्रंप ने दोनों देशों के बीच शांति स्थापित करने में भूमिका निभाई थी।

इजराइल-ईरान संघर्ष में अमेरिका की भूमिका स्पष्ट

इतना ही नहीं,पाकिस्तान ही नहीं, खुद अमेरिका पर आतंकवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगता रहा है। रूस-पोन युद्ध रोकने का दावा करने वाले ट्रंप का देश अमेरिका शुरू से ही पोन को हथियार देकर युद्ध को और भड़काता रहा है। इजराइल के हमास पर हमले और फिर ईरान पर हमले में अमेरिका का बड़ा हाथ रहा है। हथियारों की संख्या कम करने के बजाय दूसरे देशों को हथियार बेचना अमेरिका की रणनीति रही है।

यह ठीक है कि अमेरिका ने युद्धरत ईरान और इजराइल के बीच तनाव को कम करने की बात तो कही है, लेकिन 22 जून 2025 को तड़के इजराइल की तरफ से ईरान पर बम डाल कर ईरान के तीन सामरिक ठिकाने नष्ट कर दिए। अमेरिका ने इजराइल की मदद की। दरअसल,अमेरिका और इजराइल की दोस्ती जगजाहिर है। इजराइल की स्थापना के साथ ही अमेरिका उसका समर्थक रहा है। इसके बाद भले ही अचानक उसने दोनों देशों के बीच युद्धविराम भी करवा दिया।

सुनील कुमार महला
सुनील कुमार महला

बहरहाल, पाकिस्तान ने भले ही शांति के नोबेल के लिए ट्रंप को नामित करने की बात कही है, लेकिन उसके अपने देश में ही इसका तीव्र विरोध शुरू हो गया है। संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान की राजूदत रह चुकीं मलीहा लोधी ने एक्स (ट्विटर) पर लिखा है कि ट्रंप को नोबेल नामित करने संबंधी सरकार का फैसला दुर्भाग्यपूर्ण है। ऐसे में ट्रंप को शांति पुरस्कार मिलना आसान नहीं है।

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