ओपेक से यूएई का तल़ाक : अंत की शुरूआत?

वैश्विक ऊर्जा बाजार में हाल ही में एक ऐसा भूचाल आया है, जिसकी गूंज आने वाले कई दशकों तक दुनिया भर में सुनाई देगी। 28 अप्रैल, 2026 को संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने एक ऐतिहासिक घोषणा करते हुए 1 मई से तेल निर्यातक देशों के संगठन ओपेक और ओपेक प्लस से बाहर होने का फैसला किया है। 1967 से इस संगठन का अहम हिस्सा रहे यूएई का यह तल़ाकनामा कोई आम व्यापारिक निर्णय नहीं, बल्कि मध्य पूर्व की भू-राजनीति और वैश्विक ऊर्जा समीकरणों में बड़े और निर्णायक बदलाव का साफ संकेत है। आम जनता के लिए इसका सीधा अर्थ यह है कि दुनिया भर में तेल के दाम तय करने वाले सबसे बड़े गुट में अब फूट पड़ गई है!

दरअसल, इस अप्रत्याशित फैसले की बड़ी वजह यूएई की अपनी दूरगामी आर्थिक नीतियाँ और ऊर्जा महत्वाकांक्षाएं हैं। ओपेक, मुख्य रूप से सऊदी अरब के नेतृत्व में, दुनिया भर में कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनाए रखने के लिए उत्पादन सीमा (कोटा) तय करता है। यूएई ने अपने तेल बुनियादी ढांचे में भारी निवेश किया है और 2027 तक अपनी उत्पादन क्षमता को 50 लाख बैरल प्रतिदिन तक ले जाने का लक्ष्य रखा है।

ओपेक नियमों से यूएई की उत्पादन क्षमता पर असर

ओपेक के सख्त नियमों के चलते वह अपनी इस क्षमता का उपयोग नहीं कर पा रहा था। वैसे भी, हाल के वर्षों में यूएई और सऊदी अरब के बीच क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर दूरियाँ बढ़ी हैं। जहाँ सऊदी अरब अपनी अर्थव्यवस्था को नया रूप देने के लिए तेल की ऊंची कीमतें चाहता है, वहीं यूएई दुनिया के हरित ऊर्जा (ग्रीन एनर्जी) की तरफ मुड़ने से पहले अपने तेल भंडार का अधिकतम लाभ उठाना चाहता है।

इसी कश्मकश के चलते, इन दिनों जारी ईरान युद्ध और होर्मुज जल-डमरू-मध्य के तनाव के बीच, यूएई ने महसूस किया कि उसे अपनी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं और सुरक्षा को सर्वोपरि रखते हुए ओपेक की सामूहिक जवाबदेही से अलग होकर स्वतंत्र फैसले लेने होंगे। और नतीजा सामने है। सयाने बता रहे हैं कि यूएई का बाहर निकलना ओपेक और उसके अघोषित नेता सऊदी अरब के लिए करारा झटका है।

बड़ी हद तक ओपेक के अंत की शुरुआत! क्योंकि यूएई के निकलते ही संगठन ने अपनी 15 प्रतिशत उत्पादन क्षमता और एक बेहद अनुशासित सदस्य खो दिया है। इससे सऊदी अरब का एकाधिकार कमजोर होगा और तेल बाजार को अपनी मुट्ठी में रखने की ओपेक की ताकत घटेगी। कहना न होगा कि यह फैसला मध्य पूर्व में एक नए शक्ति समीकरण को जन्म देने वाला साबित हो सकता है।

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यूएई का पश्चिमी देशों से सीधे ऊर्जा समझौता

यूएई अब पश्चिमी देशों और अमेरिका के साथ सीधे तौर पर अपने ऊर्जा समझौते कर सकेगा न! भले ही, शॉर्ट-टर्म में (युद्ध के कारण) बाजार में थोड़ी अस्थिरता रह सकती है, लेकिन लॉन्ग-टर्म में ओपेक के बाहर यूएई का स्वतंत्र उत्पादन वैश्विक बाजार में तेल की आपूर्ति बढ़ाएगा, जिससे गुट की मनमानी पर रोक लगेगी। जहाँ तक भारत की बात है, तो याद रहे कि हम दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता देश हैं और अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का 80 प्रतिशत से अधिक आयात करते हैं।

ऐसे में यूएई का यह कदम हमारे लिए बेहद सकारात्मक साबित होने वाला है। याद रहे, ओपेक की उत्पादन में कटौती की नीतियाँ अक्सर भारत जैसे विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था पर भारी पड़ती हैं। ओपेक के बंधनों से मुक्त होकर जब यूएई बाजार में अपनी पूरी क्षमता से तेल उतारेगा, तो सप्लाई बढ़ने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आएगी।

इससे आने वाले समय में भारत में पेट्रोल-डीजल के दाम कम होने की उम्मीद है, जिससे आम आदमी को महंगाई से बड़ी राहत मिलेगी। वैसे भी, भारत और यूएई के बीच पहले से ही मजबूत व्यापारिक संबंध हैं और दोनों देशों के बीच व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौता भी लागू है। यूएई के स्वतंत्र होने से भारत बिना किसी तीसरे पक्ष (ओपेक) के दबाव के, सीधे तौर पर बेहतर और किफायती कीमतों पर तेल के दीर्घकालिक सौदे कर सकेगा। इससे हमारी ऊर्जा सुरक्षा अधिक मजबूत होगी। तथास्तु!

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