पुष्पों की गंध-सा महकता नाटक संग्रह : पांच आदर्श नाटक
लिशा प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित 132 पृष्ठ की सॉफ्ट बाउंड पुस्तक पांच आदर्श नाटक रामवीर सिंह राहगीर की छठी कृति है। यह किताब उनकी पूर्व की पाँच किताबों योद्धा संन्यासी स्वामी विवेकानंद, पंचायत द ऑनर किलिंग, पैसों वाला गद्दा, वन कन्या एवं यात्रा प्रसंग संस्कार भारती के संग के बाद आई है। पांच आदर्श नाटक नामक इस किताब में उन्होंने पांच पुष्पों के नाम से पांच नाटक संजोए हैं।
लेखक की ग्रामीण पृष्ठभूमि एवं पुस्तक के शीर्षक से ही स्पष्ट है कि उन्होंने समाज को कुछ आदर्श या नैतिक संदेश देने की कोशिश की है। पांच आदर्श नाटक एक ऐसा मौलिक नाट्य संग्रह है जिसमें नाटकों को अलग-अलग खुशबू में पिरोया गया है। इस नाट्य संग्रह का प्रथम पुष्प ( लेखक ने प्रत्येक नाटक के लिए पुष्प शब्द का प्रयोग किया है) मम्मी ऐसी ही होती है नाट्य कला के शास्त्राय तत्वों एवं मंचन की दृष्टि से इस पुस्तक का सर्वश्रेष्ठ नाटक है, जो मां का बच्चों के प्रति समर्पण एवं स्नेह दर्शाता है, जबकि बच्चे अपने-अपने स्वार्थों में डूब जाते हैं।
पिता प्रशासक जैसी भूमिका निभाता है, लेकिन मां बुखार में तपने के बावजूद उन्हें खाना बना कर देती है। बात ज़रा-सी है, लेकिन संदेश बहुत बड़ा है। इस नाटक में दो दृश्य बहुत ही प्रभावी बन पड़े हैं। एक, जिसमें नौकरी करके कार्यालय से वापस आईं दो बहनें आपस में लड़ती हैं और फिर थकी होने का बहाना बनाकर अपने-अपने कमरों में जाकर लेट जाती हैं। बाद में भारी सिरदर्द और बुखार से ग्रस्त बीमार मां से वे रोटियां बनाना सीखती हैं और उन्हें परोसती हैं। इसके बाद एक छोटे-सा संवाद आता है कि- मम्मियाँ ऐसी ही होती हैं। इस संवाद से तनावग्रस्त माहौल सामान्य बन जाता है।
भावुक राम और जिम्मेदार शासक का प्रभावशाली प्रस्तुतीकरण
द्वितीय पुष्प एकल नाटक है हे सीते। हमारे समाज में प्राचीन काल से ही नारी की जो स्थिति है, उसका चित्रण इस नाटक में किया गया है। इस नाटक में लेखक ने पूरी रामायण को ही मोनोलॉग( स्व कथन) के माध्यम से राम के मुख से दोहराया है। राम के ही मुख से आज का संदेश भी देने में भी लेखक सफल रहा है।
एक संवाद देखिए- यह समाज यह भी तो समझता है कि पत्नी के बिना यज्ञ पूरा नहीं होता और देखिए फिर भी वास्तविक पत्नी को पास आने से मना करता है…. । यहां पर लेखक राम को एक भावुक व्यक्ति के साथ-साथ एक जिम्मेदार शासक के रूप में प्रस्तुत करते नज़र आया है।
राम, रामकृष्ण परमहंस और वीर बंदा बहादुर की प्रेरक कथाएं
इस नाटक में राम का जनता के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी को समझना और साथ-ही-साथ अपने मनोभावों तथा अंतर्मन की व्यथा को व्यक्त करना बहुत प्रासंगिक बन पड़ा है। व्यथा के चित्रण के साथ-ही-साथ यह प्रश्न भी खड़ा होता है कि इस नाटक में अधिकांश संवाद स्वगत यानी आत्मकथ्य शैली में हैं तब उनका मंचन किस प्रकार से प्रभावशाली बन पड़ेगा? तीसरा नाटक बेटी रामकृष्ण परमहंस एवं उनकी पत्नी के माध्यम से एक डाकू के हृदय परिवर्तन का है। जब शारदा को उसके अपने साथी ही जंगल में छोड़कर चले जाते हैं, तब एक डाकू कैसे उन्हें परमहंस रामकृष्ण से मिलवाता है और बदले में हृदय परिवर्तन का उपहार पाता है।
चौथे पुष्प यानी नाटक वीर बंदा बहादुर के माध्यम से रामवीर सिंह राहगीर ने जिस तरह से गुरु गोविंद सिंह एवं वीर बंदा बहादुर के बारे में लिखा है, वह इस रचना की उत्कृष्टा की परिचायक है। इसके माध्यम से लेखक ने सिखों के शौर्य का वर्णन किया है। यह शौर्य वर्णन बहुत प्रभावी बन पड़ा है। अंतिम पांचवां पुष्प यानी नाटक है सेला नूरा और जसवंत सिंह। इस नाटक में रामवीर सिंह राहगीर ने भारत-चीन युद्ध में जसवंत सिंह की बहादुरी का वर्णन किया है।
नाटक लेखन में निरंतर निखार की ओर अग्रसर हैं राहगीर
रामवीर सिंह राहगीर ने अपने प्रथम नाटक पंचायत – द ऑनर किलिंग से ही अपनी विचारशैली और लेखन शैली का परिचय दे दिया था। वे अपने तरह के अलहदा आदर्शवादी नाटक लिखते हैं। उनकी भाषा में भी उनकी ग्रामीण पृष्ठभूमि बोलती है और संवादों में भी ग्राम्यता का एहसास होता है। उनका प्रयास श्लाघनीय है। जितना घिसेंगे, चमक उतनी और बढ़ती जाएगी। इसमें दो राय नहीं कि उनका लेखन निरंतर निखार की ओर अग्रसर है।

350 रुपये में पांच नाटक पढ़ना महंगा सौदा नहीं कहा जा सकता है, बेहतर होगा कि राहगीर जी नाटक कला के आधुनिक स्वरूप का और अध्ययन करें और आज के संदर्भ में भी कुछ और एकांकी या नाटक ज़रूर लिखें। साथ-ही-साथ मंचीय सीमाओं का ध्यान यदि रखा जाएगा तो उनके नाटक थिएटर तक भी पहुंचेंगे और लग्न तथा मेहनत एवं जुनून ज़रूर उन्हें सुफल देगा।
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