आदि शंकराचार्य सनातन परंपरा के पुनर्सृजक

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भारतीय आध्यात्मिक परंपरा हजारों वर्ष पुरानी है, लेकिन यह समय-समय पर विशिष्ट महापुरुषों द्वारा पुनर्जीवित होती रही है। ऐसे ही एक अद्वितीय व्यक्तित्व थे, आदि शंकराचार्य। आदि शंकराचार्य वेदांत परंपरा के पुनर्संस्थापक हैं। उनका जन्म लगभग 8वीं शताब्दी में हुआ। उन्हें सनातन धर्म को पुनर्जीवन देने वाला माना जाता है। आदि शंकराचार्य ने ही अद्वैत वेदांत को स्पष्ट और मजबूत रूप दिया। उनका मुख्य सिद्धांत था- ब्रह्म सत्यं, जगत मिथ्या, जीवो ब्रह्मैव नापराः यानी आत्मा और ब्रह्म एक ही हैं।

वास्तव में यही भारतीय विचार दर्शन की धुरी है। आदि शंकराचार्य ही थे, जिन्होंने शास्त्रां को तर्किक आधार दिया। उन्होंने उपनिषद, भगवद्गीता और ब्रह्मसूत्र पर भाष्य लिखे। इन भाष्यों ने वेदांत को सिर्फ आस्था नहीं बल्कि तर्क और दर्शन का विषय बनाया। उन्होंने सनातन धर्म के बिखरे हुए स्वरूप को एक सूत्र में बांधा और इसके लिए भारत की चार दिशाओं में चार मठों की स्थापना की। ये सब कार्य उन्होंने उस समय किया, जब भारत में अनेक मत-मतांतर और भ्रम फैले हुए थे।

आदि शंकराचार्य ने कर्मकांड और ज्ञान के बीच संतुलन विकसित किया। उन्होंने कर्मकांड का विरोध नहीं किया, लेकिन कर्म के साथ ज्ञान को शामिल करके मोक्ष का मार्ग बताया। उन्होंने दक्षिण भारत से शुरु करके उत्तर भारत सहित समूचे आर्यावर्त की पदयात्रा की और भारत को एक आध्यात्मिक राष्ट्र का रूप दिया। आदि शंकराचार्य का जन्म केरल के कालड़ी में हुआ था।

32 साल में ज्ञान, यात्रा और दर्शन से बदल दी आध्यात्मिक दिशा

उनकी माता का नाम आर्यम्बा और पिता का शिवगुरु था। बचपन से ही वह अति मेधावी थे। आठ वर्ष की उम्र में ही उन्होंने समस्त वेदों का ज्ञान अर्जित कर लिया था। एक दिन वह नदी में स्नान कर रहे थे। अचानक से एक मगरमच्छ ने उनका पैर पकड़ लिया तो उन्होंने अपनी माँ से संन्यास लेने की अनुमति मांगी और माँ ने दे दी। इसी के साथ मगरमच्छ ने उनका पैर छोड़ दिया। इस घटना के बाद वे संन्यासी बन गये। उन्होंने गोविंद भगवतपाद को अपना गुरु बनाया।

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गुरु ने उन्हें अद्वैत वेदांत की शिक्षा देकर प्रचार का कार्य सौंपा। उन्होंने तब के संपूर्ण भारत की पदयात्रा की। जगह-जगह अनेक विद्वानों के साथ शास्त्रार्थ किए। इसी क्रम में मंडन मिश्र को शास्त्र में हराया, जो बाद में सुरेश्वाचार्य के नाम से उनके शिष्य बन गये। शंकराचार्य ने भारत की चारों दिशाओं में चार मठ स्थापित किए- दक्षिण में श्रृंगेरी, उत्तर में ज्योतिर्मठ (जोशीमठ), पश्चिम में द्वारका और पूर्व में पुरी। इन मठों के चलते भारत की आध्यात्मिक एकता को मजबूत आधार मिला।

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शंकराचार्य एक दार्शनिक, कवि और टीकाकार भी थे। उनकी रचनाओं में प्रसिद्ध हैं- ब्रह्मसूत्र भाष्य, भगवद्गीता भाष्य, उपनिषद भाष्य और भक्ति रचनाओं में भज गोविंदम् और निर्वाण षट्कम् आदि। महज 32 वर्ष की आयु में उन्होंने अपना शरीर त्याग दिया। उनकी मृत्यु के स्थान को लेकर मतभेद है। कुछ लोगों का कहना है कि उन्होंने केदारनाथ में तो कुछ के मुताबिक कांचीपुरम में शरीर त्यागा। उनका जीवन असाधारण था। कम उम्र में ही ज्ञान, त्याग, यात्रा, दर्शन और संगठन सब कुछ उन्होंने कर दिखाया। वह सचमुच एक संत, महान विचारक, एक क्रांति और परंपरा के पुनर्सृजक थे।

आर.सी.शर्मा

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