ब्रह्मपुत्र पर बाँध ! चाहता क्या है चीन ?

नव वर्ष 2026 के आगमन पर चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग का वार्षिक संबोधन न केवल चीन की आर्थिक व सैन्य उपलब्धियों का गुणगान था, बल्कि उसमें ब्रह्मपुत्र नदी पर मेगा जलविद्युत परियोजना के प्रारंभ का उल्लेख एक रणनीतिक संकेत के रूप में उभरा। संबोधन में शी ने कहा कि यारलुंग जंगबो नदी के निचले हिस्से में जलविद्युत परियोजना का निर्माण शुरू हो गया है। याद रहे, यह 170 अरब डॉलर की लागत वाली दुनिया की सबसे बड़ी बाँध परियोजना है, जो तिब्बत के पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र में स्थित है। भारत के लिए यह उल्लेख मात्र एक उपलब्धि का जश्न नहीं, बल्कि जल संसाधनों पर नियंत्रण की दिशा में चीन की महत्वाकांक्षा का प्रतीक है।

डेटा पारदर्शिता का अभाव: अविश्वास की जड़

गौरतलब है कि ब्रह्मपुत्र का संदर्भ ऐतिहासिक रूप से जटिल रहा है। यारलुंग जंगबो के नाम से जानी जाने वाली यह नदी तिब्बत से निकलकर अरुणाचल प्रदेश और असम होते हुए बांग्लादेश में बहती है, जहाँ यह 14 करोड़ से अधिक लोगों की आजीविका का आधार है। 2015 से ही चीन की बाँध-निर्माण गतिविधियाँ भारत की चिंताओं का कारण बनी हुई हैं। सयाने बता रहे हैं कि चीन का यह मेगा बाँध शुष्क मौसम में नदी के प्रवाह को 85 प्रतिशत तक कम कर सकता है, जिससे पूर्वोत्तर भारत में सूखा और कृषि संकट गहरा सकता है।

शी ने पहले भी इस नदी का उल्लेख किया था, जिसके बाद भारत ने सियांग नदी पर काउंटर-बाँध की योजना बनाई। लेकिन हाल ही में तनाव तब चरम पर पहुँच गया, जब अल जजीरा ने इसे हिमालयी जल युद्ध की ओर इशारा बताया! चीन की डेटा साझेदारी में पारदर्शिता की कमी – जैसे बाढ़ पूर्व चेतावनी तंत्र का अभाव – ने अविश्वास को बढ़ावा दिया है। इस उल्लेख के निहितार्थ बहुआयामी हैं।

पर्यावरणीय दृष्टि से, तिब्बत के भूकंप-प्रवण क्षेत्र में बड़े बाँध से भूस्खलन या बाढ़ का खतरा पैदा हो सकता है। आर्थिक रूप से, यह परियोजना 60 गीगावाट बिजली उत्पन्न करेगी, लेकिन डाउनस्ट्रीम क्षेत्रों (असम, अरुणाचल और बांग्लादेश) के लिए जल-आपूर्ति में व्यवधान का जोखिम है। रणनीतिक रूप से, यह हाइड्रो-हेज्मनी का प्रतीक है, जहाँ चीन जल को हथियार के रूप में इस्तेमाल कर सकता है। कहना न होगा कि इससे एशिया की परमाणु शक्तियों के बीच जल युद्ध की आशंका को बल मिल रहा है।

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जल को हथियार बनाने की आशंका: भारत-चीन संबंधों पर संकट

शी की मंशा स्पष्ट है। आंतरिक चुनौतियों (आर्थिक मंदी और व्यापार तनाव) के बीच राष्ट्रीय गौरव जगाना! नववर्ष संबोधन में नवाचारों की सूची में, एआई, चिप्स और विमानवाहक पोत के साथ, बाँध को शामिल करना इसे राष्ट्रीय प्रगति का प्रतीक बनाता है। लेकिन भारत-केंद्रित दृष्टि से, यह क्षेत्रीय वर्चस्व की कोशिश है। यह बाँध भारत की सुरक्षा, स्थिरता और प्रभाव को कमजोर करेगा। चीन ने इसे रन-ऑफ-द-रिवर परियोजना बताया है, लेकिन डेटा की कमी संदेह पैदा करती है। सतर्कता ज़रूरी है कि चीन ब्रह्मपुत्र को पाकिस्तान के समर्थन में हथियार बना सकता है!

जाहिर है कि भारत-चीन संबंधों पर इसका असर गहरा होगा। लद्दाख गतिरोध के बाद जल विवाद नया तनाव बिंदु बन सकता है। यानी, चीन की यह परियोजना वास्तविक खतरा है। भारत ने 2025 में सियांग पर 11 गीगावाट बाँध की घोषणा की, लेकिन स्थानीय विरोध ने इसे जटिल बना दिया। यही समय है जब, कूटनीतिक रूप से, भारत को शंघाई सहयोग संगठन जैसे मंचों पर दबाव बनाना होगा। जल-साझेदारी संधि की माँग मजबूत होनी चाहिए, जिसमें पूर्व चेतावनी और डेटा साझा अनिवार्य हो।

निष्कर्षत, शी का यह उल्लेख एक चेतावनी है। चीन की एकतरफा कार्रवाई क्षेत्रीय स्थिरता को खतरे में डाल रही है। भारत को बहुपक्षीय दृष्टिकोण अपनाना चाहिए – बांग्लादेश के साथ गठबंधन करना और संयुक्त राष्ट्र जल सम्मेलनों में मुद्दा उठाना! पूर्वोत्तर राज्यों के लिए जल प्रबंधन में निवेश आवश्यक है। यदि समय रहते संवाद न हुआ, तो ब्रह्मपुत्र मात्र नदी नहीं, सीमा रेखा बन जाएगी!

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