रसगुल्ले पर तकरार

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बिहार के पवित्र बोधगया में, जहाँ भगवान बुद्ध ने ज्ञान प्राप्त कर संसार को शांति का पाठ पढ़ाया, वहाँ एक शादी समारोह ने ऐसा तमाशा रचा कि भगवान बुद्ध अगर जीवित होते, तो शायद ध्यान में बैठे-बैठे ही हँस पड़ते। ज़रा सोचिए। बरात आती है, ढोल-नगाड़े बजते हैं, दूल्हा घोड़ी पर चढ़ा इतराता है, दुल्हन सज-धजकर तैयार है। लेकिन अचानक, भोज के दौरान रसगुल्ले की प्लेटें खाली! और लात-घूँसों का दौर शुरू! कुर्सियाँ उड़ीं, और वधू पक्ष ने न केवल शादी तोड़ दी, बल्कि बरात को खाली हाथ लौटा दिया। बंगाल का गौरव रहा रसगुल्ला अचानक बिहार का रौरव बन गया!

रसगुल्ले पर विवाद ने दहेज और लालच की मानसिकता उजागर की

यह घटना सुनकर मन में एक सवाल उभरता है- आख़िर कबसे हमारी शादियाँ रसगुल्ले पर निर्भर हो गईं? दहेज, जाति, कुंडली – ये ही क्या कम थे कि मिठाई की मात्रा भी विवाह का मापदंड बन गई? वधू पक्ष ने महसूस किया होगा कि रसगुल्ले के लिए लड़ मरने वाले भला दुल्हन का सम्मान क्या जानें! उधर वर पक्ष चिल्लाया होगा- रसगुल्ला नहीं तो शादी नहीं! सच पूछिए तो, रसगुल्ला तो बस बहाना है; असल में यह हमारी लालची प्रवृत्ति का आईना है। दूल्हा भले साइकिल पर आए, दहेज में एसयूवी की उम्मीद रखता है। बरात में 50 लोग आते हैं, लेकिन भोजन के लिए 500 प्लेटें गिनी जाती हैं। प्रीतिभोज पर बंदूकें निकल आना भी ऐसे लोभी समय में अचरज नहीं!

सोचिए, अगर रसगुल्ला ही इतना महत्वपूर्ण हो गया, तो उन परंपराओं का क्या होगा जिनकी महानता की दुहाई देकर हम विश्वगुरु होने का दम भरते हैं? शादी का मतलब तो सात फेरे, कन्यादान, मंगलसूत्र और जीवनसाथी का साथ था। लेकिन आज? यह एक कॉर्पोरेट डील है – वार्षिक रिपोर्ट में मिठाई का बजट, प्रॉफिट में दुल्हन की ज्वैलरी और लॉस में दूल्हे की नौकरी! वधू पक्ष ने गहने उठा लिए और चले गए! अच्छा किया। पुरुषवादी समाज में जहाँ दुल्हन को पराया धन माना जाता है, वहाँ रसगुल्ले ने दुल्हन को विद्रोहिणी बना दिया। इस तमाशे से दर्शकों ने ज़रूर यह सीखा हो कि मीठा कम पड़े तो जीवन कड़वा हो जाता है!

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कन्या पक्ष ने वर पक्ष के व्यवहार को अवांछित बताकर बरात लौटाई

वैसे यह घटना हमारी अतिथि देवो भव वाली संस्कृति पर भी टिप्पणी की तरह है। बराती देवता होते हैं, लेकिन रसगुल्ला न मिले तो राक्षस! होटल मालिक ने बाद में सफाई दी कि स्टॉक खत्म हो गया, लेकिन कौन सुनेगा? बरात तो लौट गई न। आजकल शादियाँ बफे स्टाइल हैं – खाओ जितना चाहो। पर यह कहाँ की सभ्यता है कि कम पड़ जाए तो युद्ध ठान लो?

क्या अतिथियों को भी आतिथेय के सम्मान की रक्षा नहीं करनी चाहिए? लेकिन नहीं, कन्या पक्ष से शायद आज भी यही उम्मीद की जाती है कि वर पक्ष के पैरों में अपनी पगड़ी रख दे। भला हो उस कन्या का जिसने यह नौबत आने से पहले ही वर पक्ष के आचरण को अवांछित घोषित कर दिया। धन्यवाद रसगुल्ले का, जिसने ख़ुद खत्म होकर बरात के चरित्र की पोल खोल दी!
बेशक इस घटना को एक हास्यास्पद समाचार कहकर दरकिनार किया जा सकता है। लेकिन ऐसी घटनाएँ क्या हमारी सामाजिक विडंबनाओं को उजागर नहीं करती हैं?

शादियाँ, जिन्हें खुशियों का प्रतीक होनी चाहिए, तनाव का मैदान बन गई हैं! क्या सिनेमा और सीरियलों के अंधानुकरण से तौबा करके हम सरल शादियाँ नहीं अपना सकते? कहीं वैभव प्रदर्शन और शाही अंदाज में भोज की प्रतियोगिता के पीछे विवाह संस्कार की सहज पावनता तो लुप्त नहीं हो रही? सच तो यह है कि रसगुल्ला हो या न हो, हर रिश्ते में रस ज़रूर होना चाहिए। रस रहेगा तो तकरार के लिए जगह बचेगी ही नहीं!

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