गर्दभ का भारतीय सभ्यता से है नाता

पिछले कुछ दशकों में भारत में गर्दभों की संख्या में भारी गिरावट आई है। सदियों से गुजरात, मध्यप्रदेश, पंजाब और उत्तरप्रदेश आदि राज्यों में गर्दभों के वार्षिक मेले आयोजित होते रहे हैं। हम गर्दभ को अपनी संस्कृति का महत्वपूर्ण अंग मानते हैं, लेकिन वास्तविकता इससे भिन्न है। अथर्ववेद में उल्लेख है कि इंद्र और अग्निदेव गर्दभ द्वारा खींची गईं गाड़ियों की सवारी करते थे। देवताओं से जुड़े होने के बावजूद विनम्र और परिश्रमी गर्दभ को हमेशा चिड़चिड़े अश्व की तुलना में कम महत्व दिया गया।
दोनों प्राणियों के बीच अंतर स्पष्ट है। अश्व राजा और योद्धाओं से जुड़ा है, जबकि गर्दभ धोबी और कुम्हार जैसे सेवा प्रदाताओं से। अश्व सूर्य के उज्ज्वल पुत्र रेवन्त से जुड़ा है, जबकि गर्दभ दुर्भाग्य और महामारी की देवियों से। गर्दभ संभवत 5000 वर्ष पहले अफ्रीका में पहली बार पालतू बनाया गया था। कलाकृतियों के आधार पर कह सकते हैं कि उसे अफ्रीका से ईराक तक लाया गया। संभव है कि उसे सिंधु घाटी सभ्यता तक भी ले जाया गया हो।
धोलावीरा से मिली 4000 वर्ष पुरानी मुहर में गर्दभ का चित्रण
हालांकि इसके कोई ठोस प्रमाण नहीं मिले हैं। इस क्षेत्र में 4,000 वर्ष पुरानी मुहर मिली है, जिस पर गर्दभ रूपी प्राणी की छवि है। यह जंगली गर्दभ है, जिसे पालतू बनाना कठिन होते हुए भी असंभव नहीं है। यह प्राणी लवणीय कच्छ के रण का मूल निवासी है। इसी क्षेत्र में हड़प्पा की सभ्यता का पथरीला धोलावीरा शहर स्थित है। गर्दभ सामान्यत उत्तर भारत में अधिक पाए जाते हैं। प्राचीन तमिल संगम काव्य में गर्दभ को वीरों और राजाओं से जोड़ा गया है। संभवत उस समय उसका दर्जा ऊंचा रहा हो।
हालांकि तमिल संगम काव्य कच्छ के रण से 1500 मील दूर और हड़प्पा सभ्यता के 1500 वर्ष बाद रचा गया, फिर भी इस शब्द में कच्छ के रण की स्मृति निहित हो सकती है। तो क्या लगभग 3000 वर्ष पहले द्रविड़ भाषी गुजरात से तमिलनाडु की ओर स्थानांतरित हुए थे? गर्दभों और लवण-पटल को वफढष्ण की कथाओं में भी जोड़ा गया। बलराम ने जंगली गर्दभ रूपी धेनुकासुर सहित अन्य गर्दभों से युद्ध किया। उन्होंने खारे पानी में उगे ताड़ के पेड़ों को गर्दभों से मुक्त कर उन्हें बगीचे में परिवर्तित कर दिया।
वसुदेव और कृष्ण जन्म से जुड़ा रोचक प्रसंग
कच्छ से सटे सौराष्ट्र के समुद्रतट पर कृष्ण की नगरी द्वारका स्थित है। जब वसुदेव और बलदेव सहित कुछ पहलवान भाई पूरे भारत को जीतने निकले, तो उन्होंने पाया कि एक गर्दभ द्वारका की रक्षा कर रहा है। जब भी वह हींकता तो नगर अपने स्थान से उड़कर कहीं और चला जाता। भाइयों के निवेदन पर गर्दभ कुछ समय बाद हींकने के लिए तैयार हुआ। उसी अंतराल में भाइयों ने हल की सहायता से द्वारका को दबाकर उस पर विजय प्राप्त कर ली। कर्नाटक के 12वीं सदी के अमृतेश्वर मंदिर में (कृष्ण का जन्म अंकित है) उनके पिता वसुदेव को गर्दभ के सामने झुकते हुए दर्शाया गया है।
कहा जाता है कि जब भी देवकी संतान को जन्म देती थी तो यह गर्दभ हींकता था, जिससे कंस को सूचना मिल जाती थी। वह देवकी के कक्ष में पहुंचकर शिशु की हत्या कर देता। वसुदेव ने अपनी आठवीं संतान को गोकुल ले जाने का निश्चय किया। जन्म के बाद संतान को गोकुल ले जाते समय उन्होंने गर्दभ से आग्रह किया कि उनके लौटने तक वह न हींके। गर्दभ मान गया और वसुदेव कृष्ण को गोकुल ले जाने में सफल रहे। यद्यपि यह कथा परंपरागत कहानियों में नहीं मिलती, लेकिन अमृतेश्वर मंदिर में इसका विस्तृत चित्रण मौजूद है। 18वीं सदी की पहाड़ी लघुचित्रकला में रावण को सामान्यत एक अतिरिक्त, ग्यारहवें गर्दभ सिर के साथ दर्शाया गया है। दूसरी ओर हनुमान को एक अश्व सिर सहित कुल पांच सिरों के साथ चित्रित किया जाता है।
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