शाम की ख़्वाहिशें (कविता)

शाम की ख़्वाहिशों को, कभी तो चैन आये,
भटकते मुसाफ़िर को, दहलीज कोई बुलाये।
बातों की ज़िद हो ऐसी, कि ख़ामोशी भी मुस्कुराये,
हवाएँ भीगे दुपट्टे को, परों पर अपनी उड़ाये।
नज़दीकियों की कशिश में, दूरियां ख़ुद को ही मिटाये,
खोयी चाहतों की संदूक से, एक सपना कभी चुराये।
इंतज़ार के लम्हात ना हो, यूँ क़दमों की आहटें छाये,
जो छूट गई वो आदतें, कभी मिलकर हमें रुलाये।
पत्थर हुई नज़रों को, कभी नज़ारे तो आ सहलाये,
मोहब्बत अलविदा कहकर, मासूमियत की उम्र लौटाए।
घर लौटते परिंदे कभी तो, वो क्षितिज हमें दिखाए,
जहां जगमगाते सितारों को, कोई दुआ ना तोड़ पाए।
धड़कनों में उठती बेचैनियां, आँखों को ना सताये,
हकीकत के आसमां तले, कभी तो मुलाकाते हमें भरमाये।
ये धुंधली लकीरें कभी तो, एक शाम ऐसी सजाये,
सुकूं भरे लम्हों में, सरकती यादों की ना हो पाये।

-मनीषा मंजरी

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