अंतर्मन से पदार्थ की आसक्ति हटाना त्याग : सुमंगलप्रभाजी
हैदराबाद, बाहर से वस्तु को छोड़ देना त्याग नहीं है। अंतर्मन से पदार्थ की आसक्ति को हटा देना त्याग है। उक्त उद्गार सिकंदराबाद स्थित श्री आनंद भवन में आयोजित प्रवचन सभा में साध्वी सुमंगलप्रभाजी म.सा. ने व्यक्त किये। महामंत्री गौतमचंद मुथा द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, साध्वी रत्ना डॉ. सुमंगलप्रभाजी म.सा., डॉ. सुवृद्धिजी म.सा., रजतप्रभाजी म.सा., प्रांजलश्रीजी म.सा., वंदनाश्रीजी म.सा. आदि ठाणा-5 श्री जैन श्रावक संघ, कोरा के श्री आनन्द भवन में सुखसाता पूर्वक विराजित हैं।
भवन में आयोजित प्रवचन सभा में डॉ. सुमंगलप्रभाजी म.सा. ने कहा कि संसार के दो तट हैं भोग और योग, राग और द्वेष। त्याग का तट शांत होता है और हमें शांति देता है। मगर हमें भोग का तट ही पसंद है। उस तट पर रहकर हम शांति चाहते हैं, लेकिन वह कैसे मिलेगी। म.सा. ने कहा कि हमारा त्याग कौनसा है, बाहरी है या अंतरंग है। श्रवण मनन आचरण की चर्चा करते हुए म.सा. ने कहा कि प्रभु महावीर की जिनवाणी को अच्छे श्रोता बनकर श्रवण करें।
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श्रवण किया था रोहिणेय चोर ने, जिसका जीवन बदल गया। नंदी सूत्र की चर्चा करते हुए म.सा. ने बताया कि 14 प्रकार के श्रोता होते हैं, जिसका आगम में वर्णन आया है। साध्वी डॉ. सुवृद्धिश्रीजी ने थावच्चा पुत्र का उदाहरण देकर भाव प्रकट किया। रजतप्रभाजी ने श्रवण के महत्व पर प्रकाश डाला । मंच संचालन करते हुए महामंत्री गौतमचंद मुथा ने सभी का स्वागत किया। उन्होंने मंगलवार, 20 मई को होने वाले प्रवचन में अधिक से अधिक श्रावकों से भाग लेने की अपील की। अवसर पर संघपति संपतराज कोठारी, चेयरमेन मंगलचंद कटारिया, अध्यक्ष संजय कटारिया, कार्याध्यक्ष सूर्य प्रकाश नाबरिया, मोहन लाल देशरला, डूंगरमल कोठारी, गौतम बेताला, अशोक तातेड़ एवं अन्य उपस्थित थे।
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