रिश्ते (कविता)

काश! छोड़ सकते
हर दर्द के ज़िम्मेदार को
हर सज़ा देते इस दर्द
के हकदार को
पर मजबूर थे ये कदम
उठा न सके

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कहीं न कहीं अटूट रिश्ते
जो उनसे जुड़े थे
कुरुक्षेत्र के मैदान में
मेरे भाई ही हथियार लिए
खड़े थे।

-राजेंद्र कुमार शर्मा

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