रिश्ते (कविता)
काश! छोड़ सकते
हर दर्द के ज़िम्मेदार को
हर सज़ा देते इस दर्द
के हकदार को
पर मजबूर थे ये कदम
उठा न सके
यह भी पढ़े: शाम की ख़्वाहिशें (कविता)
कहीं न कहीं अटूट रिश्ते
जो उनसे जुड़े थे
कुरुक्षेत्र के मैदान में
मेरे भाई ही हथियार लिए
खड़े थे।

अब आपके लिए डेली हिंदी मिलाप द्वारा हर दिन ताज़ा समाचार और सूचनाओं की जानकारी के लिए हमारे सोशल मीडिया हैंडल की सेवाएं प्रस्तुत हैं। हमें फॉलो करने के लिए लिए Facebook , Instagram और Twitter पर क्लिक करें।



