जीवन का लक्ष्य हो आत्मकल्याण : रमेशजी

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हैदराबाद, संसार में कर्तव्य और जिम्मेदारियाँ पूरा करना ही केवल जीवन का उद्देश्य नहीं होना चाहिए। इनका निर्वाह करते हुए आत्मकल्याण करना भी लक्ष्य हो। उक्त उद्गार नामपल्ली स्थित होटल क्वालिटी इन रेजिडेंसी में आज आयोजित सत्संग में रमेशजी ने व्यक्त किए। रमेशजी ने कहा कि वाल्मिकी के जैसा और कोई उदाहरण नहीं है, जिसके जीवन में अभूतपूर्व बदलाव आया। डाकू से ऋषि बनने की यात्रा वाले उनके जीवन से संदेश मिलता है कि हम भी संत बन सकते हैं।

अगर हमारे पास फ्रीविल की ताकत है, तो हम भी नए व्यक्तित्व को धारण कर भ्रम से हटकर ब्रह्म में स्थित हो सकते हैं। हमारे पिछले कर्म हमें रोक नहीं सकते। फ्रीविल के बल पर हम पिछले कर्मों से छुटकारा पाकर उन्नत स्थिति को प्राप्त कर सकते हैं। रमेशजी ने कहा कि आध्यात्मिक यात्रा अकेले करने के साथ हमें अपने अंदर के ब्रह्म या ऋषि को स्वयं ही जगाना होता है। हम संसार में भले ही कितने भी बड़े क्यों न हो जाएँ और परिवार के लिए कितना भी क्यों न कर द।

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करुणा, फ्रीविल और आत्मकल्याण से जीवन उन्नति

परंतु अपनी प्रगति तथा कल्याण खुद को ही करना होगा। ईश्वर, पितृ आदि से लेकर कोई भी सासांरिक संबंध साथ नहीं देंगे। जिस दिन हम इस बात को समझ लेंगे, उसी दिन कल्याण के मार्ग पर अग्रसर हो जाएँगे। हम सारा जीवन भ्रम में ही जीते रहते हैं। जितना जल्दी हो सके अपना कल्याण करने का प्रयास करें। अपना कल्याण न करने से बड़ी बदनसीबी कोई नहीं होती।
रमेशजी ने कहा कि ईश्वर तथा सामाजिक संबंधों में हमें शरीर का संचालन करने वाले सभी अंगों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करनी चाहिए। करुणा में बहुत शक्ति होती है।

करुणा निस्वार्थ तथा अपेक्षाओं से मुक्त होती है। करुणा में किसी जीव के लिए प्रेम तथा इसके लिए कुछ करने की भावना होती है। इसीलिए जिस व्यक्ति में करुणा कूट-कूटकर भरी होती है, उसको सभी देवी-देवता आशीर्वाद प्रदान करते हैं। हमें भी जीवन में करुणा के गुण को आत्मसात करना चाहिए। अपनी भावना को शक्तिशाली बनाकर हम अपने साथ दूसरों के भी स्थूल से सूक्ष्म चेतना, प्रेम, करुणा, मुक्ति, मोह, आत्मानंद आदि को निकाल सकते हैं।

हमारी सर्वव्यापक शुद्ध भावना बहुत शक्तिशाली होती है, इसे सही दिशा में सदैव जाग्रत रखना चाहिए। गुरु माँ ने कहा कि हमारी फ्रीविल हमारा ही भाग्य बनाती है। इसलिए हमें इसका उपयोग सकाकात्मकता और गुरुज्ञान को आत्मसात करते हुए करना चाहिए। जब हमारे ऊपर ज्ञान रूपी प्रकाश पड़ता है, तभी हम भ्रम से ब्रह्म की यात्रा की ओर अग्रसर होते हैं।

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