कोरे काग़ज़ पे हस्ताक्षर (कविता)

कोरे काग़ज़ पे हस्ताक्षर,
मौत का फ़रमान न बन जाए,
कोरे काग़ज़ पे हस्ताक्षर
ज़िंदगी की शाम न बन जाए।।

स्वार्थी, मतलबी दुनिया स्वार्थवश,
ख़ुद के लिए लिखवाना चाहे।
कोरे काग़ज़ पे हस्ताक्षर करवा,
विश्वास गला घोट, मूर्ख बना जाए।।

दशरथ ने कैकयी को दिया,
वर स्वरूप कोरा काग़ज़।
परिणाम स्वरूप चौदह वर्ष का,
वनवास श्रीराम पाये।।

ज़िंदगी एक पहेली बन जाए,
कोरे काग़ज़ जो हस्ताक्षर करवाए।
निर्णय नहीं स्वयं के पर,
हस्ताक्षर कर ज़िंदगी भर पछताए।

-गीता अग्रवाल

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