कुश एकत्रित करने की तिथि है कुशी अमावस्या

तिथि व्रत
सनातन धर्म में कुश का बेहद खास महत्व होता है। कहा जाता है कि बिना कुश के कोई भी पूजा पूर्ण नहीं होती है। इसलिए जब भी यज्ञ, पूजा-पाठ करने बैठते हैं तो कुश जरूर पहननी चाहिए। कई बार लोग इसे झाड़ी या घास समझ कर छोड़ देते हैं। शास्त्रां में कुश को तोड़ने के लिए एक विशेष दिन निश्चित किया गया है और वह है- भाद्रपद माह की अमावस्या तिथि। इस अमावस्या तिथि को कुशोत्पादन या कुशी अमावस्या भी कहते हैं।
इस साल 23 अगस्त, शनिवार को भाद्रपद महीने की अमावस्या तिथि है, जो अत्यंत शुभ है। इस दिन कुश को तोड़ कर वर्ष भर के लिए एकत्रित कर लिया जाता है, जो यज्ञ, पूजा, पाठ, धार्मिक एवं तांत्रिक आदि कार्यों में इस्तेमाल की जाती है। इस तिथि पर शनिवार होने के कारण इसे शनि अमावस्या कहते हैं। यह तिथि और वार पितफ दोष से मुक्ति पाने के लिए सबसे उत्तम माना जाता है।
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मान्यताएँ
- कुश में ब्रह्मा, विष्णु और महेश का वास माना जाता है। मान्यता है कि कुश को ग्रहण काल में भोज्य-पदार्थों की शुद्धि बनाए रखने के लिये भी उपयोग किया जाता है।
- इस दिन नई कुश घर लाकर उसके अग्र भाग से अपने पितफ का नाम लेकर तिल और जल से तर्पण करें, तो पितफ बेहद प्रसन्न होते हैं।
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