देशभक्ति, चेतना और संकल्प जगाती है जलियांवाला बाग कांड की स्मृति

जलियांवाला बाग आज एक स्मारक है, लेकिन महज इस स्मारक के दर्शन करने से हमारे जैसे लोकतांत्रिक भारतीय लोगों का कर्तव्य पूरा नहीं होता, इस दिन और इस घटना को याद करने का जरूरी और महत्वपूर्ण तरीका यही है कि इसे याद करते हुए लगातार अपने लोकतंत्र को मजबूत बनाये रखने का हमारा संकल्प दृढ़ रहे।

तेरह अप्रैल 1919 को बैसाखी वाले दिन जब अमृतसर के जलियांवाला बाग पर इकट्ठे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों पर एक अंग्रेज अफसर के आदेश पर ब्रितानी फौज ने निहत्थे भारतीयों पर अंधाधुंध गोलियां बरसायी थीं, तो उससे समूचा स्वतंत्रता आंदोलन सिहर गया था। सोचिए जरा वह दृश्य कितना भयावह रहा होगा, जिसकी याद आने भर से आज भी लोग सिहर उठते हैं। इस कत्त्लेआम में न सिर्फ सैकड़ों लोग मारे गये थे बल्कि अंग्रेजों की क्रूरता का असली चेहरा भी उजागर हो गया था।

आज 107 साल बाद इस कांड को याद करने का मकसद सिर्फ स्वतंत्रता सेनानियों को श्रृद्धांजलि भर देना नहीं है बल्कि इस दिन को बार-बार याद करने का एक बड़ा मकसद हमें अपनी संवेदनशीलता, लोकतांत्रिक समझ और ऐतिहासिक जिम्मेदारी का सजग बोध बनाये रखना भी है। जलियांवाला बाग जैसे कांड को एक घटनाभर मानकर भूल जाने का जोखिम नहीं ले सकते, क्योंकि हर सत्ता इस तरह के दमनकारी कांड करती रहती हैं।

हर साल 13 अप्रैल को शहीदों को दी जाती है श्रद्धांजलि

इसलिए लोकतांत्रिक सत्ताएं संवेदनशील बनी रहे, इसलिए भी हमें ऐसी घटनाओं को न सिर्फ बार-बार याद करते रहना चाहिए बल्कि ऐसी घटनाओं से लोकतत्र को जीवंत बनाये रखने के लिए जरूरी सबक भी लेते रहना चाहिए क्योंकि जब सत्ताएं निरंकुश हो जाती हैं, तो वे जनता की आवाज दबाती हैं और इतिहास में तब ऐसे शापित अध्याय लिखे जाते हैं। जलियांवाला बाग की याद में हर साल 13 अप्रैल को अमृतसर के जलियांवाला बाग में जो राष्ट्रीय कार्पाम होता है, उसमें शहीद हुए स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को तो श्रृद्धांजलि दी ही जाती है, साथ ही साथ लोकतंत्र को जीवंत बनाये रखने के लिए हमेशा सत्ता के साथ आंख से आंख मिलाकर बात करने और उसकी मनमानी को बार-बार याद दिलाने के साहस का संकल्प भी लिया जाता है।

इसलिए हर साल जलियांवाला बाग कांड को याद करना, केवल देशभक्ति का मामला नहीं है बल्कि यह मानवता की पुर्नस्मृति और लोकतंत्र को मानवीय बनाये रहने के आग्रह का संकल्प भी है। क्योंकि निहत्थे लोगों पर गोली चलाना किसी भी सभ्यता की सबसे बड़ी हार है। 13 अप्रैल 1919 को, जिस दिन बैसाखी थी, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सेनानी अंग्रेजों द्वारा लगाये गये रॉलेट एक्ट के विरूद्ध अमृतसर के जलियांवाला बाग में इकट्ठा हुए थे। उस समय पूरे देश में इस एक्ट का विरोध हो रहा था, इसी विरोध के सिलसिले में अमृतसर में भी बैसाखी वाले दिन लोग जलियांवाला बाग में इकट्ठा हुए थे।

हजारों लोगों की मौत ने आजादी की लड़ाई को बना दिया निर्णायक

तभी ब्रिटिश अधिकारी जनरल रेगिनॉल्ड डायर अपनी सेना के साथ वहां पहुंचा और इकट्ठा लोगों को तितर-बितर होने की बिना कोई चेतावनी दिये ही उन पर अंधाधुंध गोलियां बरसाने का आदेश दे दिया। सबसे बड़ी त्रासदी यह थी कि यह बाग चारों ओर से ऊंची-ऊंची दीवारों से घिरा था और इससे निकलने का जो एकमात्र दरवाजा था, वहां अंग्रेज फौज पोजिशन लेकर निहत्थे लोगों पर गोलियां बरसा रही थी। ऐसे में लोग जान बचाने के लिए भागते तो कहां? इसी बाग के अंदर एक कुआं था, लोग डर और दहशत से उसी कुएं में कूदने लगे और दर्जनों फिट गहरा कुआं कुछ ही देर में लाशों से पट गया।

भारतीय नेताओं और तत्कालीन भारतीय प्रेस का अनुमान था कि 1000 से भी ज्यादा लोग इस कांड में मारे गये थे, लेकिन ब्रिटिश सरकार ने मरने वाले लोगों की संख्या कुल 379 मानी थी और 1200 लोगों को घायल बताया था। मगर सच्चाई यही है कि असली संख्या मरने वालों की और घायलों की भी किसी को नहीं पता। इस वीभत्स हत्याकांड का आजादी के आंदोलन में यह असर पड़ा कि लड़ाई अचानक बहुत बड़ी और निर्णायक हो गई। महात्मा गांधी ने इसी घटना के बाद 1920 का असहयोग आंदोलन शुरु किया और पहली बार पूरा देश इस आंदोलन के तहत अंग्रेजों के विरूद्ध उठ खड़ा हुआ।

ब्रितानी क्रूरता के खिलाफ देशभर में उठा जनाक्रोश

इस कांड की सिर्फ देश में ही नहीं पूरी दुनिया में निंदा हुई। रवींद्रनाथ टैगोर ने इसके विरोध में अपनी नाइटहुड की उपाधि लौटा दी। इस आंदोलन के बाद युवाओं में इतना गुस्सा बढ़ा कि हजारों युवा क्रांतिकारी रास्ते पर चल निकले। इसी घटना ने भगत सिंह जैसे युवा क्रांतिकारी को प्रभावित किया। क्योंकि जलियांवाला बाग सिर्फ एक हत्याकांड नहीं था, यह भारत की आत्मा को झकझोर देने वाला ब्रितानी सत्ता का क्रूर कृत्य था।

आज भी इस घटना को हर साल याद किया जाता है, तो इसलिए क्योंकि नई पीढ़ी आजादी की कीमत समझ सके। वह महसूस कर सके कि उनके पुरखों ने कितनी यातनाएं सहकर उनके लिए आजादी पायी थी। जलियांवाला बाग कांड जैसी तारीखें सिर्फ इतिहास की विशेष तारीख भर नहीं है बल्कि यह इतिहास को वर्तमान की नजरों से देखने को मजबूर करती याद है।

-संध्या सिंह

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