पूर्णिमा से भी अधिक उजली व उजाली अमावस्या
जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर का निर्वाण पाम पूर्व 470 में कार्तिक अमावस्या की अर्धरात्रि में साढ़े बहत्तर वर्ष की आयु में पावापुरी में हुआ था। उस दिन भगवान महावीर के दो उपवास थे। राजा हस्तीपाल की रज्जुक सभा में निर्मित समवसरण में लगातार दो दिन से भगवान की देशना प्रवाहित हो रही थी। भगवान उत्तराध्ययन सूत्र के 36 अध्ययन पूरे कर चुके थे। 37वाँ मरुदेवी अध्ययन चल रहा था। उस समय चतुर्विध संघ उपस्थित था।
काशी-कौशल के नौ मल्लवी और नौ लिच्छवी गणराजाओं के अलावा राजा नंदीवर्धन सहित अनेक नरेश पौषध व्रत लेकर भगवान की देशना सुन रहे थे। अगणित देव-देवियाँ और पशु-पक्षी भी तीर्थंकर महावीर की दिव्य वाणी का अमृतपान कर रहे थे। स्वाति नक्षत्र के योग में भगवान शुक्ल ध्यान के बल से चारों अघाती कर्म खपाकर सिद्ध, बुद्ध, मुक्त हो गए। तीर्थंकर महावीर के अत्यंत तेजस्वी आभामंडल और ज्ञानालोक से संपूर्ण लोक प्रकाशमान था। उनके निर्वाण के समय सर्वत्र अंधकार छा गया।
भगवान महावीर निर्वाण की स्मृति में जले दीप
ऐसी स्थिति में उस समय वहाँ उपस्थित नौ मल्लवी और नौ लिच्छवी (इन अठारह गणराजाओं) ने निर्णय लिया और सार्वजनिक घोषणा की- गओ भावुज्जोओ, दव्वुज्जोयं करिस्सामो। अर्थात भाव उद्योत, ज्ञान का उजाला विलुप्त होने के कारण उसकी पावन स्मृति को शाश्वत बनाने के लिए हम प्रतिवर्ष आज के दिन द्रव्योद्योत करेंगे, दीपक से रोशनी करेंगे।
भगवान के निर्वाण पर एकाएक देवताओं का गमनागमन बढ़ जाने से पूरा भूमंडल आलोकित हो गया था। उस समय अंधकार मिटाने के लिए मानवों ने दीप जलाए। ग्राम-ग्राम, नगर-नगर और घर-घर में द्रव्य-प्रकाश किया गया। अमावस की वह निशा पुन प्रकाशमय हो गई। उसी दिन से भगवान महावीर निर्वाण-कल्याणक के उपलक्ष्य में प्रतिवर्ष दीपावली का पर्व मनाया जाता है।
इस संबंध में बहुश्रुत जयमुनि कहते हैं- इतिहास साक्षी है कि भगवान महावीर के निर्वाण के बाद भारतवर्ष में दीपावली का त्यौहार प्रारंभ हो गया। इस त्यौहार की लोकप्रियता, सर्वजनग्राह्यता के कारण बाद में संसार के सभी धर्मों ने अपने-अपने पूज्य पुरुषों का नाम भी दीपावली से जोड़ दिया। ऐतिहासिक तथ्य यह है कि कार्तिक अमावस्या को प्रकाश प्रकट करने का प्राचीनतम उल्लेख कल्पसूत्र के अलावा कहीं नहीं है।
गौतम स्वामी को केवलज्ञान
भगवान ने अपना निर्वाण-समय सन्निकट जान प्रथम गणधर इन्द्रभूति गौतम को निकटवर्ती ग्राम में जाकर एक व्यक्ति को प्रतिबोधित करने के लिए कहा। जिस समय सारी जनता भगवान के दर्शन, वंदन और देशना-श्रवण के लिए उनके समवसरण में आ रही थी। गौतम स्वामी भगवान की आज्ञा पाकर बिना किंतु-परंतु किये प्रस्थान कर गए। अर्धरात्रि के पश्चात् उन्हें भगवान के मोक्षगमन का समाचार मिला तो वो बच्चे की तरह फूट-फूट कर रोने लगे।
भगवान के प्रति सूक्ष्म-स्नेह का बंधन भी टूट गया। भोर होने से पहले ही उन्होंने केवलज्ञान का अक्षय आलोक पा लिया और गौतम स्वामी भक्त से भगवान बन गये। यही कारण है कि आज भी अनगिनत साधक दीपावली की रात्रि में भगवान महावीर की उपासना के साथ ही गौतम स्वामी का स्मरण भी करते हैं। अनेक श्रद्धालु दीपावली को उपवास, बेला, तेला और विविध जप-तप करते हैं।
अंतिम संस्कार
कार्तिक शुक्ल पक्षीय प्रतिपदा को भगवान की पार्थिव देह का अग्नि-संस्कार किया गया। इस समय नौ मल्लवी, नौ लिच्छवी तथा अन्य अनेक देशों के राजा, प्रजा, भगवान महावीर के ज्येष्ठ भ्राता राजा नंदीवर्धन एवं उनके परिजन सहित अनगिनत मनुष्य, देवता और पशु-पक्षी थे। सुर और असुरों के सभी इन्द्र अपने-अपने परिवारों के साथ वहां पहुंचे थे। देवताओं ने अन्तिम संस्कार के लिए गोशीर्ष चन्दन की चिता का निर्माण किया।
सभी वीरप्रभु के स्मरण और ध्यान में लीन हो उस विरल क्षण के साक्षी बन रहे थे। तभी अग्निकुमार देवों ने अग्नि प्रज्वलित की और वायुकुमार देवों ने सुगंधित हवाएँ संचारित कीं। अनेक दुर्लभतम सुगंधित पदार्थों के साथ प्रभु के चरम शरीर की दाह-क्रिया संपन्न हुई। तत्पश्चात् मेघकुमार देव ने जलवृष्टि करके चिता शांत की।

मनुष्य और देवता चिता-स्थल से पवित्र राख़ और अस्थियाँ ले गये। जब कुछ नहीं बचा तो भक्त वहाँ की मिट्टी खोद कर ले जाने लगे, जिससे वहाँ बहुत बड़ा खड्डा हो गया, जो बाद में सरोवर में परिवर्तित हो गया। वर्तमान में उसी जलाशय में देव विमान के आकार का जलमंदिर बनाया गया। बिहार के नालन्दा जिले में स्थित इस पावन निर्वाण भूमि पर प्रतिवर्ष दीपावली पर हजारों श्रद्धालु पहुँचते हैं और वहाँ अपने परम आराध्य भगवान महावीर की उपासना करते हैं।
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