यह चुनाव बड़े सबक से कम नहीं

पाँच राज्यों के चुनावी नतीजे किसी बड़े सबक से कम नहीं हैं। जनता बेवजह किसी दल को सत्ता से अपदस्थ नहीं करती। अगर करती है तो उसके पीछे सबसे बड़ा कारण यह होता है कि वह धीरे-धीरे जनमानस से दूर हो गई है। जनता के दिलों में राज करने वाली पार्टी लंबे समय तक सत्ता पर काबिज रहती है, लेकिन जैसे ही वह अराजक, भ्रष्ट, जनता परिवर्तन का मन बना लेती है। पश्चिम बंगाल में यही हुआ। तीन बार वहां राज करने वाली तृणमूल कांग्रेस का इस बार समूल नाश हो गया।

इससे बुरी बात और क्या हो सकती है? मुख्यमंत्री रहते ममता बनर्जी बुरी तरह पराजित हुई। पंद्रह सालों के शासनकाल में टीएमसी से जुड़े अनेक लोगों का अराजक व्यवहार पश्चिम बंगाल के लोगों को रास नहीं आया। अनेक कार्यकर्ताओं की गुंडागर्दी खुलकर सामने आया करती थी। ममता बनर्जी जिस तरह से एक वर्ग विशेष को निरंतर तवज्जो दे रही थी, उसे देखते हुए, एक बहुत बड़ा वर्ग उनसे नाराज भी था।

पश्चिम बंगाल में हालत यह थी कि हिंदुओं को दुर्गा पूजा और काली पूजा करने के लिए हाईकोर्ट की शरण लेनी पड़ी थी। एक तरफ तीस प्रतिशत मतदाता थे, दूसरी तरफ सत्तर प्रतिशत मतदाता। वे निरंतर अन्याय के शिकार हो रहे थे। यही कारण रहा कि इस बार भारतीय जनता पार्टी ने ध्रुवीकरण की कोशिश की और बहुसंख्यक हिंदू मतदाताओं की सुप्त चेतना को जाग्रत करने में सफलता हासिल कर ली और परिणाम सामने है।

संतुलित व्यवहार ज़रूरी

लोकतंत्र में संतुलित, निष्पक्ष और ईमानदार व्यवहार किसी दल को लंबे समय तक टिकाए रख सकता है। असम में भारतीय जनता पार्टी तीसरी बार सत्ता में आई। इसके पीछे वर्तमान मुख्यमंत्री हिमंत विस्वसरमा का व्यवहार है, जो नेता जनता से अधिक से अधिक जुड़ेगा, वह लोकप्रिय रहेगा। वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुजरात में मुख्यमंत्री रहते हुए जनता से निरंतर कनेक्ट रहे। इसलिए हर बार वहां भाजपा विजयी होती रही।

प्रधानमंत्री बनने के बाद भी नरेंद्र मोदी जनता के साथ निरंतर जुड़े रहे। उनका पश्चिम बंगाल में चुनाव के दौरान एक विवाह समारोह में अचानक पहुंचना, झालग्राम में अचानक झलमुरी खाना आदि उनकी चुनावी रणनीति का हिस्सा था। जनता को यह सब अच्छा लगा। मोदी से विपक्षी चिढ़ते रहते है, लेकिन यही राजनीति का सफल गुण है, जो मोदी से सीखना चाहिए। इसके लिए वैसा आत्मबल भी तो चाहिए। मोदी जनता में काफी लोकप्रिय हैं। इसलिए उनकी बातों को लोग ध्यान से सुनते हैं।

प्रधानमंत्री अपने कार्यकर्ताओं के बीच भाषण देने आए, तो वह बंगाली शैली का धोती-कुर्ता पहन कर आए थे। मोदी तमिलनाडु में भाषण देने गए थे, उनका हुलिया तमिल व्यक्ति जैसा था। परिवेश के हिसाब से आदमी कपड़े भी पहनता है।

लेकिन हर जगह जादू नहीं चलता

बेशक मोदी लोकप्रिय हैं, लेकिन यह बात भी है कि हर जगह उनका जादू नहीं चलता। अगर ऐसा होता तो तमिलनाडु में भी कुछ जादू चलता, केरल में चल जाता, लेकिन वहां नहीं चला। हर जगह, हर घड़ी कोई व्यक्ति सफल नहीं हो पाता। मोदी या भाजपा के हिस्से में जितनी सफलताएं मिली हैं, उतनी एक पार्टी की वैश्विक प्रतिष्ठा के लिए पर्याप्त है। वामपंथियों को अब आत्म-मंथन करना चाहिए कि इस देश में उन्हें स्वीकारोक्ति क्यों नहीं मिल पा रही है?

क्यों धीरे-धीरे वे हाशिये पर चले गए? केरल में देश की इकलौती वामपंथी सरकार थी, वह भी खत्म! इस चुनाव में लोकतांत्रिक मोरचा की विजय हुई। मुख्यमंत्री विजयन तो जीत गए, लेकिन उनके अनेक मंत्री हार गए। तमिलनाडु में स्टालिन सरकार का पतन हुआ, क्योंकि पिछले अनेक वर्षों से उनके और उनके साथियों के भ्रष्टाचार के किस्से लोकव्यापी हो चुके थे। जनता उनसे ऊब चुकी थी और मौके की तलाश में थी। तभी तमिलनाडु के लोकप्रिय हीरो विजय चंद्रशेखर का उदय होता है और दो साल पहले गठित टीवीके (तमिलगा वेत्री कषगम ) द्रमुक और अन्नाद्रमुक का खेल खत्म कर देती है।

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बहुमत न मिलने पर गठबंधन की मजबूरी

हालांकि उन्हें पूरा बहुमत नहीं मिला है, जिस कारण 11 सीटों के लिए गठबंधन करना पड़ेगा। जनता साफ-सुथरी छवि वाले नेताओं को पसंद करती है। उस दल को पसंद करती है, जो विकास की राह पर चलता है। छत्तीसगढ़ में भी पिछली बार कांग्रेस का पतन इसलिए हुआ, क्योंकि उनके राज में नेता-अफसर भ्रष्टाचार में लिप्त हो गए थे। इसलिए इस बार हुए पांच राज्यों के चुनाव को एक सबक के रूप में देखता हूँ। अच्छा काम करेंगे तो निरंतर बने रहेंगे।

अगर अराजक हो जाएंगे, तो पतन सुनिश्चित है। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने जिस निर्ममता के साथ एक तरफा राज चलाया, उसी का दुष्परिणाम यह हुआ कि बहुसंख्यक समाज कुपित हो गया। विपक्षी दल चुनाव आयोग को कोसते रह गए, लेकिन चुनाव आयोग ईमानदारी के साथ अपना काम करता रहा। गनीमत है कि इस बार ईवीएम पर ठीकरा नहीं फूटा, फोड़ा गया चुनाव आयोग पर।

बदला नहीं बदलाव की बात करें

जनता की नजर बड़ी पैनी होती है। उसकी नजर को देखना हो तो 4 मई को आए पांच राज्यों के चुनाव परिणामों को देखा जा सकता है। सबक यही है कि जो दल चुनकर आए हैं, अब इस बात को गांठ बांध लें कि जनता भ्रष्टाचार बर्दाश्त नहीं करेगी, उसे राजनेताओं का विनम्र व्यवहार भी चाहिए, पक्षपात की नीति नहीं चलेगी, केवल विकास की नीति चाहिए। प्रधानमंत्री मोदी ने दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं के बीच जो उद्बोधन दिया, वह बेहद महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल में चुनाव जीतने के बाद हमें बदले की भावना से काम नहीं करना है। हमें बदला नहीं, बदलाव चाहिए।

-गिरीश पंकज
-गिरीश पंकज

भय नहीं, हम भविष्य की बात करें। अगर इस चिंतन को आत्मसात करके भारतीय जनता पार्टी पश्चिम बंगाल में केवल निष्पक्ष विकास का काम करेगी और सबको साथ लेकर चलेगी तो लंबे समय तक वहां टिक सकेगी। सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास ही लोकतंत्र का सही नारा है। भारतीय जनता पार्टी जहां-जहां भी लंबे समय तक टिकी है, उसके पीछे सिर्फ हिंदुत्व का एजेंडा नहीं रहा। उसके पीछे उनकी विकास की नीति भी काम करती रही।

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