अमरता की खोज में दो राष्ट्राध्यक्ष
पिछले दिनों दुनिया के दो बड़े तानाशाह – चीन के शी जिनपिंग और रूस के व्लादिमीर पुतिन – बीजिंग में मिले। उन्होंने क्या बात की? युद्ध की? रणनीति की? व्यापार की? नहीं साहब, अमर होने की संभावना की! हॉट माइक ने पकड़ ली उनकी गुप्त गुफ़्तगू और दुनिया ने जान लिया, वे ऑर्गन ट्रांसप्लांट से लेकर 150 साल जीने तक की कल्पना कर रहे थे।
कहते हैं, तानाशाहों की जान बड़ी कीमती होती है। आम आदमी तो जन्मता है, जीता है, मरता है – जैसे कोई सरकारी फाइल खुलती है, घूमती है और आखिर में धूल चाटती है। लेकिन ये महानुभाव? इन्हें तो अमर होना है! शी जी और पुतिन साहब की बातचीत सुनकर याद आए चीन के पहले सम्राट किन शी हुआंग। वे अमरता की दवा ढूँढ़ते-ढूँढ़ते पारा पीकर मर गए थे। उन्होंने दीवार बनवाई, सेना दफनाई, लेकिन मौत से बच नहीं सके।
अमरता की चाह और सत्ता के मिथक
आज शी जिनपिंग उसी परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं -ट्रांसप्लांट से अमरत्व! मानो कह रहे हों- भाई पुतिन, तुम्हारी तरह हम भी सत्ता की कुर्सी पर चिपके रहेंगे, मौत आए तो आए, हम तो ऑर्गन बदल लेंगे और पुतिन मुस्कुराते हुए जवाब दे रहे हों- हाँ शी, रूस में तो हम पहले से ही अमर हैं -चुनाव जीतते जाते हैं, विपक्ष गायब होता जाता है।
कोई पूछे, यह अमरता की कामना क्यों? क्योंकि सत्ता की लालसा अनंत होती है, जैसे गाँव के पटवारी की रिश्वत की भूख, जो कभी खत्म नहीं होती। मिथकों में देखिए, भारत का रावण अमर होना चाहता था, ब्रह्मा से वरदान माँगकर। लेकिन क्या हुआ? राम ने नाभि का अमृत ही सुखा डाला। हिरण्यकश्यपु ने तो चकमा देकर ऐसा वरदान पा लिया कि मरना असंभव हो जाए। लेकिन नहीं, नृसिंह अवतार ने उसका भी अंत कर दिया।
रूसी लोककथा में जादूगर कोशी अमर होने के भ्रम में रहता है, लेकिन उसकी मौत एक सुई में छिपी होती है। पुतिन साहब शायद सोचते होंगे, उनकी मौत किसी यूक्रेन के हमले में नहीं, बल्कि किसी पुराने साथी की विश्वासघाती मुस्कान में छिपी है। और शी जी? चीन की कम्युनिस्ट पार्टी में अमरता तो पहले से ही है-माओ से लेकर अब तक, चेहरे बदलते हैं, लेकिन सत्ता का राग वही।
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तानाशाहों की अमरता की तलाश और भय
माना कि इन कहानियों का सार यही है कि या तो अमरता है नहीं और अगर है तो वरदान नहीं, अभिशाप है। फिर भी सोचने में क्या हर्ज़ है कि 150 साल के होकर भी शी जिनपिंग ताइवान पर दावा ठोक रहे हैं और पुतिन नाटो को धमका रहे हैं। दोनों अपनी-अपनी अमरता खोज रहे हैं और उनके देशवासी कभी समाप्त न होने वाले युद्धों में मरते जा रहे हैं! आम आदमी की अमरता पर तो कोई बात नहीं हुई न! क्यों? क्योंकि तानाशाहों के लिए जनता तो बस वोट बैंक या श्रम शक्ति है – इस्तेमाल करो और फेंको।
हमारे यहाँ तो लोकतंत्र है, लेकिन अमर होने की कोशिश तो हमारे नेता भी करते ही रहते हैं। चुनाव दर चुनाव पार्टियाँ बदलकर। लेकिन यह भी जानते हैं कि मौत सबको ले जाती है। लेकिन ये विदेशी तानाशाह? इन्हें लगता है, विज्ञान से अमरत्व खरीद लेंगे। ट्रांसप्लांट! ऐतिहासिक संदर्भों में स्टालिन को याद कीजिए। सोवियत संघ में अमर राजा बनना चाहते थे। लेकिन दिल का दौरा पड़ गया। या माओ को लीजिए।
सांस्कृतिक क्रांति से अमरता ढूँढ़ी। लेकिन मौत ने उन्हें भी नहीं बख्शा। ये तानाशाह अमरता चाहते हैं क्योंकि डरते हैं – डरते हैं कि उनके जाने के बाद उनकी मूर्तियाँ गिरा दी जाएँगी, उनके नाम खुरच दिए जाएँगे। किस्सा कोताह यह कि तानाशाह बेहद अकेले और भयभीत होते हैं। अमरता की खोज में रहते हैं। प्रजा भले ही समय से पहले मरती रहे – युद्ध से, रोग से, भूख से। अमरता की दवा मिल भी गई तो क्या? सत्ता का नशा तो मौत से पहले ही मार देता है!
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