आख़िर आती कहाँ से है इतनी हिंसा बच्चों में?
अहमदाबाद के खोखरा में एक निजी स्कूल में हाल ही में घटी दिल दहलाने वाली घटना ने भारतीय समाज को गंभीर आत्ममंथन के लिए मजबूर किया है। आठवीं कक्षा के एक छात्र ने मामूली विवाद के बाद दसवीं कक्षा के अपने सहपाठी पर चाकू से जानलेवा हमला कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप उसकी मृत्यु हो गई। यह घटना केवल एक त्रासदी नहीं, बल्कि बच्चों में बढ़ती हिंसक प्रवृत्तियों का स्पष्ट संकेत है।
कहना शायद गलत न हो कि बच्चों में बढ़ रही हिंसा और आक्रामकता की जड़ में कहीं न कहीं पारिवारिक संरचना में आए बदलाव निहित हैं। आधुनिक भारतीय समाज – खासकर शहरी इलाकों – में परिवारों का आकार छोटा हो रहा है। माता-पिता की व्यस्त जीवनशैली के कारण बच्चों को पर्याप्त समय और मार्गदर्शन नहीं मिल पाता। सयानों की मानें तो, माता-पिता और बच्चों के बीच संवाद की कमी भावनात्मक कुंठा और आक्रामकता को बढ़ावा देती है। खोखरा की घटना में, भावनात्मक समर्थन की कमी ने संभवत छात्र की हिंसक प्रतिक्रिया को भड़काया।
सोशल मीडिया और परिवार का प्रभाव बच्चों पर हिंसा
यहाँ इस बात पर भी ध्यान देने की ज़रूरत है कि भारतीय स्कूलों में अकादमिक प्रदर्शन और प्रतिस्पर्धा पर अत्यधिक जोर बच्चों में मानसिक तनाव पैदा करता है। स्कूलों में नैतिक शिक्षा और भावनात्मक विकास पर ध्यान न देने से बच्चे अपनी भावनाओं को नियंत्रित करने में असमर्थ हो जाते हैं।
इस मामले में भी तो स्कूल के तनावपूर्ण माहौल और सहपाठियों के बीच छोटे-मोटे विवाद ने ही हिंसक रूप लिया न! समझना यह भी होगा कि इक्कीसवीं सदी का विलेन सोशल मीडिया जिस तरह चौबीसों घंटे हिंसक सामग्री परोस रहा है, उससे हिंसा एक कुसंस्कार की तरह बच्चों और किशोरों के मन की कोरी स्लेट पर अंकित होती चली जा रही है।
डिजिटल युग में बच्चों को हिंसक वीडियो गेम्स और सोशल मीडिया सामग्री तक खुली पहुँच मिल गई है न! अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन के अध्ययन बताते हैं कि हिंसक सामग्री बच्चों में आक्रामक व्यवहार को बढ़ावा देती है। खोखरा के मामले में, यह संभव है कि छात्रों ने ऑनलाइन देखी गई हिंसा से प्रेरणा ली हो।
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विद्यालय और परिवार से बच्चों में हिंसा रोकें
एक और बात। सामाजिक असहिष्णुता और ग्रुपबाजी भी बच्चों में हिंसक व्यवहार को बढ़ावा देती है। खोखरा की घटना में कुछ छात्रों द्वारा सहपाठियों को मांस खाने के लिए मजबूर करने की खबरें सामने आईं, जो सामाजिक दबाव और सांप्रदायिक तनाव को दर्शाती हैं। यह बच्चों में असहिष्णुता और हिंसा को बढ़ाने वाला एक अहम कारक है।
पूछा जा सकता है कि, इस प्रवृत्ति को और पनपने से रोकने का तरीका क्या है? तो, अब वक़्त आ गया लगता है कि स्कूलों में प्रशिक्षित काउंसलर और मनोवैज्ञानिक परामर्श सेवाओं को अनिवार्य किया जाए। बच्चों को अपनी भावनाओं को व्यक्त करने और तनाव प्रबंधन के लिए भी प्रशिक्षित करना होगा। बाल संरक्षण समितियों और शिकायत पेटियों का गठन हिंसा की रोकथाम में प्रभावी हो सकता है।
याद रहे कि परिवार बच्चों की प्रथम पाठशाला है। यों, माता-पिता को अपने बच्चों के साथ संवाद बढ़ाने और उनके भावनात्मक विकास पर ध्यान देने के लिए प्रोत्साहित करना होगा। सकारात्मक पेरेंटिंग तकनीकों पर कार्यशालाएँ आयोजित की जानी चाहिए। साथ ही, बेहद ज़रूरी है कि स्कूलों के पाठ्यक्रम में नैतिक शिक्षा, सहानुभूति और संघर्ष समाधान जैसे विषयों को शामिल किया जाए।
बच्चों का सुरक्षित और सकारात्मक विकास सुनिश्चित करें
शिक्षकों को भी बच्चों के साथ संवेदनशील व्यवहार के लिए प्रशिक्षित करना ज़रूरी है। बच्चों के खिलाफ शारीरिक-मानसिक दंड पर रोक का कड़ाई से पालन होना चाहिए। इसके अलावा, सोशल मीडिया और इंटरनेट के उपयोग पर नियंत्रण के लिए माता-पिता और स्कूलों को जागरूकता अभियान चलाने चाहिए। बच्चों को ऑनलाइन सामग्री के प्रभावों के बारे में शिक्षित करना चाहिए
अंतत, खोखरा जैसी तमाम घटनाएँ खुली चेतावनियाँ हैं कि हमें बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य और व्यवहार पर तत्काल ध्यान देना होगा। यह केवल स्कूलों या परिवारों की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज का दायित्व है। बच्चों में हिंसा और उनके मानसिक स्वास्थ्य के बीच गहरा संबंध है।
शिक्षा, परिवार और समाज के स्तर पर समन्वित प्रयासों से ही हम अपने बच्चों को हिंसा के रास्ते से हटाकर सकारात्मक और रचनात्मक भविष्य की ओर ले जा सकते हैं। आइए, हम मिलकर एक ऐसा समाज बनाएँ, जहाँ बच्चों का बचपन सपनों और खुशियों से भरा हो, न कि क्रोध और हिंसा से।
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