सदा दिव्य माँ की गोद का आनंद लें : सद्गुरु रमेशजी

हैदराबाद, जिस प्रकार गर्भस्थ शिशु को न कोई चिंता होती है, न ही व्याकुलता और वह सदा सुरक्षित रहता है, उसी प्रकार यदि हम माँ के गर्भ से आने के बाद स्वयं को दिव्यता के गर्भ में महसूस करें, तो आजीवन पूर्ण निश्चिंत व सुरक्षित रहेंगे।
उक्त उद्गार सद्गुरु रमेशजी ने अवर पैलेस में आयोजित साप्ताहिक सत्संग में व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि हमारी जैविक माँ की तरह ही एक परम माँ है, जिसे हम परमात्मा के नाम से जानते हैं और हम माँ के गर्भ से बाहर आने के बाद भी उस दिव्य माँ के गर्भ के भीतर रहते हैं, लेकिन अज्ञानता वश हम जिसके भीतर रहते हैं, पूरे जीवन भर उसको ही कर्मकांड, तीर्थ, उपवास, तपस्या, मंदिर, पूजा आदि करके पाने का प्रयास करते हैं। उन्होंने इसके वैज्ञानिक पक्ष का रहस्य प्रकट किया कि जिस प्रकार गर्भ में शिशु को साँस लेने के लिए कोई प्रयास नहीं करना पड़ता उसी प्रकार गर्भ से आने के बाद हमारी साँसे निरंतर चलती रहती हैं और हमारे सारे भीतरी अंग, ज्ञानेंद्रिय कर्मेंद्रिय आदि अपना काम स्वत: करते रहते हैं।
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समर्पण से मिलती है मानसिक शांति और स्वीकार्यता
किसी संत, गुरु या ज्ञानी की शरण में जब हम पूर्ण समर्पित हो जाते हैं और हमें यह ज्ञान हो जाता है कि हम कुछ नहीं कर रहे हैं, सब कुछ उस दिव्यता के द्वारा हो रहा है, जिसके भीतर हम स्थित हैं, तब हमें किसी से कोई शिकायत नहीं रहती हमारे मन में स्वीकार्यता बढ़ती जाती है। गुरुजी ने उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार पानी में रहते हुए मछली प्यासी रहती है, उसी प्रकार हम भी दिव्यता की गोद में रहते हुए भी उस दिव्य आनंद के अनुभव से वंचित रहते हैं,क्योंकि हम उसको कहीं बाहर ढूँढ़ते हैं।
अवसर पर गुरु माँ ने कहा कि ज्यादातर साधक परमात्मा का स्मरण करते हैं, लेकिन बहुत कम लोग उनको समर्पित होते हैं, जबकि समर्पण से ही हमारी नैया पार होगी। तन-मन-धन के समर्पण का आध्यात्मिक रहस्य उन्होंने प्रकट किया। सर्वव्यापी, सर्व शक्तिशाली व निरंतर रहने वाला दिव्यता का गर्भ हमें कितना सुकून तथा कितनी पूर्णता प्रदान करता है, इसकी अनुभूति गहरे ध्यान के द्वारा कराई गई। बड़ी संख्या में उपस्थित साधकों और यूट्यूब से जुड़े देश-विदेश के साधकों ने इस दिव्य सत्संग का लाभ उठाया।
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