स्वच्छ शहर का काला पानी : लापरवाही की हद
स्वच्छता की राजधानी के रूप में पहचाना जाने वाला शहर – इंदौर – आज प्रदूषित पानी के ज़हर से तड़प रहा है। दिसंबर 2025 के अंत में भागीरथपुरा क्षेत्र में जलापूर्ति पाइपलाइन में रिसाव से सीवेज मिश्रित हो गया। कम से कम 15 मौतें हो चुकी हैं। स्थानीय दावे 13 तक पहुंचते हैं। इनमें एक पांच माह का नन्हा शिशु भी शामिल है! 149 से अधिक लोग उल्टी, दस्त और डिहाइड्रेशन से जूझते हुए अस्पतालों में भर्ती हैं। कुल प्रभावितों की संख्या 1400 से ऊपर बताई जा रही है। क्या यह महज एक स्वास्थ्य संकट है? या, प्रशासनिक विफलता का आईना भी; जो स्वच्छ भारत के दावों को झूठा साबित करता है? ऊपर से, आँकड़ों का घालमेल न केवल पीड़ितों का अपमान है, बल्कि पारदर्शिता की कमी को भी उजागर करता है।
घटपाम की पड़ताल से साफ है कि यह दुर्घटना नहीं, बल्कि लंबे समय से चली आ रही उपेक्षा का परिणाम है। 25 दिसंबर से ही निवासियों ने नल के पानी में असामान्य दुर्गंध की शिकायत की। लेकिन नगर निगम की ओर से कोई त्वरित कार्रवाई नहीं हुई। नर्मदा नदी से 80 किलोमीटर दूर जलूद से लाई जाने वाली आपूर्ति पाइपलाइन में ढीले जोड़ और उसके ऊपर अवैध रूप से बने टॉयलेट से कचरा सीधे रिसाव में घुस गया। एक नया शौचालय, पिट के बजाय सही सेप्टिक टैंक के बिना बनाया गया, जो सीवेज को पेयजल में मिलाने का अपराधी साबित हुआ। रिसाव मुख्य लाइन पर था, जहाँ से पानी शाखाओं में बंटता है। यों, पूरा इलाका प्रभावित हो गया।
स्वच्छ सर्वेक्षण की चमक के पीछे फेल शहरी जल प्रबंधन
आलोचनात्मक नजरिए से देखें तो यह घटना शहरी योजना की बदहाली का प्रतीक है। इंदौर, जो स्वच्छ सर्वेक्षण में शीर्ष पर रह चुका है, आज बुनियादी जल प्रबंधन में फेल साबित हो रहा है। पाइपलाइन की मरम्मत में देरी। शिकायतों की अनदेखी और अवैध निर्माण पर चुप्पी। ये सब लापरवाही के स्पष्ट प्रमाण हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने स्वत: संज्ञान लिया। राज्य सरकार से दो सप्ताह में रिपोर्ट माँगी। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने मुफ्त इलाज और 2 जनवरी तक रिपोर्ट के निर्देश दिए। लेकिन, ये सब कदम तो प्रतिक्रियात्मक हैं न, निवारक नहीं! मुख्यमंत्री का अस्पताल दौरा और दो लाख मुआवजे की घोषणा सराहनीय है। लेकिन क्षतिपूर्ति नहीं, न्याय चाहिए।
व्यापक परिप्रेक्ष्य में, यह घटना जल संकट के राष्ट्रीय चित्र को प्रतिबिंबित करती है। भारत में हर साल लाखों लोग प्रदूषित पानी से बीमार पड़ते हैं। दिख गया कि इंदौर जैसी स्मार्ट सिटी भी इससे अछूती नहीं। जलवायु परिवर्तन, शहरीकरण और महामारियों के बाद, जल सुरक्षा अब राष्ट्रीय सुरक्षा का हिस्सा होनी चाहिए! लेकिन बजट में जल निगरानी के लिए मात्र 1-2 प्रतिशत आवंटन? यह लापरवाही का न्योता नहीं तो क्या है?
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मुआवज़ा नहीं, जवाबदेही चाहिए: इंदौर त्रासदी का असली सवाल
यानी, इंदौर की यह त्रासदी केंद्र और राज्य शासन को आईना दिखाती है। दावे कितने भी ऊँचे हों, ज़मीनी हकीकत बदलनी होगी। पीड़ित परिवारों को मुआवजा देना भर काफी नहीं। बल्कि दोषियों पर कड़ी कार्रवाई और पारदर्शी रिपोर्ट चाहिए। सरकारों को चाहिए कि जलापूर्ति प्रणाली का पूर्ण ऑडिट, नियमित वाटर टेस्टिंग लैब और नागरिक भागीदारी सुनिश्चित करें। अन्यथा, अगला काला पानी किसी और शहर को निगल लेगा। स्वच्छता अभियान को अब जुमला न बनने दें; इसे जीवनरक्षा का हथियार बनाएँ।
और सबसे दुखद तो वह असंवेदनशीलता है, जो संकट के दौर में नेतृत्व से अपेक्षित करुणा को कुचल देती है! राज्य के एक स्वनामधन्य मंत्री महोदय की पत्रकारों के सवाल पर की गई बदज़ुबानी – पीड़ितों की त्रासदी को हल्के में लेते हुए अपशब्दों का इस्तेमाल – न केवल राजनीतिक नैतिकता का अतिक्रमण है, बल्कि पूरे समाज के गाल पर तमाचा है। बाद में माफी माँग लेना या लीपापोती कर देना तो आसान है, लेकिन हजारों प्रभावितों के दिलों पर लगे ज़ख्मों का हिसाब कौन देगा? नेताओं की बदज़ुबानी शासन को कमज़ोर बनाती है, क्योंकि जनता तब विश्वास खो देती है जब नेता खुद संवेदनहीन हो जाएँ! क्या राजनैतिक पदों पर बैठे हुओं को याद नहीं रखना चाहिए कि शब्द भी हथियार होते हैं और गलत शब्द तो ज़हर!
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