ईरान-अमेरिका जंग से बढ़ेगी नहरों व जलडमरूमध्यों की अहमियत

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वैश्विक नौवहन नये समीकरणों के मुहाने पर है। ईरान और अमेरिका की ताजा जंग में सर्वाधिक सुर्खियों में उभरा है होर्मुज जलडमरूमध्य। यद्यपि अभी ईरान और अमेरिका के दरम्यां मियादी युद्ध विराम चल रहा है और ईरान की यूरेनियम संवर्द्धन और एटमी-क्षमता वाशिंगटन और तेल अवीव की साझा धुरी की चिंता के मूल में है, किंतु लगता है कि होर्मुज स्ट्रेट सारे बखेड़े की जड़ हैं। इस युद्ध ने एक ओर तो 70 साल पहले के स्वेज नहर विवाद की याद ताजा कर दी हैं, दूसरी ओर नहरों और जलडमरूमध्यों की निर्विवाद अहमियत का सिरा छोटी-बड़ी ताकतों को थमा दिया है।

चालीस दिनों के भीषण युद्ध के बाद डोनल्ड ट्रंप यह बखूबी समझ गये हैं कि होर्मुज के रूप में ईरान के हाथ एक ब्लैंक चेक लग गया है। इस पर नियंत्रण और चुंगी वसूलने का अर्थ होगा कारूं का ऐसा खजाना, जो चार से भी अधिक दशकों से आर्थिक पाबंदियां झेल रहे ईरान के लिये टॉनिक का काम कर सकता है। इसके साथ ही एक बड़ी चिंता डॉलर के भविष्य को लेकर है।

युआन में चुंगी से डॉलर के वर्चस्व पर पड़ सकता है असर

यदि ईरान होर्मुज से गुजरने वाले टैंकरों और पोतों से चीनी युआन में चुंगी वसूलता है, तो उसका सीधा असर डॉलर के वर्चस्व और मजबूती पर पड़ेगा। यह स्थिति निश्चित ही युआन को मजबूती देगी और डॉलर फिसलेगा। अमेरिका यह भी जानता है कि होर्मुज की ज्यादा दिन तक नाकेबंदी करना संभव नहीं होगा। अलबत्ता इससे ईरान को प्रतिदिन 4000 करोड़ का नुकसान होगा। लेकिन नाकेबंदी का खेल बड़ा खर्चीला है और इससे रूस-चीन की भृकुटि में बल पड़ेगा। ईरान भी अमेरिका की इस दुखती रग को जानता है, इसीलिये वह होर्मुज पर किसी भी कीमत पर नियंत्रण नहीं छोड़ेगा।

होर्मुज जलडमरूमध्य की नौवहन में अहमियत को देखकर अमेरिका ने मलक्का जलडमरूमध्य की ओर ध्यान केंद्रित किया है। मलक्का को वैश्विक कारोबार की मुख्य धमनी माना जाता है। यह स्ट्रेट हिन्द महासागर और प्रशांत महासागर को जोड़ता है और दुनिया के 40 फीसदी कारोबार का अहम रूट है। बताते हैं कि मलक्का से हर साल करीब 90 हजार जहाज गुजरते हैं और इस रास्ते तेल, कारों और सेमी कंडक्टर्स की सप्लाई होती है।

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मलक्का स्ट्रेट की नाकेबंदी से भारत-चीन पर असर संभव

भारत और चीन के लिये यह स्ट्रेट बड़ा मायने रखता है और इसकी नाकाबंदी चीन और भारत दोनों को प्रभावित करेगी। अपनी दूरगामी सोच के तहत अमेरिका ने इंडोनेशिया के साथ टैरिफ डील के बाद रक्षा संधि की पहल की है। इसके तहत अमेरिकी फाइटर प्लेन बिना अनुमति के इंडोनेशिया के एयर स्पेस में उड़ सकेंगे। राष्ट्रपति प्रोबोवो ने ट्रंप के बोर्ड ऑफ पीस में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने के साथ ही आठ हजार सैनिकों को बतौर शांति सैनिक भेजने का ऐलान किया है।

मलक्का के हाथ में आने से अमेरिका आसियान-देशों को आसानी से मॉनीटर कर सकेगा और प्रशांत-क्षेत्र में चीन के वर्चस्व को भी चुनौती दे सकेगा। कभी निर्गुट आंदोलन के ध्वजवाहक रहे इंडोनेशिया का अमेरिका की ओर विचलन भारत के लिये भी चिंता का विषय है। ईरान – अमेरिका जंग में होर्मुज प्रकरण के बाद अनेक जलमार्गों का नौवहन और सामरिक महत्व बढ़ गया है।

डॉ. सुधीर सक्सेना
डॉ. सुधीर सक्सेना

रूस जहां कास्पियन सागर के रास्ते ईरान को हथियार, ड्रोन, गोला-बारूद और उपकरणों की गुपचुप आपूर्ति कर रहा है, वहीं तुर्किये के राष्ट्रपति एर्दोगान ने सदियों से लंबित इस्तांबुल कैनाल प्रोजेक्ट को हाथ में लेने की पहल की है। इस बीच फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों सुरक्षित नौवहन के लिये योरोपीय राष्ट्रों की गोपनीय बैठक मार्च में बुला चुके हैं। भविष्य में चाबहार जैसे बन्दरगाहों का महत्व बढ़ सकता है और वैकल्पिक जलमार्ग और जलडमरूमध्य तलाशे जा सकते हैं।

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