परिसीमन के बहाने सियासी पासा फेंकना आत्मघाती होगा !

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विपक्ष को आशंका है कि इस रणनीति से भारतीय जनता पार्टी को फायदा होगा। इसी से प्रेरित होकर वह इस समय आनन-फानन में जबकि तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव होने हैं, इस पर विशेष सत्र बुलाकर महिला आरक्षण कानून को बदलवाने की कोशिश कर रही है। वैसे तो ऐसा होना फिलहाल के राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए असंभव है, लेकिन अगर ऐसा हो गया तो दक्षिण में व्यापक असंतोष बढ़ेगा। क्योंकि इससे एक ऐसा पॉलिटिकल नैरेटिव बनेगा, जिससे यह संदेश निकलेगा कि हमने जनसंख्या नियंत्रित की, हमने विकास किया जिसकी हमें सजा हमारी राजनीतिक हैसियत को कम करके दी जा रही है। इस तरह नैतिक बनाम गणितीय राजनीति का टकराव शुरु होगा, जो देश की शांति, सुरक्षा और अर्थव्यवस्था के लिए बहुत खतरनाक होगा।

लोकतंत्र में कुछ ऐसे फैसले होते हैं, जो कागज पर भले तकनीकी दिखें, लेकिन व्यवहार में उनका असर सीधे और भावनाओं को भड़काने वाला हो सकता है। 16 अप्रैल 2026 यानी कल से ही संसद का विशेष सत्र शुरु हो चुका है, जिसमें महिला आरक्षण से संबंधित तीन विधेयक पेश किए गए। कल संसद में ठीक से सांसद पहुंच भी नहीं पाये कि सुबह 10 बजे ही तमिलनाडु से ब्रेकिंग न्यूज आ गई कि मौजूदा मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने परिसीमन बिल को जला दिया। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि महिला आरक्षण विधेयक के साथ जो परिसीमन की कार्यवाई का प्रावधान है, उसका आने वाले दिनों में किस कदर आत्मघाती निर्णय साबित हो सकता है।

हालांकि यह भी तय है कि आज नहीं तो कल परिसीमन होना ही है, लेकिन परिसीमन का अभी तक जो आधार रहा है, अगर इसमें वैज्ञानिक ढंग के बदलाव न किया गया, तो यह एक ऐसे मुद्दे में बदल जायेगा, जहां सीटों का गणित, क्षेत्रीय अस्मिता की राजनीति आदि के भड़कने में देर नहीं लगेगी। भले इस चुनावी मौसम में इसे राजनीतिक विमर्श के एक गंभीर मुद्दे के रूप में पेश किया जाए, लेकिन इससे उत्तर बनाम दक्षिण के बेहद संवेदनशील विमर्श के खड़े होने की आशंका है, जो कि आत्मघाती साबित हो सकता है।

परिसीमन के विरोध में एकजुट हुआ विपक्ष

गौरतलब है कि लगभग समूचा विपक्ष परिसीमन के विरोध में खड़ा हुआ है और संसद में 16 अप्रैल 2026 को महिला आरक्षण कानून में संशोधन से जुड़े जिन तीन बिलों को पेश गया है, उन बिलों का एक अनिवार्य हिस्सा परिसीमन भी है। क्योंकि महिलाओं को लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में 2029 से 33 फीसदी आरक्षण देने का जो प्रस्ताव है, उसके चलते लोकसभा के सांसदों की संख्या 850 होनी है।

जबकि मौजूदा संख्या 543 इन 850 सांसदों में 815 राज्यों से होंगे और 35 सांसद विभिन्न केंद्र शासित प्रदेशों से होंगे। सीटों की ये सटीक संख्या इसलिए लाजमी है, क्योंकि तभी परिसीमन के बाद 243 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हो सकेंगी क्योंकि जिस तरह की पुरुष वर्चस्व वाली राजनीति है, उसमें बिना परिसीमन किए महिलाओं के लिए लोकसभा में आरक्षण लगभग असंभव है।

क्योंकि अगर ऐसा हुआ, तो महिलाओं के लिए जो सीटें आरक्षित होंगी, यह वो सीटें होंगी, जिनमें अभी तक ज्यादातर पुरुषों का कब्जा रहा है। इन सब बातों को ध्यान में रखकर ही जिस महिला आरक्षण विधेयक को साल 2023 में केंद्र सरकार ने नारी शक्ति वंदन अधिनियम के रूप में संसद में पेश किया था और लोकसभा तथा राज्यसभा दोनों में इसके पारित होने के बाद कानून बन गया था।

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अब 2011 जनगणना के आधार पर लागू करने की तैयारी

उस कानून के मुताबिक साल 2027 की जनगणना पूरी होने के बाद ही परिसीमन होना था, जिसके कारण यह कानून 2034 तक टल सकता था। लेकिन अब इसे 2011 की जनगणना के आधार पर ही लागू कराने की बात हो रही है ताकि 2029 में यह कानून लागू हो जाए। गौरतलब है कि 2029 में ही अगला लोकसभा चुनाव और उसी साल ओड़ीसा, आंध्र प्रदेश, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश विधानसभाओं के चुनाव भी होने हैं।

ऐसे में उत्तर बनाम दक्षिण की राजनीतिक बहस छिड़ जाना लाजमी है। क्योंकि अगर यह बिल पास हो जाता है और मौजूदा जनगणना यानी 2011 के मुताबिक परिसीमन होता है, तो उत्तर और दक्षिण के बीच सीटों का संतुलन ही नहीं गड़बड़ायेगा बल्कि पूरी तरह से बदल जायेगा। अभी यानी 1971 की जनगणना के मुताबिक जो लोकसभा में 543 सीटें हैं, उसमें 225 से 240 सीटें उत्तर भारत और हिंदी पट्टी के हिस्से आती हैं, जिनमें उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान आदि शामिल हैं।

जबकि इसी के बरक्स दक्षिण के पांच राज्यों तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल, आंध्र प्रदेश में 125 से 130 सीटें बनती हैं। अगर 2011 की जनसंख्या के आधार पर 2026 के बाद परिसीमन लागू कर दिया जाता है, तो उत्तर प्रदेश की मौजूदा जनगणना के मुताबिक इसकी 80 सीटें बढ़कर 120 से 130 तक पहुंच सकती हैं। बिहार की मौजूदा 40 लोकसभा सीटें 60 से 65 हो सकती हैं, मध्य प्रदेश की लोकसभा सीटें 29 से बढ़कर 40 या 45 तथा राजस्थान की 25 सीटें बढ़कर 35 से 40 तक हो सकती हैं।

दक्षिणी राज्यों में सीटों की सीमित वृद्धि का अनुमान

इस तरह मौजूदा जनगणना के आधार पर परिसीमन से हिंदी पट्टी के सांसदों की संख्या 80 से 120 तक बढ़ सकती है, जबकि इसी दौरान तमिलनाडु की 39 सीटें बढ़कर 40 से 45 तक हो सकती हैं। कर्नाटक की 28 सीटें, 30 से 34 तक जाएंगी। केरल की 20 सीटें 20 से 22 तक होंगी। आंध्र प्रदेश की 25 सीटें बढ़कर 28 से 30 होंगी, जबकि तेलगांना की 17 सीटें बढ़कर 20 से 22 तक पहुंचेंगी।

इस तरह दक्षिण भारत के इन पांच राज्यों की मौजूदा लोकसभा सीटें 15 से 25 तक ही बढ़ेंगी। इस तरह जो नया संतुलन दिखेगा, वह बेहद बेडौल होगा। क्योंकि उत्तर भारत जिसकी मौजूदा लोकसभा सीटें फिलहाल 230 हैं, वो बढ़कर 300 से 350 तक पहुंच जायेंगी। जबकि दक्षिण भारत की मौजूदा 130 सीटें बढ़कर केवल 150 से 170 तक ही पहुंचेंगी। इसका मतलब साफ है कि अगर मौजूदा जनंसख्या और नियमों के मुताबिक परिसीमन हुआ तो दक्षिण भारत पर पूरी तरह से उत्तर भारत का राजनीतिक दबदबा कायम हो जायेगा।

कहने का मतलब यह कि तब केंद्र में सरकार बनाने के लिए राजनीतिक ताकत उत्तर भारत की ओर पूरी तरह से झुक जायेगी, तो इसका सबसे खतरनाक असर ये होगा कि सरकार बनाने का गणित पूरी तरह से बदल जायेगा। राजनीतिक पार्टियों का लक्ष्य हिंदी पट्टी जीतो और केंद्र में राज करो वाला हो जायेगा। जबकि फिलहाल एक किस्म का राजनीतिक संतुलन बरकरार है और अगर ऐसा हुआ तो राजनीति में दक्षिण भारत की बार्गेनिंग पावर कम नहीं लगभग खत्म ही हो जायेगी।

चुनाव से पहले विशेष सत्र बुलाने पर उठा सवाल

विपक्ष को आशंका है कि इस रणनीति से भारतीय जनता पार्टी को फायदा होगा। इसी से प्रेरित होकर वह इस समय आनन-फानन में जबकि तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव होने हैं, इस पर विशेष सत्र बुलाकर महिला आरक्षण कानून को बदलवाने की कोशिश कर रही है। वैसे तो ऐसा होना फिलहाल के राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए असंभव है, लेकिन अगर ऐसा हो गया तो दक्षिण में व्यापक असंतोष बढ़ेगा।

क्योंकि इससे एक ऐसा पॉलिटिकल नैरेटिव बनेगा, जिससे यह संदेश निकलेगा कि हमने जनसंख्या नियंत्रित की, हमने विकास किया जिसकी हमें सजा हमारी राजनीतिक हैसियत को कम करके दी जा रही है। इस तरह नैतिक बनाम गणितीय राजनीति का टकराव शुरु होगा, जो देश की शांति, सुरक्षा और अर्थव्यवस्था के लिए बहुत खतरनाक होगा। क्योंकि इस तरह की भावनाओं से औपचारिक न सही, अनौपचारिक ही, पर साउथ ब्लॉक जैसी अवधारणाएं पैदा होंगी जिससे राज्यों और केंद्र में टकराव बढ़ेगा।

-लोकमित्र गौतम
-लोकमित्र गौतम

वित्त आयोग, टैक्स शेयरिंग इन सब पर दबाव बढ़ेगा। लेकिन हकीकत ये भी है कि ऐसा होना बहुत आसान भी नहीं है। क्योंकि इसके लिए संविधान और राजनीतिक सहमति जरूरी होगी और इस बदलाव के लिए सिर्फ विरोध से एक वोट ज्यादा होने से काम नहीं चलेगा। इस बदलाव के लिए दो तिहाई से ज्यादा समर्थन की जरूरत होगी, जिसका मतलब है कि सरकार सीटें बढ़ाकर इसमें संतुलन बना सकती हैं ताकि दक्षिण की हिस्सेदारी उत्तर के मुकाबले मौजूदा स्थितियों में कम न हो। लेकिन अगर ऐसा ही करना हो तो फिर फिलहाल आनन-फानन में ऐन दो विधानसभा चुनाव के पहले इस तरह का राजनीतिक संदेश देने के क्या फायदे हैं?

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