महावीर का दिव्य व्यवहार
गौतम स्वामी जैन धर्म के 24 वें तीर्थंकर महावीर स्वामी के प्रथम शिष्य थे। मगध देश के गोबर नामक गाँव में वसुभूति नामक ब्राह्मण के तीन पुत्रों में सबसे बड़े पुत्र इन्द्रभूति थे। गौतम गोत्रीय होने के कारण गौतम नाम से प्रसिद्ध हुए। आप यज्ञ-कर्म में महाज्ञानी माने जाते थे। मगध देश में प्रभु महावीर का समवसरण था। सर्वज्ञ प्रभु को वंदना करने देवता हर्ष से आ रहे थे।
अहंकारवश गौतम अपने पाँच सौ शिष्यों सहित समवसरण में वीर प्रभु के समक्ष पहुँचे। प्रभु की समृद्धि एवं चमकता आभा-मंडल देखकर गौतम बहुत आश्चर्य चकित हुए। प्रभु तो सर्वज्ञ थे, उन्होंने अपनी अमृतमय वाणी में कहा- गौतम इन्द्रभूति आपका स्वागत है।
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गौतम सोच में डूब गए कि प्रभु ने मेरा नाम तो जान लिया, परंतु वह मेरे हृदय में व्याप्त संशय के बारे में बताएँ तो मैं उन्हें सच्चा अधिकारी मान लूँगा। प्रभु संशयधारी गौतम को जीव-अजीव, चित-चैतन्य, विज्ञान-संज्ञा, पुण्य-पाप, यज्ञ-दान आदि के बारे में बताकर उनका मिथ्यात्व-संदेह समाप्त कर दिया। प्रभु ने उन्हें प्रतिबोध देकर 500 शिष्यों के साथ प्रथम गणधर बनाकर स्वयं दीक्षा दी। दीक्षित होकर चंपानगरी में गौतम स्वामी ने धर्म देशना दी।
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