नाटो : शिखर का हासिल

हेग (नीदरलैंड) में 24-25 जून 2025 को नाटो का शिखर सम्मेलन सकुशल संपन्न हो गया। इसने वैश्विक सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय राजनीति के सामने उभरती चुनौतियों को उजागर किया। इस लिहाज से यह सम्मेलन न केवल नाटो के 32 सदस्य देशों के लिए, बल्कि वैश्विक शांति और स्थिरता के लिए भी अहम साबित हुआ। याद रहे कि इस सम्मेलन का आयोजन ऐसी जटिल वैश्विक पृष्ठभूमि में हुआ, जहाँ रूस-यूक्रेन संघर्ष, ईरान के परमाणु कार्यक्रम और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन की बढ़ती आक्रामकता ने सुरक्षा चिंताओं को गहरा किया हुआ है।

रक्षा खर्च और यूक्रेन समर्थन पर सहमति

यूक्रेन को सैन्य और वित्तीय सहायता बढ़ाने पर नाटो की प्रतिबद्धता स्पष्ट थी, किंतु इस मुद्दे पर सदस्य देशों के बीच एकरूपता का अभाव चिंताजनक रहा। विशेष रूप से, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की रक्षा खर्च को सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 5 प्रतिशत तक बढ़ाने की माँग ने गठबंधन में दरारें उजागर कीं। स्पेन ने तो इस लक्ष्य को अनुचित तक कह दिया, जिससे आम सहमति बनाना कठिन हो गया। इसके अलावा, ट्रंप की ईरान पर सैन्य कार्रवाई ने फ्रांस और जर्मनी जैसे सहयोगियों को असहज किया। अच्छा हुआ कि 2003 के इराक युद्ध जैसी विभाजनकारी स्थिति पैदा नहीं हुई!

इन चुनौतियों के बावजूद, शिखर सम्मेलन ने कुछ उल्लेखनीय उपलब्धियाँ हासिल कीं। पहली बार, सभी नाटो सहयोगी 2 प्रतिशत रक्षा खर्च लक्ष्य तक पहुँचे या उसे पार किया और कई देश 4 प्रतिशत से अधिक खर्च कर रहे हैं। यह नाटो की सामूहिक रक्षा प्रतिबद्धता को मजबूत करता है। नाटो महासचिव मार्क रूटे ने इसे गठबंधन के मुख्य मिशन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया।

इसके अलावा, 2035 तक जीडीपी का 5 प्रतिशत रक्षा पर खर्च करने के प्रस्ताव पर घोषणापत्र को सैद्धांतिक सहमति मिली, जो भविष्य में नाटो की सैन्य क्षमता को और सुदृढ़ करेगा। यूक्रेन के लिए दीर्घकालिक सैन्य सहायता (जिसमें 100 अरब यूरो का पंचवर्षीय कोष शामिल है) ने कीव को मजबूत समर्थन का संदेश दिया। स्वीडन के नए सदस्य के रूप में औपचारिक स्वागत ने नाटो के विस्तार और एकजुटता को और प्रबल किया।

यह भी पढ़ें… ट्रंप युग बनाम भारत की विदेश नीति

नाटो सम्मेलन: चुनौतीपूर्ण एकता और नेतृत्व संकट

यहाँ यह कहना भी ज़रूरी है कि सम्मेलन कुछ अहम मोर्चों पर अपेक्षाओं से पीछे रहा। रक्षा खर्च के 5 प्रतिशत लक्ष्य पर अंतिम सहमति न बन पाना एक बड़ी विफलता रही। इससे गठबंधन की एकता पर सवाल उठना स्वाभाविक हैं। ट्रंप की अस्पष्ट और टालमटोल भरी टिप्पणियों ने सहयोगियों में अनिश्चितता पैदा की – जबकि वैश्विक अस्थिरता अपने चरम पर है। इसके अलावा, इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन की चुनौतियों से निपटने के लिए कोई ठोस रणनीति नहीं बन पाई।

भारत जैसे गैर-सदस्य देशों के साथ सहयोग बढ़ाने की बात तो हुई, किंतु इसका कोई स्पष्ट खाका सामने नहीं आया। नाटो की आंतरिक नेतृत्व संरचना में भी सुधार की कमी दिखी, जो भविष्य में निर्णय लेने की प्रक्रिया को जटिल कर सकती है। कुल मिलाकर, हेग शिखर सम्मेलन ने नाटो की प्रासंगिकता को पुनस्थापित तो ज़रूर किया, लेकिन गठबंधन के सामने मौजूद आंतरिक और बाह्य चुनौतियों को भी उजागर किया।

वैश्विक सुरक्षा के लिए नाटो की एकजुटता और अनुकूलनशीलता ज़रूरी है – ख़ासकर ऐसे वक़्त जब भूराजनैतिक प्रतिस्पर्धा अपने चरम पर है। ऐसे में नाटो को अपनी रणनीति में स्पष्टता, नेतृत्व में सुधार और सहयोगियों के बीच विश्वास बहाली पर ध्यान देना होगा। यह शिखर सम्मेलन एक मिश्रित परिणाम के साथ समाप्त हुआ, जो भविष्य में वैश्विक शांति और सुरक्षा के लिए नाटो की भूमिका को और परखेगा। … और हाँ, नाटो महासचिव मार्क रूटे के डोनल्ड ट्रंप को डैडी कहने से यह तो पहले ही स्पष्ट हो गया था कि संगठन फिलहाल महाबली की सनक को सहने के लिए मजबूर है!

अब आपके लिए डेली हिंदी मिलाप द्वारा हर दिन ताज़ा समाचार और सूचनाओं की जानकारी के लिए हमारे सोशल मीडिया हैंडल की सेवाएं प्रस्तुत हैं। हमें फॉलो करने के लिए लिए Facebook , Instagram और Twitter पर क्लिक करें।

Related Articles

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

Back to top button