भारतीय प्राचीन ग्रंथों में शिवलिंग

वेदों में सर्वत्र एकेश्वरवाद की महिमागान, प्रशंसा व स्थापना करते हुए एकमात्र ॐ निज नाम धारी निराकार ईश्वर की आराधना-उपासना, प्रार्थना- स्तुति की गई है, लेकिन भारतीयों के वैदिक सत्य ज्ञान से दूर होने के कारण कालांतर में बहुदेववाद का प्रचलन होने पर कई देवी-देवताओं की प्रतिमा पूजन के साथ शिव लिंग पूजन का आरंभ हुआ। शिवलिंग की पूजा का आरंभ अथर्ववेद कांड 10 सूक्त 7 के मंत्रों में एक स्तंभ की महिमा का उल्लेख किया गया है-

यस्य त्रयस्त्रिंशद् देवा अग्ड़े सर्वे समाहिताः।
स्कम्भं तं ब्रूहि कतम: सि्वदेव स:।।

अर्थात- कौन मुझे स्तंभ के बारे में बता सकता है, जिसके देह में सारे तैंतीस ईश्वर विराजमान हैं? अथर्ववेद कांड 10 सूक्त 7 श्लोक 35 में कहा है-

स्कम्भो दाधार द्यावापृथिवी उभे इमे स्कम्भो दाधारोर्वन्तरिक्षम्।
स्कम्भो दाधार प्रदिश: षडुर्वीः
स्कम्भ इदं विश्वं भुवनमा विवेश।।

अर्थात- स्तंभ ने स्वर्ग, धरती और धरती के वातावरण को थाम रखा है। स्तंभ ने 6 दिशाओं को थाम रखा है और यह स्तंभ संपूर्ण ब्रह्मांड में फैला हुआ है। अथर्ववेद के इस स्तोत्र में अनादि और अनंत स्तंभ का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि वह साक्षात ब्रह्म है।

लिंग पुराण में अथर्ववेद के इस स्तोत्र का कथाओं के माध्यम से विस्तृत वर्णन करते हुए स्तंभ एवं भगवान शिव की महिमा का गुणगान किया गया है। शिव पुराण कोटि रुद्र संहिता अध्याय 12 में भी शिवलिंग की उत्पत्ति का वर्णन अग्नि स्तंभ के रूप में किया गया है, जो अनादि व अनंत है।

लिंगोद्भव कथा

शिव ने स्वयं को अनादि व अनंत अग्नि स्तंभ के रूप में लाकर ब्रह्मा और विष्णु को अपना ऊपरी व निचला भाग ढूंढने का आदेश दिया। वे दोनों अग्नि स्तंभ का ऊपरी व निचला भाग ढूंढ़ नहीं सके, तो उनकी श्रेष्ठता साबित हुई। लिंग पुराण में शिवलिंग के ब्रह्मांडीय स्तंभ की व्याख्या शिव पुराण के समान ही की गई है। लिंग पुराण के अनुसार शिवलिंग निराकार ब्रह्मांड वाहक है -अंडाकार पत्थर ब्रह्मांड का प्रतीक है और पीठम् ब्रह्मांड को पोषण व सहारा देने वाली सर्वोच्च शक्ति है।

स्कंद पुराण में कहा गया है- अनंत आकाश अर्थात वह महान शून्य, जिसमें समस्त ब्रह्मांड बसा है, शिवलिंग है और पृथ्वी उसका आधार है। समय के अंत में समस्त ब्रह्मांड और समस्त देवता शिवलिंग में विलीन हो जाएंगे। द्वापर युग के अंत में भगवान शिव ने अपने भक्तों से कहा कि कलियुग में वह किसी विशेष रूप में प्रकट नहीं होंगे, परंतु निराकार और सर्वव्यापी रहेंगे। शैव संप्रदाय हिन्दुओं का एक उप-संप्रदाय है। शैव सिद्धांत के अनुसार उपासक को शिवलिंग की स्थापना करनी चाहिए।

उपनिषद ग्रंथों में भी शिवलिंग का उल्लेख है-

रुद्रो लिङ्गमुमा पीठं तस्मै तस्यै नमो नम:।
सर्वदेवात्मकं रुद्रं नमस्कुर्यात्पृथक्पृथक्।।

अर्थात- रुद्र अर्थ व उमा शब्द है। दोनों को साष्टांग प्रणाम है। रुद्र शिवलिंग व उमा पीठम् है। दोनों को साष्टांग प्रणाम है।
ध्यानबिन्दु उपनिषद श्लोक 45 में कहा गया है कि चेतना जो प्रकृति में होकर भी उससे निर्लिप्त नहीं है, वह आत्मा या शिव है। वह यह जानने वाला वेदों का ज्ञाता है।

शैव आगम के अनुसार कोई भी इस महान परमेश्वर शिव की पूजा मिट्टी, रेत, गाय के गोबर, लकड़ी, पीतल या काले ग्रेनाइट पत्थर से निर्मित शिवलिंग द्वारा सकता है। शुद्धतम शिवलिंग स्फटिक से बना होता है। यह प्रकृति द्वारा निर्मित होता है, मनुष्य द्वारा तराशा नहीं जाता। स्फटिक सैकड़ों, हजारों या लाखों वर्षों में अणुओं के इकट्ठा होने पर बनता है।

इसका बनना असीम रूप से धीरे-धीरे विकसित होने वाले जीवित शरीर की तरह है। प्रकृति की इस तरह की सृष्टि स्वयं पूजने योग्य चमत्कार है। अमरनाथ गुफा में प्राकृतिक शिवलिंग है।

कतिपय स्थानों पर शंकर को शिवलिंग का ध्यान करते हुए चित्रित किया गया है। इससे स्पष्ट है कि शिव और शंकर दो अलग-अलग सत्ताएं हैं। वायु पुराण के अनुसार प्रलयकाल में समस्त सृष्टि जिसमें लीन हो जाती है और पुन: सृष्टिकाल में जिससे प्रकट होती है, उसे लिंग कहते हैं। इस प्रकार विश्व की संपूर्ण ऊर्जा लिंग की प्रतीक है। वस्तुत: यह संपूर्ण सृष्टि बिन्दुनाद स्वरूप है।

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बिन्दु शक्ति है और नाद शिव। बिन्दु अर्थात ऊर्जा और नाद अर्थात ध्वनि। यही दो संपूर्ण ब्रह्मांड का आधार है। इसी कारण प्रतीक स्वरूप शिवलिंग की पूजा-अर्चना है। शिवलिंग परम ब्रह्म है। संसार की समस्त ऊर्जा का प्रतीक भी है।

-अशोक प्रवृद्ध

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