भगवान शिव का प्रतिमा विहीन चिह्न शिवलिंग
भारतीय संस्कृति में एकमात्र भगवान शिव ही ऐसे देवता हैं, जिनकी पूजा प्रतिमा रूप से ज्यादा लिंग रूप में होती है। यह भगवान शिव का प्रतिमाविहीन चिह्न है। यह प्राकृतिक रूप से स्वयंभू व अधिकतर शिव मंदिरों में स्थापित होता है। शिवलिंग को सामान्यत: गोलाकार मूर्ति तल पर खड़ा दिखाया जाता है, जिसे पीठम् या पीठ कहते हैं। पौराणिक मान्यतानुसार शिवलिंग सृष्टि का मूल और शिव तत्व का प्रतीक है। शिवलिंग सिर्फ एक पत्थर नहीं, वरन संपूर्ण ब्रह्मांड की शक्ति का केंद्र है।
यह भगवान शिव के निराकार रूप का प्रतीक है, जो सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और संहार तीनों का आधार है। यह चेतना और शक्ति का संगम है। इससे सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है। यह शांति, ध्यान और आत्मिक उन्नति का प्रतीक है। इसका जलधारी भाग शक्ति और ऊर्ध्व भाग शिव का प्रतिनिधित्व करता है। भगवान शिव का प्रतीक माना जाने वाला शिवलिंग उनके निश्छल ज्ञान और तेज़ का प्रतिनिधित्व करता है।
शिव का अर्थ है – कल्याणकारी। लिंग का अर्थ है- सृजन। सर्जनहार के रूप में उत्पादक शक्ति के चिह्न के रूप में लिंग की पूजा जल, दूध, बेलपत्र आदि से होती है। स्कंद पुराण में लिंग का अर्थ लय कहा गया है अर्थात प्रलय के समय अग्नि में सब भस्म होकर शिव लिंग में समा जाते हैं और सृष्टि के आदि में लिंग से ही सब प्रकट होता है।
लिंग पुराण के अनुसार लिंग के मूल में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु और ऊपर महादेव स्थित हैं। वेदी महादेवी और लिंग महादेव हैं। अकेले लिंग की पूजा से सभी की पूजा हो जाती है। लिंग पुराण के अनुसार शिवलिंग के निर्माणकर्ता भगवान विश्वकर्मा हैं। शिव पुराण में लिंग शब्द की व्याख्या करते हुए कहा गया है-
लिंगमर्थ हि पुरुषं शिवं गमयतीत्यद :।
शिवशक्त्योश्च चिह्नस्य मेलनं लिंगमुच्यते।।
शिवलिंग के प्रकार, महत्व और पूजा की परंपरा
अर्थात- शिव शक्ति के चिह्न का सम्मिलन ही लिंग है। लिंग में विश्वप्रसूतिकर्ता की अर्चा करनी चाहिए। शिव पुराण के अनुसार शिवलिंग दस प्रकार के होते हैं- पारद शिवलिंग, चीनी शिवलिंग, जौ व चावल शिवलिंग, भस्म शिवलिंग, गुड़शिवलिंग, सोने व चांदी के शिवलिंग, मातृका शिवलिंग, दधी शिवलिंग, लहसुनिया शिवलिंग, स्फटिक शिवलिंग। मान्यतानुसार सभी शिवलिंग का अपना-अपना महत्व है। श्रद्धा से शिवलिंग की पूजा करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।
शिवमास श्रावण, महाशिवरात्रि और शिव से संबंधित अन्य पर्वों एवं व्रतों पर शिवलिंग की पूजा की जाती है। प्राचीन काल में अनेक देशों में शिवलिंग की उपासना प्रचलित थी। जल का अर्थ है- प्राण। शिवलिंग पर जल चढ़ाने का अर्थ है- परम तत्व में प्राण विसर्जन करना। स्फटिक लिंग सर्वकामप्रद है। पारद लिंग से धन, ज्ञान, ऐश्वर्य और सिद्धि प्राप्त होती है। लिंगायत मत के अनुयायी इष्टलिंग नामक शिवलिंग पहनते हैं।
शिवलिंग की उत्पत्ति कथा और शैव दर्शन में उसका रहस्य
शिव पुराण, पूर्वार्द्ध, 3/ 5-6 के अनुसार सती की मृत्यु के उपरांत उनके वियोग में शिव नग्न रूप में भटकने लगे। वन में घूमते शिव को देख मुनि-पत्नियां आसक्त हो उनसे चिपट गईं। यह देख मुनिगण रुष्ट हो उठे। उनके शाप से शिव का लिंग पृथ्वी पर गिरता हुआ पाताल में चला गया। शिव क्रोधवश भांति-भांति की लीला करने लगे। पृथ्वी पर प्रलय के चिह्न दिखाई देने लगे। देवताओं ने शिव से प्रार्थना की कि वे लिंग धारण कर लें।
कालांतर में प्रसन्न होकर उन्होंने लिंग धारण कर लिया तथा वहां प्रतिमा बनाकर पूजा करने का आदेश दिया। शैव सम्प्रदाय की प्रमुख परंपरा अनुसार शिवलिंग का ऊपरी हिस्सा शिव और निचला हिस्सा (पीठम्) पराशक्ति को दर्शाता है। पराशक्ति एवं परशिव भगवान शिव की दो परिपूर्णताएं हैं। शैव सिद्धांत में भगवान शिव की तीन परिपूर्णताएं बताई गई हैं- परशिव, पराशक्ति और परमेश्वर।
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शिवलिंग का ऊपरी अंडाकार भाग परशिव का प्रतिनिधित्व करता है, निचला हिस्सा पराशक्ति का प्रतिनिधित्व करता है। इस परिपूर्णता में भगवान शिव निराकार, शाश्वत और असीम हैं। पराशक्ति परिपूर्णता में भगवान शिव सर्वव्यापी, शुद्ध चेतना, शक्ति और मौलिक पदार्थ के रूप में मौजूद है। पराशक्ति परिपूर्णता में भगवान शिव का आकार है, परंतु परशिव परिपूर्णता में वे निराकार हैं। भारतीय समाज में पारंपरिक रूप से शिवलिंग को भगवान शिव की ऊर्जा का रूप भी माना जाता है।
-अशोक प्रवृद्ध
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