गाजा बोर्ड ऑफ पीस पर वैश्विक कश्मकश के मायने

देखा जाए तो भारत गाजा बोर्ड ऑफ पीस पर रणनीतिक चुप्पी अपनाए हुए है, जो बहुपक्षीय संस्थाओं को प्राथमिकता और संतुलित कूटनीति को दर्शाता है। भारत का यह रुख फिलिस्तीन समर्थन, इजराइल के साथ मजबूत संबंधों और यूएन सुधारों पर जोर को अधिक संतुलित करता है। दरअसल, भारत की चुप्पी के कारण हैं, क्योंकि वह डांवांडोल अमेरिकी कूटनीति पर ज्यादा एतबार नहीं कर सकता है। भारत के साथ अमेरिकी नीतिगत चालबाजी के चलते ही इंडिया ने दावोस 2026 में गाजा बोर्ड ऑफ पीस के लॉन्च में भाग नहीं लिया क्योंकि यह यूएन प्रस्तावों पर आधारित दो-राज्य समाधान से भटकता दिखता है।

गाजा बोर्ड ऑफ पीस अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की एक महत्वाकांक्षी पहल है जो गाजा संघर्ष को सुलझाने के साथ-साथ वैश्विक स्तर पर शांति स्थापना का एक नया मॉडल प्रस्तुत करती है। चूंकि यह बोर्ड संयुक्त राष्ट्र संघ के पारंपरिक ढांचे से बाहर काम करने का अदद प्रयास है, जिससे अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में नई बहस छिड़ गई है। खासकर वैश्विक कश्मकश बढ़ चुकी है, जिसके वैश्विक प्रभाव आने वाले वक्त में महसूस किए जाएंगे।

सवाल है कि आखिर अपनी ही बनाई पुरानी विश्व व्यवस्था की अनदेखी करते हुए अमेरिका बिल्कुल नई तरह की विश्व व्यवस्था क्यों बनाना चाहता है? ब्रेक के बाद वह अपनी ही नीतियों को क्यों बदल देता है। आखिर वह शेष दुनिया को अमेरिकी मुगालते में क्यों रखना चाहता है? आखिर चीन, रूस, भारत, फ्रांस, जर्मनी, नॉर्वे, स्वीडन जैसे कद्दावर देश ऐसे पीस बोर्ड से दूरी क्यों बनाए हुए हैं? खास बात यह कि आखिर गाजा बोर्ड ऑफ पीस के अंतरराष्ट्रीय मायने क्या हैं? और इसके पीछे के वैश्विक निहितार्थ से किसको क्या फायदा और क्षति होने के कयास लगाये जा रहे हैं?

आइए सबसे पहले इस बोर्ड के स्वरूप को जानते हैं। बता दें कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने 2025 में इसकी शुरुआत की जहां खुद ही वे ही यानी पदेन अमेरिकी राष्ट्रपति इसके प्रमुख होंगे और अन्य सदस्य देश तीन-तीन साल के लिए चुने जाएंगे। वहीं, इसकी स्थायी सदस्यता के लिए 1 अरब डॉलर का योगदान जरूरी है जबकि कार्यकारी बोर्ड में मार्को रुबियो, जेरेड कुशनर जैसे नाम शामिल हैं। यह बोर्ड गाजा के पुनर्निर्माण, प्रशासन और क्षेत्रीय समन्वय पर केंद्रित है।

35 से अधिक देशों ने गाजा पीस बोर्ड में भागीदारी की पुष्टि की

अलबत्ता, इसके गठन को लेकर जो वैश्विक प्रतिक्रियाएँ सामने आई हैं उसमें अमेरिका के पिछलग्गू देश यानी पाकिस्तान, सऊदी अरब, कतर, तुर्की, यूएई जैसे 35 से अधिक देशों ने इसमें अपनी भागीदारी की पुष्टि की है जबकि चीन, फ्रांस, नॉर्वे, स्वीडन ने इसे अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ बताकर खारिज कर दिया है। खास बात यह है कि भारत जैसे अहम वैश्विक खिलाड़ी ने फिलिस्तीन समर्थन और यूएन-आधारित दो-राज्य समाधान की नीति के चलते अभी इस पर चुप्पी साध रखी है।

जहां तक गाजा पीस बोर्ड के भविष्य के निहितार्थ की बात है तो यह बोर्ड यूएनएससी के समानांतर वैकल्पिक तंत्र बन सकता है जो वैश्विक संघर्षों में मध्यस्थता करेगा। क्योंकि इसे यूएनओ ने 2027 तक सीमित मान्यता दी है, लेकिन रूस-चीन की असहमति से विवाद बढ़ा है। जबकि भारत जैसे उभरते गुटनिरपेक्ष देशों के लिए यह कूटनीतिक संतुलन की परीक्षा की घड़ी है। यही वजह है कि गाजा बोर्ड ऑफ पीस की अंतरराष्ट्रीय वैधता सीमित और विवादास्पद बनी हुई है क्योंकि यह यूएनएससी प्रस्ताव 2803 (2025) से 2027 तक की अस्थायी मंजूरी पर टिकी है।

देखा गया कि रूस-चीन जैसे देशों की असहमति से इसकी वैश्विक स्वीकार्यता कमजोर है, जो अंतरराष्ट्रीय कानून पर सवाल उठाती है। जहां तक इसकी वैधता के आधार की बात है तो यूएनएससी ने इसे गाजा पुनर्निर्माण और विसैन्यीकरण के लिए अंतरिम वैधता प्रदान की, लेकिन यूएनओ के पूर्ण नियंत्रण के बिना। मसलन, बोर्ड को अंतरराष्ट्रीय कानूनी व्यक्तित्व दिया गया, जो फिलिस्तीनी तकनीशियनों की समिति और बहुराष्ट्रीय शांति बल के माध्यम से कार्य करता है। हालांकि, सदस्य चयन और जवाबदेही की कमी से इसकी आलोचना भी हो रही है।

ट्रंप की आजीवन अध्यक्षता से लंबे समय में वैधता संकट

जहां तक गाजा पीस बोर्ड के संभावित प्रभाव की बात है तो यह यूएनओ के समानांतर तंत्र के रूप में यूएनओ की एकाधिकार को चुनौती दे सकता है, खासकर वैश्विक संघर्षों में। वहीं, ट्रंप की आजीवन अध्यक्षता जैसी संरचना से लंबे समय में वैधता संकट गहरा सकता है जबकि भारत जैसे देशों की चुप्पी से बहुपक्षीय संस्थाओं की प्रासंगिकता पर बहस तेज हो रही है। कहना न होगा कि रूस और चीन का गाजा बोर्ड ऑफ पीस में असहयोग अंतरराष्ट्रीय कानून के सिद्धांतों को कमजोर करता है, लेकिन बोर्ड की वैधता को पूरी तरह समाप्त नहीं करता।

दरअसल, यह असहमति बहुपक्षीय संस्थाओं की प्रासंगिकता पर सवाल उठाती है और वैकल्पिक गठबंधनों को बढ़ावा दे सकती है। जहां तक इस बोर्ड के कानूनी आधार की बात है तो रूस-चीन ने बोर्ड को यूएन चार्टर के अनुच्छेद 2(4) के तहत शक्ति राजनीति का माध्यम बताकर खारिज किया, जो क्षेत्रीय संप्रभुता के हस्तक्षेप को प्रतिबंधित करता है। यूएनएससी प्रस्ताव 2803 की अस्थायी मंजूरी के बावजूद, इनकी वीटो शक्ति से स्थायी वैधता अवरुद्ध हो सकती है।

चूंकि पीएम मोदी ब्राजील, जर्मनी, जापान और भारत जैसे जी-फोर (जी4) देशों के साथ यूएनएससी विस्तार पर फोकस कर रहे हैं, न कि अमेरिकी वैकल्पिक तंत्र पर। इसलिए भी भारत ने इससे दूरी दिखाई है। इसके अलावा, इस बोर्ड में अमेरिकी पिल्ले पाकिस्तान की भागीदारी से भी भारत को क्षेत्रीय संतुलन की चिंता है। इसलिए भारत भविष्य की रणनीति पर बल दे रहा है। अपनी इसी कूटनीति के तहत भारत यूएन सुधारों को आगे बढ़ाते हुए ग्लोबल साउथ की आवाज मजबूत करेगा और गाजा बोर्ड ऑफ पीस को अप्रत्यक्ष रूप से निगरानी में रखेगा।

जी4 और यूएन मंचों पर तटस्थता से बहुपक्षीय कूटनीति को मजबूती

वहीं, यदि यह बोर्ड वैश्विक संघर्षों में विस्तार चाहेगा, तो भारत तटस्थता बनाए रखकर जी4 या यूएन मंचों पर सक्रिय हो सकता है। इस प्रकार भारत की यह रणनीतिक स्वायत्तता वाली नीति उसकी लंबी परंपरा को मजबूत करती है। कुल मिलाकर भारत की गाजा बोर्ड ऑफ पीस पर चुप्पी रणनीतिक स्वायत्तता और बहुपक्षीय कूटनीति को मजबूत करने की नीति का हिस्सा है। भारत का यह रुख फिलिस्तीन समर्थन, इजराइल के साथ सैन्य सहयोग और अमेरिकी दबाव से संतुलन बनाए रखने के लिए अपनाया गया है।

जहाँ तक ऐतिहासिक फिलिस्तीन नीति की बात है तो भारत ने 1947 से फिलिस्तीन के आत्मनिर्णय और दो-राज्य समाधान का समर्थन किया है, जो यूएन प्रस्तावों पर आधारित है। जबकि ट्रंप का यह बोर्ड यूएन ढांचे से बाहर होने के चलते भारत ने इसका खुला समर्थन टाल दिया, ताकि ग्लोबल साउथ में विश्वसनीयता बनी रहे। इससे इजराइल-अमेरिका संतुलन भी बना रहेगा। चूंकि इजराइल के साथ रक्षा सौदे (जैसे स्पाइस मिसाइलें) और अमेरिका से तकनीकी सहयोग महत्वपूर्ण हैं, लेकिन बोर्ड में पाकिस्तान की मौजूदगी से क्षेत्रीय जोखिम बढ़ता है।

लिहाजा भारत की चुप्पी कूटनीतिक लचीलापन देती है, जहां भारत मानवीय सहायता जारी रख सकता है बिना राजनीतिक बंधन के। वहीं भारत यूएन सुधार पर फोकस कर रहा है, जहां पीएम मोदी उ4 (भारत-ब्राजील-जर्मनी-जापान) के साथ यूएनएससी विस्तार पर जोर दे रहे हैं न कि वैकल्पिक तंत्रों पर। इस प्रकार यह देखो और इंतजार करो रणनीति बोर्ड की वैधता की परीक्षा के बाद निर्णय लेगी।

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गाजा बोर्ड में भारत की भागीदारी से अमेरिका के साथ साझेदारी मजबूत

यह ठीक है कि भारत को गाजा बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने से कूटनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक लाभ मिल सकते हैं, खासकर अमेरिका के साथ मजबूत साझेदारी को देखते हुए हालांकि, यह फिलिस्तीन नीति और ग्लोबल साउथ की विश्वसनीयता से टकरा सकता है। जहां तक इसके कूटनीतिक लाभ की बात है तो भारत को अमेरिका-इजराइल के साथ उच्च-स्तरीय पहुंच मिलेगी, जो मध्य पूर्व में प्रभाव बढ़ाएगा। वहीं वैश्विक शांति मंच पर नेतृत्वकारी भूमिका से यूएनएससी स्थायी सदस्यता की दावेदारी मजबूत होगी। इसलिए यहां पर पाकिस्तान की मौजूदगी के बावजूद भारत अपनी अलग पहचान बना सकता है।

गाजा बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने से भारत को अमेरिका के साथ कूटनीतिक साझेदारी मजबूत करने और मध्य पूर्व में प्रभाव बढ़ाने का प्रमुख लाभ मिलेगा। यह वैश्विक शांति पहलों में नेतृत्वकारी भूमिका प्रदान करेगा, जो यूएनएससी स्थायी सदस्यता की दावेदारी को बल देगा। इससे अमेरिका के साथ निकटता बढ़ेगी। ट्रंप प्रशासन के कोर सदस्यों (जैसे जेरेड कुशनर) के साथ प्रत्यक्ष संवाद से द्विपक्षीय संबंधों में गहराई आएगी।

कमलेश पांडेय
कमलेश पांडेय

जहां तक मध्य पूर्व प्रभाव की बात है तो सऊदी, यूएई जैसे सहयोगियों के साथ संयुक्त मंच पर भारत की आवाज मजबूत होगी, जो ऊर्जा सुरक्षा और व्यापार समझौतों को आसान बनाएगा। वहीं पाकिस्तान की उपस्थिति के बावजूद, भारत क्षेत्रीय मध्यस्थ के रूप में उभर सकता है। इससे उसकी वैश्विक छवि मजबूत होगी। ग्लोबल साउथ के प्रतिनिधि के नाते मानवीय योगदान से सॉफ्ट पावर बढ़ेगा, जो फिलिस्तीन नीति को संतुलित रखते हुए इजराइल सहयोग को सुरक्षित करेगा। दावोस जैसे मंचों पर नेतृत्व से बहुपक्षीय कूटनीति में नया स्थान बनेगा।

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