शांति की कच्ची डगर


मध्य पूर्व के अशांत क्षितिज पर छाई युद्ध की काली घटाओं के बीच पड़ोस से आ रही खबरें वैश्विक कूटनीति के लिए ठंडी हवा के झोंके जैसी हैं। अमेरिका और ईरान के बीच दो सप्ताह के अस्थायी युद्धविराम के बाद अब शांति वार्ता के दूसरे दौर की जो सुगबुगाहट शुरू हुई है, उसने दुनिया भर के रणनीतिकारों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। 21 अप्रैल, 2026 को समाप्त होने जा रहे युद्धविराम से पहले बातचीत का यह प्रयास न केवल इन दो कट्टर प्रतिद्वंद्वियों के लिए, बल्कि भारत सहित पूरी दुनिया की ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता के लिए बेहद निर्णायक साबित होने वाला है।
बेशक, कागजों पर दिखने वाली यह उम्मीद धरातल पर उतरने से पहले कई ऐसी बाधाओं से घिरी है, जो दशकों पुराने अविश्वास और हालिया सैन्य तनाव की उपज हैं। इस संवाद की राह में सबसे बड़ा पत्थर अविश्वास की वह गहरी खाई है, जिसे पाटना किसी भी पक्ष के लिए आसान नहीं रहा है। ईरानी परमाणु ठिकानों पर हुए हमलों और उसके जवाब में तेहरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकेबंदी ने स्थिति को इतना नाजुक बना दिया है कि छोटी सी चिंगारी भी बड़े विस्फोट का कारण बन सकती है। वर्तमान गतिरोध का एक प्रमुख सिरा समुद्री सुरक्षा से जुड़ा है।
सुरक्षित समुद्री मार्ग पर अड़ा अमेरिका का सख्त रुख
ईरान ने वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए जीवन रेखा माने जाने वाले होर्मुज जलडमरूमध्य पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली है, जिसे वह अमेरिका के खिलाफ एक बड़े हथियार के रूप में देख रहा है। अमेरिका का स्पष्ट रुख है कि जब तक अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक जहाजों के लिए यह मार्ग पूरी तरह स्वतंत्र और सुरक्षित नहीं होता, तब तक प्रतिबंधों में कोई बड़ी ढील देना मुमकिन नहीं होगा। वहीं, ईरान इसे अपनी संप्रभुता और आर्थिक सुरक्षा का मुद्दा बनाकर मेज पर अपनी स्थिति मजबूत करना चाहता है।
बाधाओं का दूसरा सिरा ईरान के परमाणु कार्यक्रम और उसकी तकनीकी प्रगति से जुड़ा है। 2026 के हवाई हमलों के बावजूद, तेहरान की यूरेनियम संवर्धन क्षमता एक नए और चुनौतीपूर्ण स्तर पर पहुँच चुकी है। अमेरिका अब शून्य संवर्धन की माँग पर अड़ा है, जिसे ईरान अपनी वैज्ञानिक प्रगति और राष्ट्रीय गौरव के अपमान के रूप में देख रहा है। इसके साथ ही, लेबनान में हिजबुल्लाह पर बढ़ते दबाव और इजराइल-ईरान के बीच बढ़ते सीधे सैन्य टकराव ने कूटनीति की मेज पर जटिलताओं के नए जाल बुन दिए हैं।
ईरान चाहता है कि किसी भी समझौते से पहले इजराइल के सैन्य अभियानों पर अंकुश लगाने की गारंटी दी जाए, जबकि अमेरिका मैक्सिमम प्रेशर की अपनी नीति के तहत तेहरान को आर्थिक और सामरिक रूप से पूरी तरह अलग-थलग रखने की रणनीति पर कायम है। इन तमाम अवरोधों के बीच समाधान की तलाश किसी भूल-भुलैया में रास्ता खोजने के समान है। लेकिन, असंभव नहीं।
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छोटी रियायतों से विश्वास बहाली की रणनीति
सायनों का कहना है कि इस गतिरोध को तोड़ने के लिए अब सर्वसमावेशी समझौते के बजाय चरणबद्ध समाधान का रास्ता अपनाने में ही समझदारी है। इसे कम के बदले कम का सूत्र कहा जा सकता है, जहाँ दोनों पक्ष छोटी-छोटी रियायतों से शुरुआत करें। उदाहरण के तौर पर, यदि ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य को अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए सुरक्षित बनाने की लिखित गारंटी देता है, तो जवाब में अमेरिका को मानवीय आधार पर ईरान की कुछ फ्रीज की गई संपत्तियों को मुक्त कर देना चाहिए।
यह कदम न केवल तनाव कम करेगा, बल्कि बातचीत के लिए जरूरी न्यूनतम विश्वास को भी बहाल करेगा। कहना न होगा कि भारत के लिए यह शांति वार्ता केवल एक कूटनीतिक घटनाक्रम नहीं, बल्कि राष्ट्रीय अनिवार्यताओं का विषय है। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और चाबहार जैसे सामरिक निवेशों की सुरक्षा भारत के हितों से सीधे जुड़ी है। भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता और सभी पक्षों के साथ अपने बेहतर संबंधों का लाभ उठाकर एक निष्पक्ष सूत्रधार बन सकता है, जो समाधान के लिए रचनात्मक सुझाव दे सके। अंततः, अमेरिका में घरेलू राजनीतिक दबाव और ईरान में सत्ता के आंतरिक समीकरणों के बीच फंसी यह वार्ता तभी सफल हो सकती है, जब दोनों पक्ष अपनी अतिवादी माँगों की जिद छोड़कर वास्तविकता के धरातल पर आएँ।
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