स्त्री सुरक्षा : आधी रात की कड़वी सच्चाई

अभी उस रात दिलसुखनगर बस स्टैंड पर 12:30 बजे से 3:30 बजे के बीच आम यात्री बनकर (सूट-सलवार में) अकेली खड़ी एक वरिष्ठ महिला आईपीएस अधिकारी ने जो देखा, वह चौंकाने वाला भी है और डरावना भी। मात्र तीन घंटे की अवधि में लगभग 40 पुरुष उनके पास अनुचित इरादे से पहुँचे। इनमें से कई नशे की हालत में थे, तो कुछ युवा छात्र और निजी क्षेत्र में काम करने वाले पेशेवर भी थे। यह आँकड़ा सिर्फ यह नहीं बताता कि सड़क पर कितने असामाजिक तत्व हैं; बल्कि उस गहरी सामाजिक विकृति को उजागर करता है जिसके चलते रात में अकेली खड़ी महिला को या तो आसान शिकार मान लिया जाता है या फिर उपलब्ध समझ लिया जाता है!
दरअसल, मलकाजगिरी (हैदराबाद) की पुलिस आयुक्त आईपीएस वी. सुमति के इस विशेष अंडरकवर ऑपरेशन ने एक बार फिर हमारी व्यवस्था और समाज की कुरूपता को उजागर किया है। यह मात्र एक पुलिस अभियान नहीं; बल्कि उस खौफनाक सच्चाई का सीधा साक्षात्कार था, जिसे आधी रात को घर से बाहर निकलने वाली हर महिला को भुगतना पड़ता है।
याद रहे, किसी भी सभ्य और आधुनिक समाज की प्रगति का सबसे सटीक पैमाना यह है कि वहाँ महिलाएँ रात के अंधेरे में सार्वजनिक स्थानों पर खुद को कितना सुरक्षित महसूस करती हैं।
महिलाओं की बढ़ती भागीदारी और सुरक्षा की जरूरत
आज के दौर में जब महिलाएँ हर क्षेत्र में कदम से कदम मिलाकर चल रही हैं, नाइट शिफ्ट्स में काम कर रही हैं और अपनी शिक्षा या कॅरियर के लिए देर रात सफर कर रही हैं, तब सुरक्षा उनका एक बुनियादी अधिकार बन जाता है। दुर्भाग्य से, स्मार्ट सिटी की चकाचौंध और सुरक्षित शहरों के कागजी दावों के बीच धरातल की सच्चाई आज भी भयावह है। इस साहसिक अभियान के अनुभवों और निष्कर्षों का गहराई से विश्लेषण करें, तो समाज के माथे पर कई गंभीर चिंताएँ उभरकर सामने आती हैं।
पहली; हमारे समाज के एक बड़े वर्ग की मानसिकता में यह बात गहराई तक बैठी है कि सभ्य महिलाएँ रात में बाहर नहीं घूमतीं। जो महिला रात के वक़्त सड़क पर होती है, उसके चरित्र को लेकर एक पूर्वग्रह बना लिया जाता है। यही दूषित सोच पुरुषों को उनके स्पेस में घुसपैठ करने और अवांछित टिप्पणी करने का झूठा अधिकार देती है। दूसरी; जब एक अकेली महिला के पास 40 लोग बेखौफ होकर आ सकते हैं, तो इसका सीधा अर्थ है कि उन्हें पुलिस गश्त या कानून का कोई डर नहीं है।
मनचलों को यह यकीन होता है कि आधी रात को इस तरह की हरकतों के बाद वे बिना किसी कानूनी पचड़े के आसानी से बच निकलेंगे। तीसरी, सुनसान सड़कें, कम रोशनी वाले बस स्टैंड और चौक-चौराहे ऐसे असामाजिक तत्वों के लिए सुरक्षित पनाहगाह बन जाते हैं। महिलाओं के लिए सुरक्षित और सुलभ सार्वजनिक परिवहन का अभाव इस असुरक्षा को कई गुना बढ़ा देता है।
सादे कपड़ों में पुलिस ने मनचलों पर की कार्रवाई
कहना न होगा कि आईपीएस वी. सुमति की यह जमीनी पहल निश्चित तौर पर सराहनीय है। सादे कपड़ों में पुलिसकर्मियों को तैनात कर मनचलों को हिरासत में लेना और उनकी काउंसलिंग करना पुलिस विभाग की संवेदनशीलता को दर्शाता है। लेकिन इस अभियान के निष्कर्षों को देखते हुए कुछ व्यवस्थागत और दीर्घकालिक बदलावों की तत्काल जरूरत है। जैसे, पुलिस गश्त केवल मुख्य मार्गों या वीआईपी इलाकों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।
बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन और अंधेरी गलियों में पीसीआर वैन और महिला पुलिस कर्मियों की नियमित गश्त अनिवार्य होनी चाहिए। नगर निगमों और परिवहन विभागों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हर बस स्टैंड और सार्वजनिक स्थल पर पर्याप्त रोशनी (स्ट्रीट लाइट्स) हो। इसके साथ ही, सक्रिय सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएं जिनकी लाइव मॉनिटरिंग पुलिस कंट्रोल रूम से 24/7 हो। काउंसलिंग के साथ-साथ ऐसे मामलों में तुरंत और सख्त कानूनी कार्रवाई (एफआईआर) होनी चाहिए।
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समाज में यह कड़ा संदेश जाना चाहिए कि किसी भी महिला को असहज महसूस कराने या छेड़छाड़ करने के परिणाम गंभीर होंगे। अंतत महिलाओं की सुरक्षा केवल पुलिस के डंडे से सुनिश्चित नहीं की जा सकती; यह पुरुषों की परवरिश का भी विषय है। स्कूलों, कॉलेजों और कार्यस्थलों पर लड़कों और पुरुषों के लिए जेंडर संवेदनशीलता कार्यक्रम अनिवार्य किए जाने चाहिए।
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