युग दर्पण (ग़ज़ल)
हर बात में त़कदीर पे रोने से क्या बने।
हिम्मत न हो तो सब कुछ होने से क्या बने।।
अपनी भी ग़ल्तियों पे नज़र हो तो ठीक हो,
कमज़ोरियों पे आँख भिगोने से क्या बने।
सोने का आवरण चढ़ा लोहे पे ग़र तो क्या,
इन्सान के इस रूप सलोने से क्या बने।
ख़ुद को अलग किया नहीं बदकाम से कभी,
बदनामियों के दाग़ को धोने से क्या बने।
नादानियों ने अपनी सताया बहोत हमें,
हम दूसरों के हाथ खिलौने से क्या बने।
आँखों में शर्म ना हो किसी के अगर यहाँ,
घूँघट का बोझ आँख पे ढोने से क्या बने।
जो दूसरों का दर्द न समझे यहाँ ‘नरेन’

इन्सान का होने से न होने से क्या बने।।
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-नरेंद्र राय
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