नेता हैं, तो चमड़ी मोटी रखिए न!

भारतीय राजनीति के लिए 8 सितंबर, 2025 का दिन एक ऐतिहासिक स्किन केयर दिवस बन गया है! इस दिन माननीय सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी के खिलाफ भाजपा की मानहानि याचिका को खारिज तो किया ही, साथ में यह मुफ्त सलाह भी दे डाली कि राजनीति में हैं, तो चमड़ी मोटी रखिए; और अदालतों को राजनीतिक कुश्ती का अखाड़ा मत बनाइए! मानो कोर्ट ने कहा हो कि भाई, अगर चुनावी रैलियों में आरक्षण खत्म करने जैसे आरोप लगने से तुम्हारी संवेदनशील त्वचा जल जाती है, तो राजनीति छोड़कर कोई स्पा सेंटर खोल लो! सियासत में पतली चमड़ी के लिए जगह कहाँ!

याद रहे कि पिछले लोकसभा चुनावों के दौरान रेड्डी ने दावा किया था कि भाजपा 400 सीट जीत गई, तो एससी/एसटी/ओबीसी आरक्षण को अलविदा कह देगी। भाजपा तेलंगाना इकाई ने इसे मानहानि बताकर अदालत का दरवाजा खटखटाया। लेकिन तेलंगाना हाईकोर्ट ने पूछ लिया कि राज्य इकाई को क्यों पीड़ा हो रही है जबकियह आरोप तो राष्ट्रीय भाजपा पर था! वैसे भी राजनीतिक भाषणों में तो यह सब जुमलेबाजी चलती ही रहती है।

सुप्रीम कोर्ट: राजनीति में आलोचना सहन करें नेता

सच-झूठ को वहाँ कौन पूछता है। अब सुप्रीम कोर्ट ने भी मुहर लगा दी। यानी इतनी भी सहनशक्ति नहीं, तो आप राजनीति में कर क्या रहे हैं! अगर हर चुनावी बयान पर मुकदमा चलेगा, तो अदालतें तो इसी में लगी रहेंगी। बेहतर है कि चमड़ी मोटी कीजिए, या फिर हर रैली में हेलमेट और बॉडी आर्मर पहनकर आइए; मानहानि-प्रूफ स्पीच राइटर हायर कीजिए! यह भी कोई बात हुई कि जो लोग जनता को मोटी चमड़ी वाली बताकर कठोर फैसलों के नश्तर ठोकते हैं, वे खुद एक छोटे-से आरोप से एलर्जिक रिएक्शन दिखाने फिरें!

समझने वाली बात यह है कि भारतीय समाज में बोलने की आज़ादी पहले से ही सेंसिटिव नेताओं के जाल में फँसी हुई है। अब कोर्ट कह रहा है कि राजनीतिक आलोचना को सहन करो, तो शायद आम आदमी को भी कुछ राहत मिल जाए। वरना, अगर हर सोशल मीडिया पोस्ट पर मानहानि का केस चलने लगें, तो फेसबुक-ट्विटर बंद हो जाएँगे और लोग वापस चिट्ठियाँ लिखने लगेंगे। नेपाल में इसी बात को लेकर बवाल हो रहा है न! बेशक, अब राजनीति में ट्रोलिंग का दौर बढ़ जाए, लेकिन साथ ही टॉलरेंस की संस्कृति भी तो पनपेगी।

क्या पता, नेता लोग अब योगा क्लास जॉइन करें और मोटी चमड़ी के लिए मेडिटेशन करें। वैसे भी, राजनीति कोई सॉफ्ट स्किन ब्यूटी कॉन्टेस्ट नहीं, बल्कि एक रफ-टफ जंगल सफारी है, जहाँ काँटें लगना स्वाभाविक है! क़ानूनी मोर्चे पर यह फैसला एक मील का पत्थर है। भारतीय दंडसंहिता की मानहानि विषयक धारा को अक्सर राजनीतिक हथियार बनाया जाता है। अब कोर्ट ने साफ कह दिया है कि अदालतें राजनीतिक लड़ाइयों का मैदान नहीं बनेंगी।

सुप्रीम कोर्ट का संदेश: राजनीति में मोटी चमड़ी अनिवार्य

इसका मतलब? अब फर्जी या राजनीति से प्रेरित मानहानि-मुकदमों पर लगाम लगेगी। वरना कोर्टरूम में कुश्ती रिंग लगाना पड़ेगा न, कि यहाँ लड़ो, लेकिन क़ानूनी तरीके से! यानी, यह फैसला गरीबों और आम लोगों के लिए बोझ बन चुकी क़ानूनी प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोक सकता है। हाँ, शायद वक़ील साहिबान की कमाई ज़रूर कुछ घट जाए। लेकिन उनके पास राजनीति जॉइन करने का विकल्प है न – मोटी चमड़ी का फायदा!

अंतत माननीय सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला पक्षी-विपक्षी सभी दलों के लिए एक वेक-अप कॉल है। भाजपा हो या कांग्रेस, सबको अब क्रिटिसिज्म प्रूफ बनना पड़ेगा। वरना अगले चुनाव में स्लोगन देना पड़ सकता है कि वोट दो, लेकिन गाली मत दो – हमारी चमड़ी अभी पतली है! यह राजनीतिक डिसकोर्स को मजबूत बनाएगा, क्योंकि अब बयानबाजी बिना डर के होगी। वैसे नेतागण अब मानहानि इंश्योरेंस पॉलिसी भी लॉन्च कर सकते हैं। विपक्ष मजबूत होगा, क्योंकि आलोचना को लीगल चैलेंज से नहीं रोका जा सकेगा। कहा जा सकता है कि यह फैसला राजनीति को डेमोक्रेटिक जिम बना सकता है, जहाँ हर नेता को क्रिटिसिज्म वर्कआउट करना पड़ेगा। क्या पता कब फरमान आ जाए, राजनीति में एंट्री के लिए मोटी चमड़ी टेस्ट अनिवार्य!

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