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हैदराबाद, जीवन में सबसे बड़ी है प्रभु के प्रति भक्ति। यदि जीव भगवान के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित हो जाता है, तो उसका हर कार्य प्रभु साध्य कर देते हैं। इसलिए प्रभु की कृपा प्राप्त करने के लिए जीवन में समर्पण का भाव होना चाहिए।
उक्त उद्गार लोअर टैंकबंड स्थित भाग्यनगर गौ सेवा सदन में माहेश्वरी सेवा संघ, माहेश्वरी महिला मंडल, माहेश्वरी युवती संगठन, माहेश्वरी युवा संगठन, सिकंदराबाद द्वारा आयोजित नानी बाई को मायरो के प्रथम दिवस कथावाचक पं. पवन कुमार मालोदिया (वरंगल) ने व्यक्त किये। उन्होंने कहा कि निष्काम मन से किया गये कार्य के लिए तिथि वार निर्धारित नहीं रहता। भक्तों में सांवरिया सेठ के प्रति सच्ची भावना-श्रद्धा है, जिस वजह से नानी बाई को मायरो का आयोजन जारी रहता है।
नरसी मेहता की यह कथा है तो गुजरात की, लेकिन इसका प्रचलन राजस्थान की मारवाड़ी भाषा में अधिक हुआ। नरसी महाराज की कथा लिखने वाली राजस्थान की मेड़ता की मीरा बाई है। मीरा बाई ने नरसी महाराज के चरित्र को सच्चे मन, श्रद्धा भाव के अनुसार लेखन बद्ध किया और फिर अपना जीवन नरसी के चरित्र के अनुसार जिया। उन्होंने कहा कि नरसीजी शरीर छोड़कर बैकुंठ गए, लेकिन मीरा बाई नरसी के चरित्र का सहारा लेकर सशरीर भगवान में विलीन हुईं।
यह नरसीजी की कथा व सच्ची भक्ति का प्रभाव है। नरसी मेहता ने अपने आपको पूर्ण रूप से समर्पित कर दिया, इसलिए सांवरिया सेठ किसी न किसी रूप में उनका हर कार्य करने के लिए तत्पर रहते थे। प्रभु की जब भी आवश्यकता होती थी, नरसी मेहताजी राग केदार गाते थे और फिर प्रभु किसी न किसी रूप में प्रकट होकर सहायता करते थे। महाराज ने कहा कि नरसी महाराज के कई जन्म विभिन्न रूप में हुए।
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नरसी मेहता के पूर्व जन्म और राजा से सिंह बनने की कथा
पहले वह राजा थे और ब्राह्मण के श्राप से सिंह बने और पीपोजी महाराज के राम नाम के साथ उन्हें अपने पूर्व जन्म ज्ञात हुए और फिर अगले जन्म में नरसी मेहता नागर ब्राह्मण के रूप में पैदा हुए। नरसी का जन्म जूनागढ़ के पास तलाजा गाँव में हुआ। नागर वंश ब्राह्मण बड़े दातारी थे, जिनके यहाँ बड़ा गौधन था, वह काफी संपन्न थे। नरसीजी जन्म से गूंगे और बहरे थे, लेकिन उनकी दादी उन्हें महाशिवरात्रि के दिन शिवजी के मंदिर ले गई, तो एक संत की कृपा से वह बोलने लगे। महाराज ने कहा कि संत की कृपा हो तो प्रभु मिल जाते हैं। ऐसे ही नरसी मेहता को संत का आशीर्वाद मिला और वह भगवान के सच्चे भक्त हो गये।
अवसर पर मुख्य यजमान गोपाललाल-सुमित्रा बंग, सह-यजमान श्रीकुमार-शीतल मोदानी, जानकीलाल कृष्णा संघी, संयोजक राजकुमार सोनी, सह-संयोजक जगन्नाथ भगवानदास जाजू, शिवराज रामकिशोर झँवर, सोहनलाल आनंद कुमार बंग, अध्यक्ष प्रवीण तोष्णीवाल, मंत्री विष्णुकांत बजाज, कोषाध्यक्ष श्रीकुमार मोदानी, उपाध्यक्ष नरेश बाहेती, आनंद कुमार जाजू, सह-मंत्री आदित्य मूंदड़ा, सह-कोषाध्यक्ष वीरेन्द्र सारड़ा, प्रचार मंत्री हेमंत सारड़ा, संगठन मंत्री वासुदेव लाहोटी, परामर्शदाता लड्डू बंग, सलाहकार आदित्य लोया, शिरीष अगीवाल, विजय बजाज, कार्यकारिणी सदस्य राजेश लोया, आनंद इन्नानी, कुणाल बंग, जगदीश लोया, शिव मूंदड़ा, अभिनव जाखोटिया, लक्ष्मीनिवास सत्यनारायण मूंदड़ा ने सहयोग प्रदान किया।
अवसर पर गोविंदलाल जगदीश दरक, मुरलीधर बसंती बाई इन्नानी, अर्जुनदेव मुकेश झँवर, भगवानदास अश्विन लोया, जयनारायण वेणुगोपाल झँवर, गोविन्द प्रसाद विनोद कुमार बिरला, डॉ. जुगल किशोर जयप्रकाश बंग, हीरालाल बंसीलाल मालानी, किशोर तनुष गांधी, गोवर्धन गिरधारीलाल अट्टल, मुन्नालाल आशीष बंग, श्रीगोपाल विशाल मोदानी, बालमुकुन्द श्यामसुन्दर बंग, संदीप मोदानी, नारायणदास विनीत बाहेती, नथमल हरिकिशन बंग, कमल शुभम भांगड़िया, प्रभुदयाल यश जाखोटिया, रामकिशोर कृष्णकांत मोदानी, पन्नालाल हनुमानप्रसाद मोहता, बद्रीविशाल रमेश खडलोया, रामविलास आनंद कुमार राठी, लालचंद डागा, प्रकाश पितलिया, रंगदेवी तोष्णीवाल परिवार, कैलाश राजेश लोया, हेमंत सारड़ा व अन्य ने सहयोग प्रदान किया।
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