संविधान दिवस : हमारा संविधान, हमारा स्वाभिमान
छब्बीस नवंबर सिर्फ एक तिथि नहीं हैं ,बल्कि भारतीय लोकतंत्र की आत्मा को गौरवान्वित करने का दिवस है। 26 नवंबर, 1949 में संविधान सभा ने इसी तिथि को कानूनी दस्तावेज़ को अंगीकृत किया था, जिसने एक विविध, जटिल और विशाल देश को राजनीतिक स्थिरता और सामाजिक दिशा दी। केंद्र सरकार द्वारा सन् 2015 में इसको संविधान दिवस घोषित करना उसी सतत प्रयास का समग्र दृष्टिकोण है ताकि नागरिक संविधान के मूल्यों एवं आदर्शों को केवल पाठ्यपुस्तक का अध्याय न समझें, बल्कि जीवन, व्यवहार व्यवहार एवं अपने व्यक्तित्व का आभार बनाएं।
संविधान की उद्देशिका: आदर्श, विचार और मौलिक सिद्धांत
संविधान की उद्देशिका में उल्लेखित विचार, आदर्श एवं मौलिक सिद्धांत भारत के मूलभूत प्रकृति को निर्धारित करती है। संविधान के उद्देशिका जो शासन के लिए प्रकाश स्तंभ होता है जिसको शासक लोकतांत्रिक संस्कृति में क्रियान्वित करता है। संविधान की उद्देशिका हम भारत के लोग से शुभारंभ होती है जो यह संप्रेषित करता है कि भारत एक संप्रभु राष्ट्र (जो बाह्य और आंतरिक रूप से स्वतंत्र), समाजवादी (राज्य के संसाधनों पर सार्वजनिक नियंत्रण), पंथनिरपेक्ष (राज्य का अपना कोई निजी धर्म नहीं हैं, अर्थात राज्य धर्म के विषय में तटस्थ है), लोकतांत्रिक गणराज्य (राज्य का संवैधानिक प्रधान प्रमुख जनता के द्वारा निर्वाचित हो) एवं हिंदू राष्ट्र (व्यक्ति के बजाय राष्ट्र) की ओर अग्रसर है।
लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने के लिए यह संविधान स्वयं को आत्माप्रीत किया है और राज्य को प्रत्येक नागरिक एवं व्यक्ति के साथ समानता(समाजवाद का सार तत्व ), स्वतंत्रता(उदारवाद का सार तत्व), न्याय एवं बंधुता (समुदायवाद का सार तत्व) बनाए रखने का विचार प्रतिपादित करता है। भारत के संविधान की प्रस्तावना हम भारत के लोग शब्दों से प्रारंभ होती हैं, जो इस तथ्य को स्पष्ट करता है कि भारत के संविधान का स्रोत जनता है और राजनीतिक सत्ता अंतिम रूप से जनता में निहित है, जिसका प्रयोग करते हुए जनता ने अंतकरण से संविधान का निर्माण एवं अपनी पसंद की शासन व्यवस्था को अंगीकार किया है।
भारत में अंतिम सत्ता और समस्त शक्तियों का स्रोत जनता है
प्रस्तावना का अंतिम भाग भी इस संकल्पना की पुष्टि करता है कि भारत में अंतिम सत्ता स्रोत जनता है और समस्त शक्तियों का स्रोत जनता ही है। भारत का संविधान संघात्मक ढाँचे, संसदीय प्रणाली और मौलिक अधिकारों का संतुलित स्वरूप प्रस्तुत करता है, जो विश्व में अद्वितीय है। संविधान ने न केवल सत्ता पर नियंत्रण स्थापित किया, बल्कि नागरिकों को अधिकारों और अवसरों की समानता भी दी है। यह व्यवस्था किसी एक वर्ग या क्षेत्र के हित में नहीं, बल्कि एक ऐसे समावेशी भारत की कल्पना पर आधारित है ,जो विविधता को बोझ नहीं, ऊर्जा मानता है।
संविधान दिवस केवल एक समारोह ही नहीं बल्कि यह आत्मचिंतन का अवसर भी है। हमारे लोकतंत्र को आज जो चुनौतियाँ घेर रही हैं – राजनीतिक ध्रुवीकरण, सूचना का शोर, संस्थाओं के प्रति घटता सम्मान, लोकतंत्र, संविधान एवं स्वतंत्र संवैधानिकनिकाय निर्वाचन आयोग ये सब हमें बताती हैं कि संविधान को दोबारा पढ़ने और समझने की जरूरत क्यों है?
अधिकारों की चर्चा तो जोर-शोर से होती है, पर कर्तव्यों की बात अक्सर पीछे छूट जाती है। लोकतंत्र अधिकारों के साथ कर्तव्यों के नियंत्रण एवं संतुलन पर ही टिकता है।
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डिजिटल युग में संविधान की स्वतंत्र और दबावमुक्त स्थिति
विधि का पालन, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा, विविधता का सम्मान और राष्ट्रीय एकता – ये बातें संविधान के प्रावधानों से भी ज़्यादा एक सामाजिक अनुशासन का हिस्सा हैं। भारत में संसद (विधायिका) को सर्वोच्च स्थिति प्राप्त हैं। वह राष्ट्र की सर्वोच्च पंचायत है एवं भारत के लोगों की निष्ठा का सर्वोच्च मंदिर है। संसद लोकसदन (लोकसभा) और राज्यों की परिषद (राज्यसभा) की अभिव्यक्ति है। संसद मौलिक रूप में जनता का प्रतिनिधित्व करती है। संसद को विधि बनाने, कार्यपालिका को प्रासंगिक व प्रभावी नियंत्रण स्थापित करने, राष्ट्र के खर्चों पर नियंत्रण रखने और संवैधानिक प्रतिनिधियों के व्यवहारों का नियंत्रण करती है। भारत में विधायिका भी संविधानवाद के अंतर्गत कार्य करती है।
आज भारत तकनीक और सूचना के नए युग में प्रवेश कर चुका है लेकिन इसके साथ नई चुनौतियाँ भी सामने आई हैं। सोशल मीडिया पर फेक न्यूज़, डेटा गोपनीयता का संकट, साइबर अपराधों के बढ़ते स्वरूप और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर ध्रुवीकरण। इन सभी विषम परिस्थितियों में भी संविधान अपने स्वतंत्र एवं दबावमुक्त स्थिति में है। ये केवल तकनीकी समस्याएँ नहीं, बल्कि सीधे-सीधे संवैधानिक सवाल हैं। यह तय करना कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कहाँ तक हो और उसकी क्या सीमाएँ हो?
वर्तमान में पहले से कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण हो चुका है। अनुच्छेद 19(2) हमें यही याद दिलाता है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता असीमित नहीं होती; उसे सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय हितों के साथ संतुलित करना पड़ता है। भारत की विधायिका (संसद ) समय के साथ- साथ आने वाली विभिन्न आकस्मिक समस्याओं से निवारण के निरंतर नए एवं तार्किक नवोन्मेषी कर रही है। संसद राष्ट्रीय परंपरा के मजबूती के लिए कई पद्धति और पारस्परिक परंपराओं को विकसित किया है।
संसदीय परंपरा में विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका का समन्वय
आधे घंटे (30 मिनट ) के चर्चा, अल्पकालिक चर्चा, ध्यानाकर्षण प्रस्ताव, लोकसभा में नियम, 377 और राज्यसभा में विशेष उल्लेख के साथ मामलों को उठाया जाना इत्यादि भारतीय नवोन्मेष की देन है। लोकतंत्र और संसदीय परंपरा में विधायिका कार्यपालिका और न्यायपालिका सभी अपने संवैधानिक दायरे में रहकर अपने दायित्वों का सम्यक निर्वहन करते हैं और संवैधानिक दायरे में रहकर प्रत्येक अंग एक-दूसरे की सीमाओं को समुचित सम्मान करते हैं।
यही लोकतांत्रिक सार की आत्मा है। भारत में संसद का मौलिक उपादेयता विधि बनाना, प्रशासन की निगरानी करना, बजट पारित करना, लोक समस्याओं का निवारण करना और राष्ट्रीय नीतियों पर विचार- विमर्श करना है। भारत के संविधान के अंतर्गत संघीय मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से निम्न सदन/ लोकप्रिय सदन के प्रति उत्तरदाई होती है। संसद अलग-अलग मंत्रालयों से संबंधित अनुदानों की मांगों पर चर्चा और मतदान करने के पश्चात राष्ट्र – राज्य के बजट को अनुमोदित करती हैं।
आज जब भारत विकसित देश बनने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहा है, तब यह और भी ज़रूरी है कि नागरिक संविधान के मूल्यों एवं आदर्शों को अपने व्यवहार में उतारें। किसी भी देश की प्रगति केवल आर्थिक विकास से नहीं बल्कि उसकी नागरिक संस्कृति और संवैधानिक चेतना से भी मापी जाती है। संविधान दिवस हमें यह समझने का अवसर देता है कि लोकतंत्र केवल चुनावों की मशीनरी से नहीं चलता। यह विचारों की विविधता, संवाद की संस्कृति और संवैधानिक निष्ठा से जीवित रहता है।
-डॉ.बालमुकुंद पांडे
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