दुनिया मुट्ठी में करने के बावजूद आदमी मुश्किल में है : वहीद पाशा क़ादरी
हैदराबादी हास्य दुनिया भर में लोकप्रिय है। विशेषकर जहाँ उर्दू-हिन्दी की यह विशेष शैली सुनी जाती है, सामान्य बातचीत में भी हास्य फूट पड़ता है। इसी माहौल में दक्कनी और हास्य शायरी के मैदान में कई शायरों ने लोकप्रियता अर्जित की। वर्तमान मंच के शायरों में वहीद पाशा कादरी जान-पहचाना नाम है। वे लगभग तीन दशकों से शायरी कर रहे हैं। हास्य-व्यंग्य के साथ-साथ वे दक्खिनी कविताओं के लिए भी क़ाफी लोकप्रिय हैं। उन्होंने भारत के लगभग सभी प्रमुख शहरों तथा सऊदी अरब, दुबई और अन्य देशों की साहित्यिक यात्राएँ कीं। उनके पिता बेहोश महबूबनगरी भी प्रसिद्ध कवि थे। वहीद पाशा कादरी से साक्षात्कार के दौरान कई महत्वपूर्ण बातों पर चर्चा हुई, जिनके कुछ अंश यहाँ प्रस्तुत हैं-
ऐसा क्या था, जिसने आपको शायरी की ओर आकर्षित किया?
बचपन में जब आंख खुली तो शायरी का माहौल था। पिताजी मुहम्मद अब्दुल क़ादर साहब बेहोश महबूबनगरी के नाम से नातिया शायरी करते थे। 1963 में महबूबनगर से हैदराबाद आए तो यहीं के हो गए। उन्हीं को देखते हुए मैं और मेरे भाई तैयब पाशा क़ादरी ने शायरी को अपनाया। वो भी पिता की तरह बहुत अच्छी नातिया शायरी करते हैं। मैं बचपन से ही फिल्मी गीतों की पैरोडी किया करता था।
शायरी विरासत में मिल तो सकती है, लेकिन उसके लिए कला-कौशल की भी जरूरत होती है?
आपकी बात बिल्कुल सही है। दरअसल पिताजी नातिया शायरी करते थे, जो पैग़ंबर की शान में होती है। मेरी तबीयत में हास्य के तत्व अधिक थे। मैं अपने दोस्तों के बीच अक्सर हास्य का प्रदर्शन करता था। भाई तैयब पाशा ने मुझे प्रोत्साहित करते हुए कहा कि हास्य में शायरी करने वाले बहुत कम हैं, इसमें अभ्यास करना चाहिए। विशेषकर उन्होंने मेरी पैरोडी करने की आदत की ओर इशारा किया था।
शुरू में किन गीतों की पैरोडी आपने की?
फिल्म उपकार याद होगी आपको। मेरे देश की धरती… पर बनी मेरी पैरोडी को लोगों ने बहुत पसंद किया था- मेरे देश की धरती, सो उगले, उगले पालक मेथी…। एक और गीत था, अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों.. पर मैंने कहा था,
खा चुके सारी जनता का धन साथियों, अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों।
कुछ कुछ होता है फिल्म के गीत पर लिखी पैरोडी भी काफी पसंद की गयी थी-
वो चाय लाये, मुझको पिलाये,
ना जाने उसमें क्या-क्या मिलाए,
हाथ में मेरे पानी का लोटा है,
क्या करूँ हाये कुछ कुछ होता है।
राजा हिंदुस्तानी वाले गीत पर भी आप पैरोडी किया करते थे?
देखो जी देखोजी आना नहीं,
दुबई छोड़ के, दुबई छोड़के।
परदेसी मेरे यारा ख़ूब कमाना,
पीना न खाना मुझे पैसे भिजाना।
रोज़ाना हम सब होटल को जाते हैं
मुर्ग़े मुसल्लम और बिरयानी खाते हैं।
घर में जब भी दाल हमारे बनती है,
क्या बतलाऊं आप बहुत याद आते हैं।
परदेसी मेरे यारा खुद दाल खाना,
खुद दाल खाना हमें मुर्गा खिलाना… परदेसी..
देखो जी देखोजी आना नहीं, दुबई छोड़ के, दुबई छोड़के।
जब आपने मुशायरे पढ़ने शुरू किये थे तो किस तरह का माहौल था और अब क्या परिवर्तन आया है?
जब सुनने वाले बहुत अच्छे थे, कुछ कहने में शायर को मज़ा आता था। लोग छोटी-छोटी बातों को पकड़ लेते थे। शायर अपने स्तर पर कहता था और श्रोता उससे मनोरंजित एवं भावविभोर होते थे, लेकिन आज शायर को श्रोता के स्तर पर आकर बात कहनी पड़ती है।
आज आपको ऐसा क्यों लगता है कि शायर को श्रोता स्तर पर उतरना पड़ रहा है?
बहुत से कारण हैं, सबसे पहले तो उस युग में फिल्में और शेर-ओ-शायरी के अलावा बहुत कम माध्यम थे। मुशायरे मनोरंजन का प्रमुख माध्यम थे। बड़ी संख्या में लोग रात भर मुशायरा सुनते थे। आज दुनिया लोगों की मुट्ठी में आ गई है। मोबाइल सब कुछ बन गया है और लोग जो उसका स्टैंडर्ड है, उसी पर खुश हैं।
तो आप कहना चाहते हैं कि मोबाइल ने उनका स्तर गिरा दिया है?
नुकसान तो हुआ है, मोबाइल किताबें खा गया है और मनोरंजन के बहुत सारे माध्यम इसकी नज़र हो गये हैं। देखा जाए तो सिक्के के दो पहलू होते हैं, इससे कुछ लोग जितना चाहिए, उतना ही लेते हैं, लेकिन कुछ तो पूरी तरह से उसके काबू में चले गए हैं।
क्या आपको लगता है कि हैदराबाद में हास्य की शायरी का पहले जैसा माहौल नहीं रहा?
लिखने वाले तो कम हुए हैं। दरअसल हास्य कहना टेढ़ी खीर है। संजीदा शायरी आसानी से की जा सकती है, लेकिन हास्य के लिए बहुत ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है। यह हालत केवल हैदराबाद या उर्दू की नहीं है, सारे देश में और लगभग सभी भाषाओं में है।
आज इंसान के पास ऐश-ओ-आराम की बहुत सारी चीज़ें हैं और जब चाहे वह चीज़ें घर बैठे मंगा सकता है। ऐसे में आपको क्या लगता है कि आदमी की ज़िंदगी आसान हो गई है या मुश्किल?

मैं कहता हूँ, मुश्किल होती जा रही है, जबकि आदमी को लग रहा है कि ज़िंदगी आसान हो रही है। जब बोरियत बढ़ती जाएगी, उसकी जिंदगी में अधिक कठिनाइयां नहीं रहेंगी, तो ज़िंदगी का मज़ा ही क्या रह जाएगा? हैदराबादी में कहूँ, तो आदमी ऐदी होता जा रहा है, जो अच्छी बात नहीं है।……
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