मशीनें आदमी का विकल्प नहीं बन सकतीं – के. नल्लाथंबी
गुवाहाटी में डॉ. भुपेन हज़ारिका की जन्म-शताब्दी के अवसर पर भारतीय भाषाओं में हजारिका की जीवनी के लोकार्पण-समारोह में पहुँचा तो वहाँ साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित तमिल और कन्नड़ के ख्यात अनुवादक और लेखक के. नल्लाथंबी से मुल़ाकात हुई। के. नल्लाथंबी लेखक, कवि और प्रसिद्ध अनुवादक के साथ भाषा और संस्कृतियों में मेलजोल के प्रबल समर्थक रहे हैं। सत्तर से अधिक पुस्तकों का अनुवाद उन्होंने तमिल और कन्नड़ भाषाओं में किया है।
वे इन दोनों भाषाओं में मौलिक लेखन भी करते हैं। उन्होंने दोनों भाषाओं के साहित्य के बीच सेतु का काम किया है। कन्नड़ लेखक विवेक शानबाग के उपन्यास गाचर गोचर और नेमिचंद्रा के यादवशेम जैसे कई प्रसिद्ध लेखकों की कृतियों का तमिल में अनुवाद किया है। कहानीकार के रूप में उनका कहानी-संग्रह अत्तर तमिल और कन्नड़ के अलावा तेलुगु भाषा में भी पसंद किया गया। कोशी कवितेगलु शीर्षक से कन्नड़ में कविता-संग्रह प्रकाशित हुआ। अनुवाद के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। अनुवाद पर उनसे हुई बातचीत के कुछ अंश प्रस्तुत हैं-
दक्षिण भारतीय भाषाओं और हिन्दी में अनुवाद का किस तरह काम हो रहा है?
जितना होना चाहिए, उतना नहीं हो रहा है, फिर भी होना शुरू हुआ है, यह बहुत अच्छी बात है। अभी बेंग्लुरु में कन्नड़ से हिन्दी अनुवाद में कुछ युवा सामने आये हैं। इससे भविष्य की संभावनाएं बढ़ी हैं।
क्या आपको लगता है कि लोग अनुवाद को गंभीरता से लेते हैं?
अनुवाद कोई आसान काम नहीं है। इसके पीछे क्या चलता है, अधिकतर लोग नहीं जानते। लोग समझते हैं कि चलिए अनुवाद पढ़ लेते हैं। इसके पीछे बहुत ज्यादा मेहनत होती है। दो भाषाओं के बीच एक मंथन होता है। दो भाषाओं की संस्कृति आपस में मिलती है। भाषाओं की जीवन-शैली, खाद्य-संस्कृति और विश्वास सहित बहुत सारी बातें इससे जुड़ी होती हैं। यह केवल शब्दों या अर्थ का आदान-प्रदान नहीं होता है, बल्कि इसमें कई चीज़ें समाहित होती हैं।
कई युवा अनुवाद के क्षेत्र में आ रहे हैं, यह बहुत अच्छा संकेत है, लेकिन मैं महसूस करता हूँ कि दक्षिण भारतीय साहित्य को उत्तर भारतीय भाषाओं में अनूदित करने की गतिविधियों की तुलना में उत्तर भारतीय साहित्य से दक्षिण भारतीय भाषाओं में अनुवाद करने का काम अधिक हुआ है। यह परंपरा काफी पुरानी भी है।
आपको दक्षिण भारतीय भाषाओं से उत्तर भारतीय भाषाओं में अनुवाद की कमी के क्या कारण नज़र आते हैं?
मुझे ताज्जुब होता है कि दक्षिण भारतीय लोगों में जिस तरह हिन्दी, बांगला एवं अन्य उत्तर भारतीय भाषाएं सीखने की इच्छा शक्ति देखी जाती है, उस तरह की रुचि उत्तर भारतीयों में दक्षिण भारतीय भाषा सीखने के प्रति नहीं दिखाई देती। हो सकता है कि यह उनके लिए कठिन हो या यह भी हो सकता है कि वे अपनी भाषाओं के वर्चस्व भावना पालते हों।
हो सकता है कि उत्तर भारत में एकाधिक भाषाओं के सीखने का माहौल भी अधिक उत्साहजनक नहीं है। यह बात भी माननी पड़ेगी कि दक्षिण में शिक्षा का माहौल उत्तर से कुछ बेहतर स्थिति में है। भाषाओं को जानने से लाभ के प्रति जागरुकता की कमी भी एक कारण हो सकती है।
आपकी जनरेशन में हिन्दी और तमिल या हिन्दी कन्नड़ में अनुवाद के काम से आप कितने संतुष्ट हैं?
उतना अधिक काम नहीं हुआ है, बल्कि ऐसा करने वाले लोग भी उंगलियों पर गिने जा सकते हैं। आज मशीनी अनुवाद पर काफी चर्चा हो रही है। इस बारे में आप क्या विचार रखते हैं? अंतत: यह मशीन तो आदमी ने ही बनायी है। मशीन आदमी का दिमाग़ नहीं बना सकती है। मैं यह नहीं कहता कि मशीनी अनुवाद काम नहीं करेगा, बल्कि साठ से सत्तर प्रतिशत काम कर सकता है, लेकिन प्रासंगिक या विषय-संगत अर्थ का अभाव हो सकता है।
कई बार भावनात्मक अभिव्यक्ति वाले शब्द या स्थानीय संस्कृति को प्रतिपादित करने वाले शब्दों का मशीनी अनुवाद संभव नहीं हो पाता है। हो सकता है कि मशीन यह भी सीख जाएगी, लेकिन इसके लिए उसे दस-पंद्रह साल और लग सकते हैं, लेकिन आज अधिक सटीक नहीं है। मशीन को उत्पादन और निर्माण में छुपे अलग-अलग अर्थ को समझने में देर ज़रूर लगेगी। मशीन को रिश्तों की समझ भी आसानी से नहीं होती। मशीन आदमी का सहयोग कर सकती है, लेकिन आदमी का विकल्प नहीं हो सकती। मैंने अंग्रेज़ी से तमिल में अनुवाद करते हुए कई तरह की समस्याओं का अनुभव किया है।
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मुहावरों और कहावतों का अनुवाद भी मशीन से संभव नहीं हो पाया है?

इसमें कई तरह की कठिनाइयां हैं। किसी भी भाषा के मुहावरे और कहावतें अपनी संस्कृति और मिट्टी की खुशबू लिए होते हैं। हर भाषा में अनुभूतियों और तत्काल उत्पन्न होने वाली भावना को अभिव्यक्त करने के लिए इनका उपयोग होता है, यह आवश्यक नहीं है कि उसी तरह का मुहावरा अन्य भाषा में हो, लेकिन उससे मिलते-जुलते मुहावरों की जानकारी अनुवादक को होनी ज़रूरी है। इसलिए दोनों भाषाओं की संस्कृति के बीच सेतु बनने वाले अनुवादक को भाषाओं के शाब्दिक अर्थ तक सीमित न रहते हुए, उसमें रचे-बसे आत्मीय अर्थ तक पहुँचना ज़रूरी है।
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