देश को बहु-भाषी लेखकों की ज़रूरत : डॉ. पत्तिपाक मोहन
डॉ. पत्तिपाक मोहन तेलुगु भाषा-साहित्य के आलोचक, कवि और विशेषकर बाल-लेखक के रूप में प्रसिद्ध हैं। वे भारत सरकार के नेश्नल बुक ट्रस्ट (एनबीटी) में तेलुगु के सहायक-संपादक हैं। उनका संबंध करीमनगर जिले से है। एक बुनकर परिवार में जन्मे मोहन ने तेलुगु साहित्य में डॉक्टरेट की उपाधि अर्जित की है। उन्होंने अपने जीवन की शुरूआत स्कूल शिक्षक के रूप में की थी फिर तभी से बच्चों के लिए लिखने लगे और निरंतर लिख रहे हैं। उनकी अब तक मौलिक एवं अनुवाद सहित 75 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। वे साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत लेखक हैं। उनके कथा एवं काव्य साहित्य का अनुवाद हिन्दी सहित अन्य भाषाओं में हुआ। बाल-साहित्य पर उनसे हुई बातचीत के कुछ अंश यहाँ प्रस्तुत हैं।
बाल साहित्य ही क्यों?
इसके कई कारण हैं। मैं बचपन से ही किताबों की ओर आकर्षित था। मेरी बुआ शारीरिक रूप से दिव्यांग थीं। उनकी व्यस्तता के लिए घर में कई सारी पत्रिकाएं मंगाई जाती थीं। दादाजी का थिएटर था, सो हमें लगभग हर सप्ताह सिनेमा देखने का अवसर मिलता था। बुनकरों का परिवार था, सो घर की महिलाएँ धागा कातते हुए, बच्चों को कहानियाँ सुनाया करती थीं। दादाजी के साथ आस-पास के मंदिरों में जाना, नदी में नहाना, कीर्तन करना आदि गतिविधियाँ बचपन के जीवन का हिस्सा थीं।

मैंने सातवीं कक्षा में मतदान के महत्व पर एक कविता लिखी थी। उन दिनों तेलुगु पत्रिका चंदामामा बड़े चाव से पढ़ा करता था। कविताओं के अलावा निबंध और आलोचना मेरा मूल विषय रहा, लेकिन जब शिक्षक के रूप में नियुक्त हुआ, तो महसूस हुआ कि बालकों में रुचि बढ़ रही है। यहीं से मैंने बच्चों के लिए लिखना शुरू किया। एक और घटना का जिक्र करना चाहूँगा कि शिक्षक के रूप में मैं ग्रामीण बच्चों को हैदराबाद की सैर पर लाया था। उस समय टैंकबंड पर लगे पुतलों को देखकर बच्चों ने उनके बारे में कई सवाल पूछे। उस दिन मुझे महसूस हुआ कि बच्चों के लिए जानकारी से भरपूर सामग्री लिखने की आवश्यकता है।
यह भी पढ़ें… गैलरी से आगे की चीज है कला – अन्नपूर्णा मडिपडिगा
क्या बाल-साहित्य रचना सामान्य साहित्य से कुछ अधिक कठिन है?
बिल्कुल, बाल-साहित्य लिखना आसान नहीं है, और तो और, बाल-साहित्यकार को बड़ी जिम्मदारी से लिखना पड़ता है। सामान्य साहित्य में कुछ गलतियाँ हों तो अधिक फर्क नहीं पड़ता, लेकिन यदि बच्चों के लिए लिखने वाले ने कोई ग़लती की तो उसका प्रभाव आगे की पीढ़ी पर पड़ सकता है। बच्चों के लिए लिखना है, तो उनके स्तर तक जाना होगा। यह बात भी याद रखनी होगी कि बच्चों का स्तर बड़ों के स्तर से ऊंचा होता है। सौ रुपये किसी वयस्क को दिये जाएं तो वह कुछ ही देर में चाय-पानी में खर्च कर देगा, लेकिन उसी सौ रुपये से बच्चे कल्पना के आकाश में चंद्रमा तक पहुंच सकते हैं।
बाल-साहित्य की वर्तमान स्थिति के बारे में आप क्या कहना चाहेंगे?
जबसे साहित्य अकादमी ने बाल-साहित्य पर पुरस्कार देना शुरू किया है, बहुत सारे लोग बच्चों के लिए लिखने लगे हैं, लेकिन मैं पलट कर देखता हूँ तो पाता हूं कि जब मनोरंजन के इतने सारे साधन नहीं थे, बाल-साहित्य की स्थिति काफी बेहतर थी। अस्सी के दशक के अंत या नब्बे के प्रारंभिक वर्षों तक बड़ी संख्या में बाल-पत्रिकाएं प्रकाशित होती थीं और घरों में मंगाई जाती थीं। बाल-साहित्य का सम्मान भी था। घर-घर में टीवी और मोबाइल फोन तथा स्मार्ट ऐप्स के कारण बच्चों की दुनिया बदल गई है। ऐसे में नई परिस्थितियों में बच्चों के लिए लिखना बड़ी चुनौती हो गई है। आज रंगापुरम के रामैया की कहानियाँ नहीं चलेंगी, नये परिवेश के अनुसार लिखना पड़ेगा। बाल-साहित्यकारों को अपडेट होना पड़ेगा। उन्हें अपने घर व आस-पास के बच्चों की गतिविधियों को देखकर लिखना होगा।
क्या बाल-साहित्य भी राजनीति से प्रभावित होता है?
बच्चों के लेखन में राजनीति का अधिक स्थान नहीं होता है। भारत में बच्चों के लिए रामायण, महाभारत, बाईबल और क़ुरान तथा पौराणिक कहानियाँ ही लिखी जा रही हैं। ऐसे में चुनौतियाँ बहुत हैं। पिज्जा खाने वालों को पुलिहोरा खिलाना मुश्किल है। विभिन्न वादों की जानकारी युक्त साहित्य उनके लिए लिखा जा सकता है।
आप सिनारे के बहुत नज़दीक रहे, क्या आपको नहीं लगता है कि भारतीय भाषाओं को जोड़ने के लिए उन जैसे महापुरुषों की आवश्यकता है?
भारत के लिए ऐसे लोगों की आज पहले से अधिक आवश्यकता है। हमारी पीढ़ी में ऐसे लोगों की कमी है। जीलानी बानो या नारायण रेड्डी जैसे साहित्यकारों ने देश की विभिन्न भाषाओं में सेतु का काम किया है। हालांकि आज भी कुछ साहित्यकार हैं, नलिमेला भास्कर को 14 भाषाएं आती हैं, लेकिन वे 10 भाषाओं में काम कर रहे हैं। साहित्य अकादमी ने उन्हें पुरस्कृत किया है। वे करीमनगर के ही हैं। यह मैं ज़रूर कहना चाहूँगा कि देश को ऐसे लेखकों की आवश्यकता है, जो एकाधिक भाषाओं में काम कर रहे हैं।
विश्व की किन भाषाओं में बाल-साहित्य बहुत ही संपन्न और अनुकरणीय है?
भारतीय भाषाओं में वैश्विक स्तर की तुलना में बाल-साहित्य अधिक उपलब्ध नहीं है। एनबीटी में रहते हुए मैंने कई देशों की यात्रा की। मैंने मैक्सीको में बच्चों के लिए साहित्य का अच्छा माहौल देखा है। कोरियन में बहुत बढ़िया बाल-साहित्य है। श्रीलंका भी इस मामले में काफी बेहतर है। वहाँ बौद्ध सिद्धांतों को बच्चों तक पहुँचाने के लिए कई लेखक लिख रहे हैं।

अब आपके लिए डेली हिंदी मिलाप द्वारा हर दिन ताज़ा समाचार और सूचनाओं की जानकारी के लिए हमारे सोशल मीडिया हैंडल की सेवाएं प्रस्तुत हैं। हमें फॉलो करने के लिए लिए Facebook , Instagram और Twitter पर क्लिक करें।



