इजराइल-हमास समझौता, क्या स्वतंत्र फिलिस्तीन राज्य के बिना शांति संभव है?
अब डोनल्ड ट्रंप ने गाज़ा में इजराइल व हमास के बीच दो साल से चल रहे युद्ध पर विराम लगाया है (नोबेल शांति पुरस्कार के लालच में), लेकिन वह भी इस क्षेत्र की खूनी प्रवृत्ति को बदलने में नाकाम रहे हैं। इजराइल संसद को संबोधित करते हुए उन्होंने नये मध्य पूर्व में ऐतिहासिक सुबह की घोषणा अवश्य की है, लेकिन साथ ही इजराइल को आधुनिक हथियार देने का वायदा भी किया। कमाल है, आप हमास से तो हथियार त्यागने की उम्मीद करते हो (जिससे उसने इंकार कर दिया है) लेकिन इजराइल को हथियार देना चाहते हो, क्या यह कसाई द्वारा जानवर को रस्सी से बांधकर काटने जैसा कृत्य नहीं है?
हमास ने अंतिम 20 जीवित बंधकों को रिहा कर दिया है और लगभग 2,000 फिलिस्तीनी भी इजराइल की जेलों से आज़ाद हो गये हैं। आख़िरकार दो साल बाद डरावने सपने का अंत हुआ है। लोग अपने घर वापस आये हैं, लेकिन सभी के चेहरों पर मुस्कान नहीं लौटी है। युद्ध का अंत हमेशा ही आशावादी होने का समय होता है। लोग राहत की सांस लेते हैं, ख़ुशी के फव्वारे फूट उठते हैं और एक प्रकार की सामूहिक भूलने की बीमारी पैर पसारने लगती है कि कोई उन खूनी दिनों को याद नहीं करना चाहता है।
जब समाज शांत दिनों की तरफ बढ़ने लगते हैं, तो कोई यह याद नहीं करना चाहता कि जंग क्यों शुरू हुई थी और इसके बजाय वह पुनर्निर्माण, योजना में निवेश करने लगते हैं, बेहतर भविष्य के सपने देखते हुए। इसके बावजूद पश्चिम एशिया में उत्साह के दिन हमेशा ही गिनती के रहते हैं। वर्तमान समझौता इस बात की गारंटी नहीं है कि टकराव फिर से जल्द आरंभ नहीं हो सकता।
दरअसल जब तक फिलिस्तीन को राज्य का दर्जा दिये जाने का विरोध होता रहेगा और यह बेवकूफी की मांग उठती रहेगी कि हमास से हथियार गिरवा दिये जाये व इजराइल को आधुनिक हथियारों से लैस किया जाये, तब तक पश्चिम एशिया में स्थायी शांति की कल्पना करना ही फि़ज़ूल है।
इजराइल सुरक्षा और फिलिस्तीन राज्य विरोध विवाद
हालांकि 2 नवंबर 1917 की बालफौर घोषणा में इजराइल राज्य के गठन का कोई प्रस्ताव नहीं था, केवल यहूदियों को फिलिस्तीन में बसाने की बात थी और वह भी फिलिस्तीनियों की अनुमति के बिना यानी घोषणा पूर्णत एकतरफा थी। लेकिन आज जब इजराइल को अपने अस्तित्व की रक्षा करने के अधिकार की वकालत की जाती है तो फिलिस्तीन राज्य के गठन का विरोध करना न्यायोचित कैसे हो सकता है? जबकि 1948 में उनकी ही ज़मीन पर जबरन कब्जा करके इजराइल को थोपा गया। पश्चिम एशिया का इतिहास हमें बताता है कि शांति व सुनहरे भविष्य के वायदे जो नोबेल शांति पुरस्कार के स्वयंभू दावेदार करते हैं, उनकी सोच पर जल्द ही (बल्कि बहुत जल्द) कबीलाई युद्ध के बादल छाने लगते हैं।
अमेरिका के अनेक राष्ट्रपति पश्चिम एशिया में शांति बहाली के नाम पर नोबेल शांति पुरस्कार के विजेता बन चुके हैं। लेकिन उनमें से एक ने भी इजराइल को हथियार सप्लाई करना बंद नहीं किया बल्कि दूसरे देशों पर अजीबो-गरीब पाबंदियां लगायी हैं। मसलन लेबनान को वायु सेना रखने से वंचित किया हुआ है, नतीजतन इजराइल जब चाहता है लेबनान पर हवाई हमला कर देता है और पश्चिम एशिया में तनाव बना रहता है।
अब डोनल्ड ट्रंप ने गाज़ा में इजराइल व हमास के बीच दो साल से चल रहे युद्ध पर विराम लगाया है (नोबेल शांति पुरस्कार के लालच में), लेकिन वह भी इस क्षेत्र की खूनी प्रवृत्ति को बदलने में नाकाम रहे हैं। इजराइल संसद को संबोधित करते हुए उन्होंने नये मध्य पूर्व में ऐतिहासिक सुबह की घोषणा अवश्य की है, लेकिन साथ ही इजराइल को आधुनिक हथियार देने का वायदा भी किया।
नेतान्याहू और ट्रंप शांति प्रयासों पर विवाद
कमाल है, आप हमास से तो हथियार त्यागने की उम्मीद करते हो (जिससे उसने इंकार कर दिया है) लेकिन इजराइल को हथियार देना चाहते हो, क्या यह कसाई द्वारा जानवर को रस्सी से बांधकर काटने जैसा कृत्य नहीं है? ट्रंप का शांति फ्रेमवर्क युद्धविराम से अधिक पर निर्भर है। यह अमेरिका, अरब राज्यों और यूरोपीय नेताओं के सहयोग व राजनीतिक इच्छा पर आधारित है।
इसमें हमास को हथियारों से वंचित करने की तो इच्छा है, लेकिन बेंजामिन नेतान्याहू को युद्ध अपराधों से मुक्त करने का भी प्रयास है, जैसे निर्दोष बच्चों, महिलाओं व पत्रकारों को कोल्ड ब्लड में मारना कोई जुर्म ही न हो। ट्रंप ने तो इजराइल के राष्ट्रपति से आग्रह किया है कि वह भ्रष्टाचार के मामलों में नेतान्याहू को माफ़ी प्रदान कर दें। नेतान्याहू पर इजराइल की अदालतों में भ्रष्टाचार के तीन अलग-अलग मुकदमे चल रहे हैं, जिनमें उनके खिलाफ अकाट्य साक्ष्य होने का अनुमान है।
कुछ इजराइली विशेषज्ञों का कहना है कि अदालत द्वारा सज़ा से बचने के लिए ही नेतान्याहू ने जंग को इतना लंबा खींचा और बीच में जो युद्धविराम व शांति समझौते के अनेक अवसर आये उन्हें नाकाम किया। नेतान्याहू पर आरोप हैं कि राजनीतिक लाभ पहुंचाने के बदले में उन्होंने रईसों से 2,60,000 डॉलर मूल्य के ज़ेवरात, सिगार, शैम्पेन आदि लिए। नेतान्याहू को इंटरनेशनल कोर्ट ऑ़फ जस्टिस ने भी नरसंहार का दोषी माना है जिस कारण वह अनेक देशों की यात्रा नहीं कर सकते; क्योंकि उनको गिरफ्तार किया जा सकता है।
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स्थायी शांति के लिए फिलिस्तीन राज्य आवश्यक
पिछले दो सालों में एक बात तो एकदम स्पष्ट हो गई है कि जब तक फिलिस्तीन राज्य का गठन नहीं होता, जिसका इजराइल में अब भी विरोध है, तब तक पश्चिम एशिया में स्थायी शांति संभव न हो सकेगी। इस क्षेत्र में विस्तृत सुरक्षा फ्रेमवर्क की आवश्यकता है, जिसकी सफलता सभी स्टेकहोल्डर्स की गुंजाइश पर निर्भर करती है कि वह एक-दूसरे का सम्मान करते हुए साथ रहने के लिए तैयार हो जाएं।
इजराइल-हमास को आतंकी कहे और हमास-इजराइल को आतंकी कहे से कोई लाभ नहीं होने जा रहा है। तथ्य यह है कि हमाम में सभी नंगे हैं और अरब, अमेरिका व यूरोप की भूमिकाएं भी पश्चिम एशिया में अच्छी नहीं रही हैं। ईरान ने भी अपने एक्सिस ऑ़फ रेसिस्टेंस (हिजबुल्ला, हूती आदि) के ज़रिये स्थिति को बद से बदतर करने की ही कोशिश की है। इस सबमें नुकसान फिलिस्तीनियों का ही हुआ है, उन्हें ही अपनी जान-ओ-माल व ज़मीन से हाथ धोना पड़ा है।
इस बहस में एक तथ्य को हमेशा अनदेखा कर दिया जाता है। अरब मूल के यहूदियों और फिलिस्तीनियों (दोनों मुस्लिम व ईसाई) में कभी आपस में कोई मतभेद व टकराव नहीं रहा है बल्कि उन्होंने हमेशा ही सह-अस्तित्व को प्राथमिकता दी है। लेकिन ज़ियोनिस्ट यहूदी हमेशा ही इस भाईचारे के विरोध में रहे हैं।
मोसाद की साज़िश से अरब यहूदियों का पलायन शुरु
यहूदी इतिहासकार प्रोफेसर अवि शलैम ने लिखा है, 1948 में इजराइल के बनने से पहले अरब संसार विशेषकर लेबनान, सीरिया, फिलिस्तीन व इराक में लगभग 8,00,000 यहूदी शांतिपूर्वक रहते थे और इराक का यहूदी समाज इनमें सबसे अधिक प्रभावी था, जो वहां 2,500 वर्षों से रह रहा था। वह बहुत सफल था और स्थानीय लोगों के साथ मिल-जुलकर रहता था। मुस्लिम, यहूदी व ईसाई सह-अस्तित्व संभव व मज़बूत था, वह रोजमर्रा की हक़ीक़त थी।
मगर 1948 में ज़ियोनिस्ट के आने से सब कुछ बदलने लगा। मैं और मेरा परिवार अरब यहूदी थे, हम अरबी बोलते थे। हम कोई अन्य भाषा नहीं बोलते थे। हमारी संस्कृति अरब संस्कृति थी और हमारा फ़ूड स्वादिष्ट व मसालेदार था, वह यूरोपीय फ़ूड नहीं था। हम अरब यहूदी यूरोपीय यहूदियों से भाषा व संस्कृति में एकदम भिन्न थे। मार्च 1950 में इराक की संसद ने क़ानून बनाया कि अगर कोई अरब यहूदी देश छोड़कर जाना चाहता है तो वह एक साल के नोटिस पर एकतरफा वीज़ा के साथ जा सकता है।

गिनती के यहूदियों ने ही जाने के लिए पंजीकरण कराया। अगले वर्ष बगदाद की यहूदी बस्तियों में पांच बम विस्फोट हुए, जिससे पैनिक फैल गया और इजराइल की ओर पलायन होने लगा। 28-वर्षीय यहूदी वकील युसूफ बसरी इन विस्फोटों के लिए ज़िम्मेदार था, जो उसने मोसाद के इशारे पर कराये थे। इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि पश्चिम एशिया में शांति भंग करने के लिए कितनी गहरी साजिशें होती हैं, इसलिए यह कहना गलत न होगा कि ट्रंप के शांति प्रयास कभी भी दम तोड़ सकते हैं।
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