मां को कभी नहीं भूले तोल्स्तोय

लेव तोलस्तोय बहुत बड़े लेखक थे, विश्व के महानतम लेखकों में एक। वे अपनी मातृभाषा रूसी में लिखते थे और उनका लेखन विश्व साहित्य की अनमोल धरोहर है। कलम उनकी खूबसूरत संगिनी थी। वह उनकी जीवन भर हमराही रही। उन्होंने लम्बी उम्र पायी, भरपूर जीवन जिया और खूब लिखा, परंतु वे अपने बचपन को कभी भूल नहीं सके। वे जहां भी गये, खिलंदड़े बालपन की खट्टी-मिट्ठी यादें उनके साथ गयीं। बरसों बाद पकी उम्र में उन्होंने अपने बचपन की प्यारी-प्यारी बिंदास घटनाओं को दर्ज करते वक्त लिखा: क्या केवल स्मृतियां ही हमेशा साथ रहती हैं?

वक्त गुजर जाता है, मगर स्मृतियां गुजरती नहीं। तोलस्तोय की स्मृतियों की कतार में सबसे अव्वल और चटख तस्वीर थी उनकी मां की। मां उन्हें बेतरह प्यार करती थीं और नन्हें लेव भी मां पर जान छिड़कते थे। वे मां के बिना जीवन की कल्पना तक नहीं कर पाते थे। विधि का विधान कि लेव की मां मरीया निकोलायेव्ना तोल्सताया, जो विवाह के पूर्व वोल्कोन्स्काया थी, ज्यादा दिन जियी नहीं। वे बहुत ज्यादा असह्य पीड़ा झेलते हुए मरी। तोलस्तोय अपनी ममतालु मां को कभी भूल नहीं सके।

तोलस्तोय धनाढ्य जमींदार परिवार में जनमे थे। उनका जन्म यास्नाया पोल्याना में हुआ था। वहीं उनका बालपन बीता। यह तोलस्तोय परिवार की पैतृक भू-संपत्ति थी। आज यह इमारत संग्रहालय का रूप ले चुकी है। वहां हम चमड़े से मढ़ा हुआ वह सोफा देख सकते हैं, जिस पर तोलस्तोय का जन्म हुआ था। पिता निकोलाई इल्यीच तोलस्तोय जमींदार थे। लेव बचपन में चंट-चालाकी या निर्ममता से कोसों दूर थे। वे कोमल हृदय व दयालु थे। यही वजह है कि वे खरगोश का शिकार नहीं कर पाते थे।

शालीनता और सादगी से भरी उनकी जीवनशैली

उनके लिये लाठी से चिड़िया मार गिराना तो दूर रहा, उस पर गोली चलाना भी नामुमकिन था। वे जाड़े की शामें खेल-खेल में गुजारते। लेव ने बड़े होकर अपने पिता का बहुत ही तटस्थ और बेबाक चित्रण किया है। पिता निकोलाई उदार, व्यवहार-कुशल, आत्मविश्वास से भरे-पूरे शालीन शख्स थे और उनके चरित्र में भोग-विलास का मिश्रण था। तोलस्तोय अपने पिता के व्यक्तित्व का बखान बहुत विस्तार और बहुत चाव से करते हैं: उनकी पोशाक मौलिक और सजीली होती थी। उनके कपड़े हमेशा बहुत ढीले और हलके होते थे।

उनकी कमीजें हमेशा सबसे बढ़िया क्वालिटी की होती थीं, उनके बड़े-बड़े कफ और कॉलर पीछे की ओर उलटे रहते थे। सच तो यह है कि वह जो कुछ भी पहनते थे वह उनके लंबे गठीले डील-डौल, उनके गंजे सिर और उनकी शांत आत्मविश्वासी चाल-ढाल पर फबता था। वे बहुत संवेदनशील थे, यहां तक कि बहुत जल्दी उनकी आंखों में आंसू आ जाते थे। अक्सर जोर-जोर से कोई किताब पढ़ते वक्त जब वह किसी करूण प्रसंग पर पहुंचते, तो उनकी आवाज कांपने लगती थी और सहज ही उनकी आंखें डबडबा आती थीं और वह झुंझलाकर किताब रख देते थे। उन्हें संगीत से प्रेम था।

मास्को पहुंचकर बदला लेव का रहन-सहन और व्यक्तित्व

बालक लेव के टीचर रयोस्सेल फ्योदोर इवानोविच भी बेहद दिलचस्प व्यक्ति थे। तोलस्तोय ने इनका चित्रण घर पर आने वाले ट्यूटर मास्टर साहब यानी जर्मन कार्ल इवानोविच के तौर पर किया है। वे तोलस्तोय परिवार के साथ रहते थे और नेक इंसान थे। बच्चों से गहरे लगाव के चलते वे लेव के पिता से यह पेशकश करने से नहीं चूकते कि उन्हें फीस मिले या नहीं मिले, मगर उन्हें बच्चों के साथ रहने दिया जाये। लेव अपने रूईभरा गाउन पहने, लाल टोपी और ऐनक लगाये मास्साब को कभी नहीं भूल सके, जो बहुत सलीकेदार थे, जिनका अंतकरण साफ और मन शांत था।

धनाढ्य ज़मींदार के बेटे होकर भी लेव जब मास्को गये तो वे गंवई बालक थे। वहां उन्होंने अपनी प्यारी नानी के लिये जीवन की पहली कविता लिखी। मास्को के अभिजात्य माहौल में लेव का रहन-सहन बदल गया। उनके मास्को के ढब के परिधान पहनने का वृत्तांत अत्यंत रोचक है। वे लिखते हैं: सचमुच मास्को के बहुत ही अच्छे कपड़े थे। दाल-चीनी जैसे हल्के बादामी रंग का ऊंचा कोट, जिसमें पीतल के बटन लगे हुये थे।

‘युद्ध और शांति’ से विश्व साहित्य में अमर हुए तोलस्तोय

बिल्कुल मेरी नाप का बना हुआ था, वैसा नहीं जैसा कि गांव में बनाते थे – कई साल तक बढ़ने की गुंजाइश रखकर। काली पतलून भी कसी हुई थी, उसमें से मांसपेशियां इतनी अच्छी तरह दिखाई देती थीं और वे जूतों को इतनी अच्छी तरह ढंक लेती थीं कि देखते ही बनता था। नन्हें लेव ने खुशी से फुदकते हुये कहा थाः आखिरकार मेरे पास असली फीतों वाली पतलून हो गई। लेव तोलस्तोय ने खूब लिखा। खूब प्रशंसा पाई। सम्मान पाया। उन्होंने वास्तविक जीवन से किरदार उठाये और अपनी कलम के जादू से उन्हें सदा के लिये जीवित, अमर कर दिया। उन्होंने परिवार में पली-बढ़ी दुनेच्का तेम्याशेवा को कात्या बनाकर पेश किया और इस्लेनेव के घर में रही गवर्नेस को फ्रेंच मीमी के रूप में।

डॉ. सुधीर सक्सेना
डॉ. सुधीर सक्सेना

अपनी कृति बचपन की पहली पांडुलिपि में उन्होंने खानसामा फोका, भंडारन प्रस्कोव्या, नौकर निकोलाई का चित्रण मूल नामों से किया है। वस्तुत लेव निश्छल, सहृदय लेखक थे, जैसे कि दुनिया के सारे बड़े लेखक होते हैं। कितनी मजेदार बात है कि उनकी बचपन की कहानियों ने उन्हें बड़ा बना दिया। सच तो यह है कि लेव तोलस्तोय में आत्मा की गहराई से आने वाली नैतिक भावना की निष्कलंक शुद्धता थी। तभी वे इतनी सुंदर कहानियां लिख सके। तोलस्तोय की महानता को जानने के लिये जरूरी है कि उनकी कहानियां पढ़ी जाए। युद्ध और शांति (वार एंड पीस) जैसा उपन्यास अवश्य पढ़ा जान चािहए, जिसका विश्व साहित्य में अद्वितीय स्थान है।

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