ईरान के बहाने दुनिया को डरा रहे हैं ट्रंप !

आज अमेरिका का राष्ट्रीय कर्जा 34-36 ट्रिलियन डॉलर है, जबकि उसका कुल जीडीपी 32 ट्रिलियन डॉलर की है यानी अमेरिका पर कर्ज अमेरिकी के सकल घरेलू उत्पाद से भी ज्यादा है। इसलिए ट्रंप डरे हुए हैं कि कहीं अमेरिकी ढोल के अंदर जो लगातार बड़ा पोल होता जा रहा है, उसकी कलई न खुल जाए और यह एक झटके में खुल सकती है, अगर दुनिया की ट्रेडिंग करेंसी डॉलर न रहे, तो एक तरह से वह ब्रिक्स देशों को डराने और दुनिया में डॉलर की हेजेमनी बरकरार रखने के लिए भी ईरान को तहस-नहस कर रहे हैं। लेकिन हास्यास्पदता की हद ये है कि वह कह रहे हैं कि वह ईरान के लोगों को तानाशाही से मुक्ति दिलाने के लिए यह सब कर रहे हैं।

इस दौर का इससे बड़ा मजाक भला और क्या हो सकता है, जिसमें अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप कहते हैं, मैं दुनिया का सबसे बड़ा शांतिकामी हूं, मैंने दुनिया के 8 युद्ध रुकवाये हैं, जिसमें भारत-पाकिस्तान के बीच आशंकित परमाणु युद्ध भी है, जो अगर हो जाता तो कम से कम 3.5 करोड़ लोग मारे जाते। दूसरी तरफ वही डोनल्ड ट्रंप जबसे अमेरिका के राष्ट्रपति बने हैं, तबसे यानी पिछले 13 महीनों में सात देशों में बमबारी कर चुके हैं।

ईरान में उसके सुप्रीम लीडर सहित 40 दूसरे नेताओं, मिलिट्री कमांडरों और परमाणु वैज्ञानिकों की हत्या करवा चुके हैं। वेनेजुएला के राष्ट्रपति मादुरो को उनके बेडरूम से अगवा करवा चुके हैं, भले उसके लिए 300 से ज्यादा सुरक्षा रक्षकों की हत्या करनी पड़ी हो और यमन से लेकर तंजानिया तक पांच दूसरे देशों में न केवल आतंकियों को नेस्तनाबूद करने के लिए बार-बार बम बरसाये हैं बल्कि इस बीच दर्जनों देशों के राष्ट्राध्यक्षों को जुबानी भी हड़का चुके हैं।

व्हाइट हाउस में वैश्विक नेताओं से टकराव

जेलेंस्की को किस तरह उन्होंने व्हाइट हाउस से बेइज्जती करके निकाला और ब्रिटेन के प्रधानमंत्री के साथ किस तरह उनकी तू-तू-मैं-मैं हुई, यह दुनिया ने देखा है। यही नहीं फ्रांस के राष्ट्रपति इमानुअल पों और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वह खिसियाहटभरी नकल भी उतार चुके हैं। इसके बावजूद उनके दिल में यह हुड़क मची हुई कि उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार मिलना ही चाहिए। इसके लिए वह बीच-बीच में नोबेल कमेटी को अप्रत्यक्ष रूप से हड़काने का भी काम करते हैं और कई बार यह भी दिखाने की कोशिश करते हैं कि उनसे बड़ा कोई नोबेल पुरस्कार नहीं है।

सवाल है आखिर उनकी इस विध्वंसकारी सनक की असली वजह क्या है? आखिर अमेरिकी राष्ट्रपति जो कर रहे हैं, वह सब क्यों कर रहे हैं? क्या इसके पीछे सिर्फ इनकी अपनी निजी अकड़ है अथवा इस सबके पीछे कोई गहरी राष्ट्रीय हताशा काम कर रही है? अगर गौर से देखें तो पिछले 13 महीनों में राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने जिस तरह से दुनिया को अपनी सनक से हलकान कर रखा है, उसका कारण सिर्फ उनकी निजी इच्छा या अहं भर नहीं है। इसके पीछे अमेरिका की गहरी हताशा है कि आने वाले दिनों में दुनिया में उसका पिछले कई दशकों से जारी वर्चस्व कायम रहेगा या खत्म हो जायेगा? हम सब जानते हैं कि दुनिया में अमेरिका का वर्चस्व केवल दो स्तरों पर है।

अमेरिकी वर्चस्व पर भविष्य का संकट

एक तो पूरी दुनिया में अमेरिका का सैन्य वर्चस्व है और दूसरा दुनिया के अंतरराष्ट्रीय कारोबार में अपने मुद्रा डॉलर के चलते उसका एकछत्र कब्जा है। लेकिन पिछले दो दशकों में जिस तरह से दुनिया के कारोबार में डॉलर दिन पर दिन कमजोर हुआ है और सारी संभावनाओं और अनुमानों को सही साबित करते हुए चीन एक विश्व आर्थिक महाशक्ति के रूप में उभरा है, उससे अमेरिका हिल गया है।

पिछली सदी के आखिर दशक में दुनिया के कारोबार लगभग 93 फीसदी अमेरिकी डॉलर के जरिये होता था। आज दुनिया के कारोबार में डॉलर का हिस्सा महज 58 से 60 फीसदी रह गया है, जिसका मतलब यह है कि दुनिया के विदेशी मुद्रा भंडार का सिर्फ 58 से 60 फीसदी हिस्सा ही डॉलर में है, जो तेल और हथियार का कारोबार सिर्फ डॉलर से ही होता था, आज उसमें बड़ा हिस्सा बिना डॉलर के सम्पन्न हो रहा है। वास्तव में अमेरिका की सबसे बड़ी घबराहट और हताशा इसी बात को लेकर है। इसलिए वह किसी भी कमजोर देश को मटियामेट कर देने की अपनी हरकत के जरिये पूरी दुनिया को डराने-धमकाने पर लगा रहता है।

दुनिया के 70 से भी ज्यादा देशों में अमेरिका के सैन्य अड्डे हैं, करीब 4 लाख से ज्यादा अमेरिकी सैनिक दुनिया के विभिन्न हिस्सों में हैं और 100 से ज्यादा अमेरिकी जंगी जहाज, पनडुब्बियां और सैकड़ों स्टील्थ बोम्बर दुनिया को घेरे हुए हैं, यह दिखाने के लिए कि एक इशारे में वह दुनिया के किसी भी हिस्से में तहस-नहस कर सकते हैं। यही नहीं आज भी पूरी दुनिया टेक्नोलॉजी और वित्तीय नियंत्रण व्यवस्था में अमेरिका की पूरी तरह से पकड़ में है। पूरी दुनिया का बैंकिंग सिस्टम जिस स्विट कोड के जरिये लेन-देन का काम करता है, वह अमेरिका की मुट्ठी में है।

आईएमएफ-वर्ल्ड बैंक पर अमेरिकी प्रभाव

दुनिया के दो सबसे बड़े वित्त साहूकार संगठन इंटरनेशनल मॉनिट्री फंड और वर्ल्ड बैंक जैसे संस्थान अमेरिका के इशारे पर चलते हैं। इस सबके बाद भी अमेरिका को लगता है, भला उसकी दादागीरी पर कौन रोक लगा सकता है? यही कारण है कि जबसे ट्रंप अपने दूसरे कार्यकाल में अमेरिका के राष्ट्रपति बने हैं, पूरी दुनिया को दहशत में डाल रखा है। अपनी मनमानी टैरिफ नीतियों के चलते उन्होंने पूरी विश्व अर्थव्यवस्था में उठा-पटक मचा रखी है।

बावजूद इसके कि अमेरिकी फेडरल कोर्ट ने उनकी इस मनमानी टैरिफ नीतियों को गैरकानूनी बता चुके हैं, फिर भी दूसरे कानून का सहारा लेकर उन्होंने नये सिरे दुनिया के हर देश पर 15 फीसदी टैरिफ लगा रखा है। देखने पर भले लगे कि वह ईरान को तहस-नहस करने में लगे हैं, लेकिन यह अकेले सिर्फ ईरान भर का मटियामेट करना नहीं है, ईरान को ध्वस्त करके वह दुनिया को अमेरिकी ताकत का जलवा दिखाना चाहते हैं कि कोई दूसरा देश उनसे टकराने या उनकी बातों को मानने से इंकार न करें।

भले लोग कहने से हिचकिचाए, लेकिन पूरी दुनिया के रणनीतिकार और कूटनीतिक विशेषज्ञ यह बात भली-भांति समझते हैं कि ईरान में जिस तरह की ट्रंप मनमानी कर रहे हैं, वह दरअसल, ईरान के बहाने चीन, रूस और भारत को डराने की कोशिश है। क्योंकि सबकुछ के बावजूद आज अमेरिका के अंदर गहरे तक यह दहशत भर गई है कि ये तीन देश अमेरिका के वर्चस्व को बेमतलब बना सकते हैं।

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अमेरिका फर्स्ट के नाम पर भारत पर टैरिफ वार

अमेरिका फर्स्ट के नाम पर उन्होंने जिस तरह हमारे खिलाफ पहले 25 फीसदी का टैरिफ लगाया, फिर 25 फीसदी इस दादागीरी के नाम पर हम पर ठोका कि हम अमेरिका के मना करने के बाद भी रूस से तेल क्यों खरीद रहे हैं? लेकिन भारत ने दिखा दिया कि हम पर जब इस तरह का दबाव आता है तो हम ज्यादा मजबूती से उभरकर आते हैं।

अमेरिका द्वारा जोर-शोर से हम पर लगाये गये 50 फीसदी टैरिफ के बावजूद दुनियाभर के अर्थशास्त्रियों का मानना है कि 3 महीनों में जब तक भारत पर अमेरिका का यह टैरिफ डंडा लागू रहा है, भारतीय अर्थव्यवस्था को कोई खास फर्क नहीं पड़ा बल्कि उल्टे फायदा यह हुआ है कि पिछले एक दशक से हिंदुस्तान जिन द्विपक्षीय व्यापार समझौतों के दहलीज तक आकर रुक रहा था, पिछले 8-9 महीने के भीतर भारत ने ऐसे 7 बड़े समझौते कर लिए है, जिनमें मदर ऑफ आल ट्रेड डील्स नाम से मशहूर यूरोपीय यूनियन के साथ भारत का भारी-भरकम व्यापार समझौता भी है।

वास्तव में ट्रंप इसी सबसे घबराये हुए हैं और वह हर वह हथकंडा अपनाने से पीछे नहीं हट रहे, जिससे उन्हें लगता है कि दुनिया पर अमेरिका का वर्चस्व कायम हो सकता है। दरअसल, अपनी राजनीति को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप जिस अमेरिकी राष्ट्रवाद के मुखौटे के पीछे छिपा रहे हैं, वह उनकी अपनी खुद की कमजोरी भी है। बात-बात में डोनल्ड ट्रंप अमेरिका फर्स्ट यानी अमेरिका का फायदा होना चाहिए कि दुहाई देते हैं। लेकिन अपने लगभग एक साल के कार्यकाल में उन्होंने अपने और अपने पारिवारिक कारोबार में जो बेतहाशा बढ़ोत्तरी की है, अमेरिकी राजनीतिज्ञों की उस पर भी नजर है।

अमेरिका फर्स्ट की आड़ में आक्रामक राजनीति

लेकिन डोनल्ड ट्रंप आम अमेरिकियों की वर्चस्ववादी इच्छा को सहलाकर पूरी दुनिया पर मनमर्जी करना चाहते हैं और यह संदेश देना चाहते हैं कि वह अमेरिकियों के लिए कुछ भी कर सकते हैं, उन्हें दूसरे देशों की समस्याओं से कोई फर्क नहीं पड़ता, बस अमेरिका कमजोर नहीं दिखना चाहिए। इसलिए ट्रंप किसी सनकी की तरह जब मन होता है, सैन्य कार्यवाई कर देते हैं। विभिन्न देशों पर कठोर टैरिफ लगा देते हैं और दुनिया के सम्मानित नेताओं की बेईज्जती कर देते हैं ताकि वह अमेरिकियों के नजर में ताकतवर अमेरिकी राष्ट्रपति नजर आएं।

वह बार-बार अमेरिकी उद्योगों को बचाने की दुहाई देते हैं, लेकिन यह बात अपनी जनता को नहीं जानने देते कि आखिर अमेरिका की औद्योगिक व्यवस्था क्यों चीन से पिछड़ रही है? क्योंकि अमेरिकी शासन ने अमेरिकी उद्योग व्यवस्था के लिए जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर और सुविधाएं मुहैया नहीं करायी। मालूम होना चाहिए कि आज अमेरिका का राष्ट्रीय कर्जा 34-36 ट्रिलियन डॉलर है, जबकि उसका कुल जीडीपी 32 ट्रिलियन डॉलर की है यानी अमेरिका पर कर्ज अमेरिकी के सकल घरेलू उत्पाद से भी ज्यादा है।

-लोकमित्र गौतम
-लोकमित्र गौतम

इसलिए ट्रंप डरे हुए हैं कि कहीं अमेरिकी ढोल के अंदर जो लगातार बड़ा पोल होता जा रहा है, उसकी कलई न खुल जाए और यह एक झटके में खुल सकती है, अगर दुनिया की ट्रेडिंग करेंसी डॉलर न रहे, तो एक तरह से वह ब्रिक्स देशों को डराने और दुनिया में डॉलर की हेजेमनी बरकरार रखने के लिए भी ईरान को तहस-नहस कर रहे हैं। लेकिन हास्यास्पदता की हद ये है कि वह कह रहे हैं कि वह ईरान के लोगों को तानाशाही से मुक्ति दिलाने के लिए यह सब कर रहे हैं।

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