बर्फखाने में अमेरिका-ईरान परमाणु वार्ता

अच्छी बात तो यह होगी कि ईरान-इजरायल, बातचीत की टेबल पर बैठें। यह दोनों देशों के अलावा विश्व के हित में होगा। दुनिया में तेल के कुल प्रवाह का पांचवा हिस्सा फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी के बीच होरमुज स्ट्रेट के रास्ते जाता है। अगर इजरायल-ईरान के बीच युद्ध थमता नहीं है और अमेरिका इजरायल के समर्थन में युद्ध में कूदता है तो दुनिया के देशों के बीच गोलबंदी तेज होनी तय है। ऐसे में तीसरे विश्वयुद्ध की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है।

ईरान-इजरायल युद्ध से एक बार फिर अमेरिका-ईरान परमाणु वार्ता खटाई में पड़ गई है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची द्वारा दो टूक कह दिया गया है कि इजरायली हमलों के बाद अब अमेरिका के साथ परमाणु वार्ता बेमानी और गैरवाजिब है। याद होगा कि अपने पहले कार्यकाल के दौरान राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने अमेरिका को ईरान के साथ इस वार्ता से अलग कर लिया था।

हालांकि तब ईरान ने इस समझौते के तहत 2025 तक अपने परमाणु कार्यक्रम को बहुत अधिक सीमित करने पर सहमति जतायी थी। बाद में सत्ता में आई जो बाइडन सरकार ने 2015 के समझौते को नए सिरे से आकार देने की कोशिश की। लेकिन जनरल कासिम सुलेमानी की हत्या से आक्रोशित ईरान ने इराक स्थित दो अमेरिकी सैन्य बेस पर 22 मिसाइलों से हमला कर दिया। इससे दोनों देशों के बीच युद्ध की नौबत आन पड़ी।

अब जब सत्ता में डोनल्ड ट्रंप की दोबारा वापसी हुई है तो उनके प्रशासन ने परमाणु समझौते पर वार्ता की नई पेशकश की तो उम्मीद बंधी कि शायद बात बन जाएगी। लेकिन इजरायल-ईरान युद्ध ने हालात बिगाड़ दिए हैं। वैसे भी इजरायल कतई नहीं चाहता था कि अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु समझौते पर बातचीत हो। याद होगा 2015 से पहले जब ईरान का अमेरिका समेत अन्य शक्तिशाली देशों के साथ परमाणु समझौता हुआ तब इजरायल ने इसे ऐतिहासिक गलती करार दिया था। अभी भी इजरायल, सऊदी अरब और संयुक्त अमीरात ईरान को संदेह की दृष्टि से देखते हैं।

ईरान परमाणु डील पर इजरायल-सऊदी की शर्तें

जहां तक वार्ता को लेकर इन देशों का सवाल है तो वे इस पर अपनी सहमति तभी देंगे जब ईरान अपने परमाणु तथा प्रक्षेपास्त्र कार्यक्रम पर रोक लगाने के साथ-साथ इराक, लेबनान, यमन तथा अन्य दूसरे देशों के लड़ाकों को सैन्य व आर्थिक मदद देने से गुरेज करेगा। फिलहाल इजरायल ने ट्रंप प्रशासन की ईरान से वार्ता पर अपना रुख स्पष्ट कर दिया है कि ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने देने से रोकने के प्रति उसका रुख पहले जैसा ही है। दरअसल इजरायल इस नतीजे पर है कि ईरान के साथ पुराने समझौते को अमलीजामा पहनाना एक किस्म से तेहरान को परमाणु हथियार उपलब्ध कराने जैसा होगा।

इजरायल वार्ता के विरोध में नहीं है लेकिन वह चाहता है कि मौजूदा समझौता 2015 के समझौते से बेहतर हो। 2015 के समझौते के मुताबिक अगले डेढ़ दशक में ईरान की परमाणु गतिविधियों पर लगे प्रतिबंध समाप्त हो जाने का प्रावधान था, जिसे लेकर इजरायल, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात ने नाखुशी जाहिर की थी। इसके अलावा पश्चिम एशिया में ईरान की परमाणु गतिविधियों पर रोक लगाने का भी कोई प्रावधान नहीं था।

अब इन देशों की मंशा है कि ईरान के साथ अगर परमाणु समझौता हो तो वह समझौता पांच दशक तक बाध्यकारी हो। साथ ही ईरान से खाड़ी देशों की सुरक्षा भी सुनिश्चित हो। दरअसल सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात ईरान के आक्रामक और विस्तारवादी रुख को लेकर सशंकित हैं। दूसरी ओर यूरोप, रुस और चीन जैसे देश ट्रंप प्रशासन के वार्ता प्रस्ताव को ईरान के लिए बेहतर मौका मान रहे हैं।

ईरान-अमेरिका परमाणु डील और फिर बदली रणनीति

उल्लेखनीय है कि इन देशों ने 2015 के समझौते का भी समर्थन किया था। फिलहाल वार्ता को लेकर ईरान की ओर से इंकार कर दिया गया है। अतीत में जाएं तो पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के आखिरी कार्यकाल में अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु डील हुई थी। परमाणु डील के बाद अमेरिका ने ईरान को खाद्य और फार्मास्युटिकल क्षेत्र में व्यापार की अनुमति दी थी। प्रतिबंध हटते ही ईरान को वैश्विक क्षितिज पर उड़ान भरने का मौका मिल गया था।

उसने अपने पुनर्निर्माण के लिए खुलकर कच्चा तेल बेचने के साथ विदेशी बैंकों में जमा 100 अरब डॉलर की जब्त संपत्तियों का उपभोग करने लगा। हालांकि एक नए घटनाक्रम में अमेरिका ने ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल परीक्षण को लेकर उसके विरुद्ध कड़ा कदम उठाते हुए इस कार्यक्रम से जुड़ी 11 कंपनियों पर प्रतिबंध लगा दिया। गौर करें तो ईरान का नाभिकीय कार्यक्रम का इतिहास बहुत दिलचस्प है।

1950 में आइजन हावर प्रशासन के एटम फॉर पीस कार्यक्रम के तहत पहली सहायता मिली। लेकिन 1979 में अयातुल्ला खोमानी द्वारा शाह शासन द्वारा प्रारंभ किए गए सभी नाभिकीय उर्जा संयंत्रों एवं परियाजनाओं को निरस्त कर दिया गया। यह वह समय था जब ईरान की इस्लामिक क्रांति उफान पर थी और शहरों में तेल के पैसों से समृद्धि थी वहीं गांवों में गरीबी दहाड़ मार रही थी। सत्तर के दशक का सूखा और शाह द्वारा यूरोपिय तथा बाकी देशों के प्रतिनिधियों को दिए गए भोज जिसमें अकूत पैसा खर्च किया गया था, ने ईरान की गरीब जनता को शाह के विरुद्ध भड़का दिया।

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ईरान का नाभिकीय विकास और अमेरिका की नाराज़गी

आधुनि कीकरण के हिमायती शाह को ईरान की जनता पश्चिमी देशों के पिठ्ठू के रुप में देखने लगी। 1979 में अभूतपूर्व हिंसक प्रदर्शन हुए और अमेरिकी दूतावास को घेर लिया गया। शाह के समर्थकों और जनता के बीच संघर्ष चलता रहा और अंतत ईरान एक इस्लामिक गणराज्य बन गया। इराक युद्ध एवं सद्दाम हुसैन के दृष्टिकोण के कारण ईरान अपने नाभिकीय कार्यक्रम पर विचार के लिए बाध्य हुआ और वे 4500 नाभिकीय वैज्ञानिक जो इस्लामिक क्रांति के दौरान देश छोड़कर जा चुके थे, में से 80 फीसद को वापस बुला लिया।

1986 में तेहरान द्वारा नाभिकीय सुविधाएं स्थापित करने में सहायता के अनुरोध पर पाकिस्तान के अणु बम के जनक और बदनाम वैज्ञानिक ए क्यू खान का ईरान दौरा हुआ और 1991 में इराक की पराजय ने ईरान के नाभिकीय कार्यक्रम के संकल्प को और मजबूती दे दी। अमेरिका की ईरान पर भौंहे तब तनी जब 1995 में ईरान ने रुस के साथ क्रांति के उपरांत रद्द हुए बुशेर नाभिकीय रिएक्टर को स्थापित करने हेतु 800 मिलियन डॉलर का समझौता किया। यह समझौता अमेरिका को बेहद नागवार गुजरा।

ईरान के लिए संकट तब खड़ा हुआ जब ईरान विरोधी मुजाहिदीन खल्क संगठन ने दुनिया को यह जानकारी दी कि ईरान नातांज में यूरेनियम संवर्धन संयंत्र एवं अराक में भारी जल उत्पाद संयंत्र बिना अंतरराष्ट्रीय परमाणु उर्जा एजेंसी (आईएईए) की जानकारी के स्थापित कर चुका है। 2003 में अमेरिका ने ईरान को शैतान की धुरी में शामिल राष्ट्र में मान लिया और ऑपरेशन इराकी फ्रीडम से ठीक पहले आइएइए द्वारा उसके नाभिकीय प्रतिष्ठानों का निरीक्षण किया गया।

ईरान-अमेरिका परमाणु तनाव और बढ़ते प्रतिबंध

दबाव स्वरुप ईरान ने यूरोपीय यूनियन के साथ परमाणु ईंधन पा गतिविधियों को निलंबित करने का समझौता किया फिर भी बात नहीं बनी। 2007 में आइएइए ने तर्क दिया कि ईरान यूरेनियम संवर्धन का कार्य स्थगित किए जाने की समय सीमा का पालन करने में विफल रहा लिहाजा उस पर प्रतिबंध अवश्यंभावी है। अप्रैल 2007 में ईरान के राष्ट्रपति अहमदी नेजाद ने दावा किया कि ईरान औद्योगिक स्तर पर परमाणु ईंधन उत्पादित कर सकता है।

अक्टुबर, 2007 में अमेरिका ने ईरान के विरुद्ध कड़े प्रतिबंध लगाने की घोषणा कर दी। फरवरी 2008 में ईरान ने एक नवनिर्मित अंतरिक्ष केंद्र की शुरुआत करते हुए एक अनुसंधान रॉकेट प्रक्षेपित किया जिससे तनाव और बढ़ गया। इसी दौरान चुनाव में रुढ़िवादियों की जीत हुई और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने ईरान पर आर्थिक एवं व्यापारिक प्रतिबंध कड़े कर दिए।

-अरविंद जयतिलक
-अरविंद जयतिलक

बावजूद इसके ईरान ने शाहब-3 नामक लंबी दूरी तक मार करने वाले प्रक्षेपास्त्रां के नए संस्करण का परीक्षण किया और दावा किया कि यह प्रक्षेपास्त्र इजरायली क्षेत्र को निशाना बनाने में सक्षम है। ईरान की इस गुस्ताखी से अमेरिका का क्रोध सातवें आसमान पर पहुंच गया। अब अच्छी बात यह होगी कि दोनों देश बातचीत की टेबल पर बैठे। यह दोनों देशों के अलावा विश्व के भी हित में होगा।

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