दुनिया के हित में नहीं है, ईरान-इजराइल के बीच जंग!

इसमें कोई दो राय नहीं हैं कि वर्तमान स्थिति के लिए इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ज़िम्मेदार हैं। उनका इजराइल में ज़बरदस्त विरोध है, लगभग रोज़ाना ही उनके खिलाफ सड़कों पर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं और वह अनेक आर्थिक घोटालों में भी संदिग्ध हैं, जिससे संबंधित मामले अदालत में हैं। अपने खिलाफ चल रहे अदालती मामलों से बचने के लिए पहले उन्होंने न्यायपालिका को ही एग्जीक्यूटिव के अधीन करने का प्रयास किया, जो भारी विरोध के कारण असफल रहा। इसके बाद अपनी कुर्सी बचाये रखने के लिए वह अपने मुल्क को निरंतर जंग में झोंके हुए हैं। हमास से बंदियों की रिहाई के लिए हुए समझौते को भी उन्होंने अपने स्वार्थ के चलते सफल नहीं होने दिया। इजराइली अख़बारों का कहना है कि जंग बंद हुईं तो नेतन्याहू अपने घोटालों के कारण जेल में होंगे।

ईरान पर इजराइल के हमले से पश्चिम एशिया में एक बार फिर से तनाव बढ़ गया है। यह स्ट्राइक ईरान के बहुत अंदर तक की गईं और परमाणु व बैलिस्टिक मिसाइल साइट्स को हिट करने के अतिरिक्त सशस्त्र बलों व आईआरजीसी के प्रमुखों को भी मार गिराया गया। ईरान ने कठोर जवाबी हमला करने की कसम खायी है, लेकिन आज उसके पास सीमित विकल्प हैं। इजराइल ने पिछले साल ही उसकी लेबनानी प्रॉक्सी हिजबुल्लाह को बहुत कमज़ोर कर दिया था और सीरिया में तेहरान समर्थक असद शासन का पतन हो गया था।

इसके अलावा इजराइल का दावा है कि उसकी नवीनतम स्ट्राइक्स में गोपनीय मोसाद सेल शामिल थी, जिसने ईरान के भीतर से हमला करते हुए ईरानी एयर डिफेंस व बैलिस्टिक मिसाइल लांचर्स को नष्ट किया। इसका अर्थ यह है कि तेहरान का काउंटर-इंटेलिजेंस नेटवर्क अनेक मोर्चों पर विफल रहा है। इस बीच अमेरिका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ईरान को धमकी दे रहे हैं कि अगर तेहरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम पर वाशिंगटन के साथ ताज़ा समझौता नहीं किया तो इजराइल उस पर और सैन्य हमले करेगा। इस मुद्दे पर अमेरिका व ईरान के बीच वार्ता चल रही है।

तेहरान की जिद और बढ़ता परमाणु खतरा

लेकिन तेहरान वाशिंगटन की इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं है कि वह अपना परमाणु कार्यक्रम स्थगित कर दे। बहरहाल, अगर स्ट्राइक्स का उद्देश्य आयतुल्लाह को सख्त संदेश देना था, तो उनका विपरीत असर हो सकता है- तेहरान अपना परमाणु हथियार कार्यक्रम तेज़ कर सकता है और एनपीटी को छोड़ सकता है। इससे खाड़ी के अरब देशों में तनाव बढ़ सकता है और सऊदी अरब भी परमाणु हथियार बनाने पर बल दे सकता है।

ज़ाहिर है इस सबका ऊर्जा के दामों पर बहुत गहरा असर पड़ेगा। क्रूड तेल के दामों में पहले ही 9 प्रतिशत की वृद्धि हो चुकी है और इसमें अतिरिक्त इज़ाफा हो सकता है। सप्लाई चेनों पर भी इसका बुरा प्रभाव पड़ सकता है; क्योंकि खाड़ी में महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग हैं। साथ ही हमें अंडरसी केबल्स को भी नहीं भूलना चाहिए जिन्हें निशाना बनाया जा सकता है या उनका बतौर हथियार इस्तेमाल किया जा सकता है। भारत के लिए भी चीज़ें जटिल हो गई हैं।

ऊर्जा संकट और भारत के हितों पर मंडराते बादल

चाबहार बंदरगाह के ज़रिये ईरान हमें अफगानिस्तान के लिए महत्वपूर्ण वैकल्पिक व्यापार मार्ग प्रदान करता है। यही मार्ग लिंक है सेंट्रल एशिया के लिए इंटरनेशनल नार्थ-साउथ कॉरिडोर तक। अगर इस क्षेत्र में तनाव लम्बे समय तक चलता है, तो सब चीज़ों पर काले बादल छा जायेंगे। तेल अवीव व तेहरान के बीच सैन्य टकराव का बढ़ना दुनिया के हित में नहीं है। लेकिन नेतन्याहू, आयतुल्लाह व ट्रंप के इरादे नेक नहीं लग रहे हैं।

फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल पों ने कहा कि अगर ईरान जवाबी हमला करता है तो फ्रांस इजराइल की रक्षा करने में मदद करेगा, लेकिन यह समर्थन बिना शर्त व बिना सीमा का नहीं है। पेंटागन भी पश्चिम एशिया में अपने युद्धपोत व अन्य सैन्य एसेट्स पोजीशन कर रहा है ताकि इजराइल की रक्षा की जा सके। लगभग चार दशक तक ईरान ने अरबों डॉलर, हथियार व सैन्य शक्ति का निवेश इजराइल विरोधी नेटवर्क विकसित करने में किया, जिसे एक्सिस ऑ़फ रेजिस्टेंस कहते हैं, कि जब इजराइल से युद्ध होगा तो यह लोग ईरान के साथ खड़े हो जायेंगे।

लेकिन पिछले एक वर्ष के दौरान यह एक्सिस बहुत कमज़ोर हो गया है और किसी को यह उम्मीद नहीं है कि इससे तेहरान की कोई अर्थपूर्ण मदद हो सकेगी। हिजबुल्लाह, जो लेबनान में ईरान का सबसे मज़बूत सहयोगी है, ने ईरान पर इजराइल के हमले की निंदा तो अवश्य की लेकिन उसने यह नहीं कहा कि वह इसका बदला लेगा। यमन के हूतियों ने भी ऐसा कोई संकेत नहीं दिया कि वह जवाबी सैन्य कार्यवाही करेगा।

यह भी पढ़ें… एविएशन बाज़ार को स्पष्ट उत्तर चाहिए विमान दुर्घटनाग्रस्त क्यों हुआ?

ईरान-इजराइल संघर्ष से तीसरे विश्व युद्ध की आशंका

यह सही है कि एक्सिस पूरी तरह से नष्ट नहीं हुआ है, लेकिन बहुत कमज़ोर अवश्य हो गया है। एक्सिस इजराइल को रक्षा की मुद्रा में लाने की स्थिति में नहीं है। ईरान ने दिसम्बर में अपने एक महत्वपूर्ण सहयोगी को भी खो दिया जब विद्रोहियों ने सीरिया में बशर अल-असद का तख्ता पलट दिया था। इराकी मिलिशिया में अभी कुछ दम खम ज़रूर बाकी है। इसका अर्थ यह है कि ईरान पर हमला उस समय किया गया है, जब वह अपनी सबसे कमज़ोर स्थिति में था।

बहरहाल, इजराइल की स्ट्राइक्स से ईरान अपमानित अवश्य हुआ है, लेकिन पराजित नहीं हुआ है। इसलिए यह मानकर बैठ जाना बहुत बड़ी भूल होगी कि ईरान खामोश बैठ जायेगा। इस लेख के लिखते समय ही यह खबर आ गई कि ईरान ने इजराइल पर मिसाइलों की बारिश की है। ईरान के पहले हमले में इजराइल में तीन लोग मारे गये और अनेक घायल हुए। ईरान के दूसरे हमले में 2 लोग मारे गये व 19 अन्य घायल हुए हैं।

यह हमले ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामेनेई के टीवी संबोधन के बाद शुरू हुए, जिसमें उन्होंने कहा, इस्लामी गणराज्य के सशस्त्र बल दुश्मन पर बहुत तगड़ी मार लगायेंगे। ईरान ने तेल अवीव के केंद्र में हमले किये हैं। दूसरी ओर इजराइल ने भी ईरान पर ड्रोनों से हमला किया है। ज़ाहिर है दोनों देशों के बीच सैन्य टकराव निरंतर बढ़ता जा रहा है और अगर विश्व समुदाय ने इस पर जल्द रोक न लगायी तो यह तीसरे विश्व युद्ध में भी बदल सकता है, जिस तरह से अमेरिका, फ्रांस आदि इजराइल के पक्ष में कूदने के लिए तैयार हैं और ईरान के समर्थन में रूस व चीन आने को तैयार हैं।

नेतन्याहू की नीतियों से बढ़ता पश्चिम एशिया संकट

युद्ध से कभी किसी का भला नहीं होता है- साहिर लुधियानवी के शब्दों में, टैंक आगे बढें या पीछे हटें, कोख धरती की ही बांझ होती है… इसलिए ए शरीफ इंसानों, जंग टलती रहे तो बेहतर है। जंग में कितना ही खून बहा लिया जाये, आखिर में फैसले वार्ता मेज़ पर ही होते हैं। ईरान व इजराइल को भी आख़िरकार वार्ता मेज़ पर ही आना होगा, लेकिन फिलहाल के पागलपन का नतीजा यह हुआ है कि पश्चिम एशिया का एयरस्पेस बंद कर दिया गया है, यूरोप आने जाने वाली 1,800 फ्लाइट्स प्रभावित हुई हैं।

दोनों इजराइल व ईरान के आम नागरिक तनाव में हैं। सैन्य टकराव तो इन दोनों मुल्कों में हो रहा है, लेकिन महंगाई व आर्थिक मंदी की मार दुनिया के लगभग सभी देशों को झेलनी पड़ेगी। इसमें कोई दो राय नहीं हैं कि वर्तमान स्थिति के लिए इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ज़िम्मेदार हैं। उनका इजराइल में ज़बरदस्त विरोध है, लगभग रोज़ाना ही उनके खिलाफ सड़कों पर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं और वह अनेक आर्थिक घोटालों में भी संदिग्ध हैं, जिससे संबंधित मामले अदालत में हैं।

नरेंद्र शर्मा
नरेंद्र शर्मा

अपने खिलाफ चल रहे अदालती मामलों से बचने के लिए पहले उन्होंने न्यायपालिका को ही एग्जीक्यूटिव के अधीन करने का प्रयास किया, जो भारी विरोध के कारण असफल रहा। इसके बाद अपनी कुर्सी बचाये रखने के लिए वह अपने मुल्क को निरंतर जंग में झोंके हुए हैं। हमास से बंदियों की रिहाई के लिए हुए समझौते को भी उन्होंने अपने स्वार्थ के चलते सफल नहीं होने दिया। इजराइली अख़बारों का कहना है कि जंग बंद हुईं तो नेतन्याहू अपने घोटालों के कारण जेल में होंगे।

अब आपके लिए डेली हिंदी मिलाप द्वारा हर दिन ताज़ा समाचार और सूचनाओं की जानकारी के लिए हमारे सोशल मीडिया हैंडल की सेवाएं प्रस्तुत हैं। हमें फॉलो करने के लिए लिए Facebook , Instagram और Twitter पर क्लिक करें।

Related Articles

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

Back to top button