दहशत का पर्याय बन गये हैं, तेज रफ्तार दुर्घटनाओं के हाई-वे
बसों में तय सीमा से कई गुना सामान छत पर रहता है और स्टोर बॉक्स में गैस सिलेंडर, आतिशबाज़ी का सामान, गद्दे जैसी चीजें रहती हैं ताकि पुलिस की नजर न पड़े। क्या यह कम खतरनाक नहीं है कि आंध्र प्रदेश की बस जयपुर में और यूपी की बस केरल में सवारी ढोती नजर आए। रजिस्ट्रेशन छोड़िये यात्रियों को थोड़े से पैसे में यह बस संचालक इतनी छूट दे देते हैं कि एक स्लीपर में चार-चार आदमी घुस जाते हैं और गैलरी में सामान के ऊपर भी यात्रियों को सोते हुए देखा जा सकता है।
साल 2024 में देश के राष्ट्रीय राजमार्गों (नेशनल हाईवे) में 1,25,873 दुर्घटनाएं हुई थीं, जिसमें 53,090 लोगों की मौत हो गई थी तथा कम से कम इनसे चार गुना ज्यादा लोग दुर्घटनाग्रस्त हो गये थे, जिनमें से एक तिहाई पूरी जिंदगी के लिए अपाहिज हो चुके हैं। जबकि इसके एक साल पहले दुर्घटनाओं की संख्या तो थोड़ी कम 1,23,955 ही थी, लेकिन मरने वाले लोगों की संख्या 53,630 थी। ये आंकड़े बताते हैं कि किस तरह हमारे राजमार्ग या हाईवे दुर्घटनाओं और दहशत का पर्याय बन गये हैं।
यहां ज्यादातर मौतों का कारण तेज रफ्तार ड्राइविंग होती है। साल 2022 में राजमार्गों में जो कुल सड़क दुर्घटनाएं हुई थीं, उनमें 72.3 प्रतिशत मौतों और 71.20 प्रतिशत दुर्घटनाओं का कारण वाहनों की यही तेज रफ्तारी थी। जिस राजस्थान में कभी रेत पर वाहन चलाते समय एक ही डर लगा रहता था कि कहीं वाहन फंस न जाए, अब वहीं पर यह डर सताने लगा है कि कहीं दुर्घटना में मौत न हो जाए।
कोहरे और तेज़ रफ्तार ने हाईवे को खतरनाक बनाया
इधर सर्दी का मौसम आ चुका है, चंद दिनों के भीतर पूरे देश में, समुद्री इलाकों को छोड़कर सभी जगह कोहरे का कहर शुरु हो जाएगा। इसके बाद देश के हाईवे और एक गांव को दूसरे शहरों और गांवों से जोड़ते मार्ग भी दुर्घटनाओं का सबब बनेंगे और इनकी खबरें अखबारों के पहले पृष्ठ पर होंगी। शेरशाह सूरी ने जब जीटी रोड बनवायी था, तो सोचा था कि अब आवागमन आसान हो जाएगा। प्रधानमंत्री के रूप में अटल बिहारी वाजपेयी ने जब स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना आरंभ की थी, भारत के चारों कोनों को जोड़ने के लिए, तब भी यही मंशा थी।
जनहित के लिए बनाई इन योजनाओं को अब हर हाथ कार और सुपर स्पीड से वाहन दौड़ाने की सोच ने बदनाम करना आरंभ कर दिया है। हाल ही में राजस्थान में स्लीपर कोच बस अग्निकांड हो या फिर देश में रोज हाईवे पर रफ्तार के नशे में होने वाली दुर्घटनाओं में मर रहे लोगों की मौत का आंकड़ा। ऐसे समाचारों पर सिर्फ दो दिन हो-हल्ला होता है, उसके बाद फिर हालात वहीं के वहीं रहते हैं।
विकसित हाईवे पर सुरक्षा नियमों की गंभीर कमी
माना जा रहा है कि जितनी सुविधाएं आम जनता के लिए बढ़ रही हैं, उससे अधिक उन सुविधाओं का लाभ लेकर चंद लोग अब देश में मौत की रोज अनगिनत निशानियां छोड़ रहे हैं। आम जनता है कि मजबूरी में अपना शोषण करा रही है। भारत में जिस तरह से विकास हो रहा है, उसी रफ्तार से सड़कों के सुधारीकरण का दौर भी जारी है।
वर्तमान में पूरे देश में हाईवे, बाईपास तथा रोड कनेक्टिविटी युद्ध स्तर पर विकसित हो रही है। लेकिन इस विकास में नियम और सुरक्षा ठीक उसी तरह से गायब हैं, जिस तरह से स्लीपर कोच में इमरजेंसी गेट, आग बुझाने वाले यंत्र, यात्रियों के अंदर चलने के लिए सुरक्षित गैलरी और हाईवे पर टॉमा सेंटर। हिंदुस्तान में देश के साथ ही राज्यों के भी एक्सप्रेस-वे हैं, जिन पर जनता सफर कर रही है। कुछ प्रस्तावित हैं और कुछ निर्माणधीन हैं।
जो हाईवे या एक्सप्रेस-वे हैं, उनमें दिल्ली-मुंबई, मुंबई-पुणे, यमुना एक्सप्रेस-वे, पूर्वांचल, अमहमदाबाद-बडोदरा, द्वारका तथा बुंदेलखंड एक्सप्रेस-वे विशेष हैं। यहां पर हम पूरे देश का ट्रेंड उत्तर प्रदेश तथा राजस्थान से समझते हैं। उत्तरप्रदेश में यमुना तथा लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेस वे ऐसे हैं, जहां पर दुर्घटना के कारण इतने हैं कि उनकी गिनती संभव नहीं है। यही हाल राजस्थान का है। यहां पर देश के मुकाबले राज्य के हाईवे अधिक खतरनाक हो रहे हैं।
हाईवे और एक्सप्रेस-वे पर ढलान व घुमाव दुर्घटना कारण
आखिर क्या कारण हैं कि सुहाना सफर,मौत के सफर में बदल रहा है? दरअसल जितने भी हाईवे हैं और उन पर दौड़ रहे वाहन दोनों ही खामियों से भरे हैं। रोड सेफ्टी विशेषज्ञ बताते हैं कि रोड दुर्घटनाओं के कई कारण हैं। उनके मुताबिक सौ किलोमीटर की रफ्तार से अधिक तेजी से दौड़ रहे वाहनों का एक-दूसरे से टकराने का प्रमुख कारण है, इन रोडों को बनाते समय यह नहीं देखा गया कि वह कितने घुमवादार हैं और तेजी से आ रहा वाहन गति पर कंट्रोल कैसे करेगा?
राजस्थान में तो इस तरह के घुमाव ही अधिकतम दुर्घटना कराते हैं। बॉटल नेक ऐसी व्यवस्था है कि यहां पर जाम के साथ ही एक्सीडेंट होना आम बात हो गई है। सड़क इतनी बेतरतीब बनी हैं कि उन पर चलते समय चार पहिया वाहन के टायर लहराते हैं। जो बैरिकेड्स लग रहे हैं, वह इतने दुर्घटना प्रूफ नहीं हैं कि उनसे टकराकर वाहन कुछ संभल सकें। एक जो सबसे बड़ा कारण सामने आया है, वह यह है कि हाईवे को गांव आदि की जो सड़कें जोड़ती हैं, वे प्रॉपर नहीं हैं।
वे कहीं हद से अधिक नीची हैं और कहीं हद से ज्यादा ऊंची हैं। खुद ही समझा जा सकता है कि तेज गति से आता वाहन जब यहां कनेक्ट होगा, तो क्या होगा? ढलान तो ऐसी बनायी गई हैं कि दूर से लगता है कि किसी पुलिया पर चढ़ने जा रहे हैं। यमुना एक्सप्रेस-वे का हाल यह है कि यहां पर सरपट दौड़ते वाहन, सीमेंट की बनी सड़कों पर घर्षण करते पहियों के फटते ही अनियंत्रित हो जाते हैं।
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हाईवे दुर्घटनाओं के पीछे ड्राइवर की लापरवाही
यदि कोहरा हुआ तो हादसा और अधिक भीषण होता है। रोड सेफ्टी सर्वे करने वाले विशेषज्ञ सरकारों को समय-समय पर यह बताते हैं कि दुर्घटना इस कारण से हो रही है, इसे दूर किया जाए। पर हाईवे अथॉरिटी, दुर्घटना बाहुल्य क्षेत्र, कृपया धीरे चलें और घर पर आपका परिवार इंतजार कर रहा है आदि लिखकर या इन वाक्यों के साइन बोर्ड लगाकर निश्चिंत हो जाता है कि अब सब ठीक है।
राजस्थान में टैंकर अग्निकांड में यही हुआ था। जयपुर के पास उसी स्थान पर कई बार दुर्घटनाएं हो चुकी हैं। मगर यात्रियों की मौतों के अतिरिक्त कुछ नया नहीं हो रहा। हाइवेज की एक खास बात यह है कि ये कई स्थानों पर तो गांव की सड़कें जैसे गड्ढेदार हालत में हैं। अब जरा यह देखें कि जो वाहन चला रहे हैं उनकी क्या स्थिति है और सरकारी विभाग क्या कर रहे हैं? जो वाहन चला रहे हैं वह खुद को कभी गलत नहीं कहते।
आंखों की रोशनी कितनी है, कभी जांच नहीं कराते, स्टेरिंग को खतरनाक स्थिति में संभाल पाएंगे इसकी कभी प्रैक्टिस नहीं करते, कम से कम आठ घंटे की नींद और पौष्टिक आहार नहीं लेते, शराब और सिगरेट-बीड़ी नियमित लेना इनकी सबसे खास बात है, आगे-पीछे चल रहा वाहन कब ओवरटेक करना है, वह खुद तय करते हैं, शॉर्ट रास्ते पर जाने के लिए विपरीत दिशा में जाना इनका शगल है, सवारी उतारने-चढ़ाने के लिए पार्किंग लाइट या फिर दूसरे नियम उन्हें इसलिए नहीं पता, क्योंकि वे जो सवारी बैठाते हैं, वही उनके नशे की व्यवस्था के लिए धन दे जाती हैं और इन सबसे ऊपर यह कि वह खतरनाक गैस सिलेंडर या मिट्टी के तेल का स्टोव लेकर चलते हैं ताकि रास्ते में खाना बनाया जा सके।
स्लीपर बस और कार टैक्सी: सुरक्षा के नाम पर लापरवाही
जब इतनी खूबियां लेकर एक ड्राइवर चलेगा, तो दुर्घटना खुद ब खुद होनी ही है। स्लीपर कोच बसें हो या फिर कार टैक्सी इनकी स्थितियां तो इतनी विकट हैं कि आरटीओ भी देखकर चकित हो जाता है। बसों में तय सीमा से कई गुना सामान छत पर रहता है और स्टोर बॉक्स में गैस सिलेंडर, आतिशबाज़ी का सामान, गद्दे जैसी चीजें रहती हैं ताकि पुलिस की नजर न पड़े। क्या यह कम खतरनाक नहीं है कि आंध्र प्रदेश की बस जयपुर में और यूपी की बस केरल में सवारी ढोती नजर आए।

रजिस्ट्रेशन छोड़िये यात्रियों को थोड़े से पैसे में यह बस संचालक इतनी छूट दे देते हैं कि एक स्लीपर में चार-चार आदमी घुस जाते हैं और गैलरी में सामान के ऊपर भी यात्रियों को सोते हुए देखा जा सकता है। हां, इतना सब होने के बाद भी स्थानीय शासन के नुमाइंदे इन्हें चेक करके छोड़ देते हैं, तो फिर बसों में अग्निकांड के समय मरने वाले कम कैसे हो सकते हैं? देश जब उड़ने वाली टैक्सी की तरफ कदम रख रहा है, तब सड़क हादसों के प्रति इस तरह की लापरवाही क्या आसमान में नजर नहीं आएगी?
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